क्या ये पहले वाली भाजपा है: गुटबाजी की कांग्रेसी बुराई ने कमलदल में भी कर ली गहरी घुसपैठ
KHULASA FIRST
संवाददाता

भाजपा का स्थापना दिवस : सत्ता अब साधन नहीं, साध्य होती जा रही
सत्ता की निरंतरता से पार्टी नेताओं में बढ़ती जा रही आत्ममुग्धता
जनता से कटते जा रहे नेता, चुनाव मशीनरी में तब्दील होते कार्यकर्ता
देश को एक परिवार के रूप में देखने का दावा करने वाले दल के नेता आपस में ही लड़ रहे
पार्टी में ‘पट्ठावाद’ चरम पर, संगठन की ताकत कमजोर, सत्ता बन रही सिरमौर
एक अकेले मोदी की ‘पुण्याई’ खा रहे पार्टी के विधायक-सांसद-पार्षद, खुद जनहित के मुद्दों से दूर
सांसदों, विधायकों-पार्षदों में भ्रष्टाचार चरम पर, ऊपरी कमाई अब शिष्टाचार बनी
परिवारवाद की बुराई से लाख कोशिशों के बावजूद दूर नहीं हो पा रही पार्टी
पार्टी में नया नेतृत्व उभरने ही नहीं दे रहे जमे-जमाए नेता, धनबल का बढ़ा जोर
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
46 बरस पूर्ण कर 47वें वर्ष में प्रवेश कर रही वर्तमान की भाजपा क्या पहले वाली भाजपा है? क्या आज भी भाजपा में वो ही वैचारिक अनुष्ठान बरकरार है, जो इसके गठन के वक्त 1980 में स्थापित किया गया था? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में स्थापित पार्टी के लिए क्या सत्ता अब भी साधन है?
उस महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए, जो कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अगुआई में तत्कालीन आरएसएस के तपोनिष्ठ नेतृत्व ने देखा था? या अब कमलदल के लिए सत्ता, आर्यावर्त को परम् वैभव पर पहुंचाने का साधन मात्र नहीं रह गई है और सत्ता ही साध्य, यानी साधना हो गई है? येन-केन-प्रकारेण बस सत्ता में बने रहना ही ध्येय रह गया? ये तमाम चुभते हुए सवाल भाजपा के 47वें स्थापना दिवस पर भाजपा के अंदर से ही निकलकर बाहर आए हैं।
6अप्रैल 1980 को जनसंघ को विलय कर भाजपा अस्तित्व में लाई गई थी। एक राजनीतिक दल के रूप में इसे देश के राजनीतिक पटल पर लाने वाले संघ परिवार के ‘ऋषियों’ ने इस पार्टी को लेकर एक अलग प्रकार के स्वप्न गढ़े थे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे व्यक्तित्व ताजा-ताजा गठित हुए दल को सुगठित करने के लिए दिए गए। कुछ लक्ष्य, कुछ स्वप्न, कुछ वादे, कुछ इरादे... भारत की तत्कालीन राजनीति से हटकर दिए गए, आत्मसात किए गए।
वैसे ही नेता व विचार भी दिए गए। शायद इसी कारण भाजपा को देश के अन्य दलों की तुलना में ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ का तमगा मिला। 47वें स्थापना दिवस पर ये ही सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या भाजपा आज भी ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ है? या वह भी अन्य दलों-सी हो गई है।
इस सवाल का जवाब अब तलाशा नहीं जा रहा। वह स्पष्ट रूप से सामने नजर आ रहा है कि एक दल के रूप में भाजपा भी अब हूबहू वैसी होती जा रही है, जिससे बचने के लिए इस पार्टी को अन्य दलों से अलग मुकर्रर किया गया था।
वही गुटबाजी, वही भाई-भतीजावाद, वही परिवारवाद, वही पट्ठावाद, वही भ्रष्टाचार, वही आत्ममुग्ध नेता-नेतृत्व, जनता व जनहित के मुद्दे से दूर जनप्रतिनिधि, आपस में तलवारें भांजते नेता आदि-आदि।
क्या 46 बरस बाद भी भाजपा इन सब बुराइयों से अब भी अछूती है? या ये तमाम अन्य दलों वाली बुराइयां भाजपा में घर कर गई हैं और वह भी गहरे तक?
स्थापना दिवस पर अगर कमलदल की पड़ताल करें तो ऐसा नजर नहीं आता कि सत्ता की निरंतरता ने भाजपा के नेताओं की आत्ममुग्धता को इस कदर बढ़ा दिया है कि वे अब ‘जमीन’ पर नहीं हैं, न जनता के बीच? न जनहित के मुद्दों पर बोलते-जूझते-झगड़ते उन्हें देखा जा रहा है।
सबके सब बस सत्ता के साथ हाथ बांधे खड़े हैं, जैसे कॉरपोरेट कल्चर में मालिक के समक्ष कर्मचारी। नेता जनता से कटता जा रहा और कार्यकर्ता सिर्फ और सिर्फ चुनाव मशीनरी में तब्दील किया जा रहा है।
कार्यकर्ता के लिए 12 महीने काम है कि वह दल व नेताओं को सत्ता में लाए, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए सत्ता कुछ नहीं कर रही। वह हर चुनाव के बाद स्वयं को ठगा महसूस करता है। क्या ये गलत है?
देश को एक परिवार के रूप में देखने का भाषण देने वाले दल के नेता एक-एक परिवार के रूप में काम कर रहे हैं? वे तो आपस में ऐसे लड़ रहे हैं कि एक-दूजे के कार्यक्रमों में आते-जाते भी नहीं। न नेताओं को संघ का डर, न संगठन का। सबके अपने-अपने आका हैं और वे आका का हुकुम बजाने तक सीमित हो गए हैं।
पार्टी में पट्ठावाद यानी ‘अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपने को दे’ वाला चलन चरम पर है। संगठन की ताकत दिन-ब-दिन कमजोर व सत्ता सिरमौर होती नजर आ रही है। अब कड़क अनुशासन के फैसले लेता में संगठन नजर आता है, न ऐसा कोई नेता बचा है, जिसके सामने जाकर मतभेद दूर हो सकें।
भाजपा नेताओं के लिए अब ऐसा कहा जाने लगा है कि ये सब एक अकेले मोदी की ‘पुण्याई’ को खा रहे हैं। जनता मोदी को देखकर वोट कर रही है और नेता इसका बेजा फायदा उठा रहे हैं। पार्टी में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है। विधायक, पार्षद, सांसद आदि जनप्रतिनिधियों के लिए ऊपरी कमाई अब भ्रष्टाचार नहीं, शिष्टाचार बनती जा रही है।
पार्टी में धनबल का ऐसा दौर आ गया है कि सामान्य कार्यकर्ता चुनाव की राजनीति का सोच भी नहीं पा रहा। जमे-जमाए नेता, पार्टी में नया नेतृत्व उभरने ही नहीं दे रहे। विधानसभा क्षेत्रों पर कब्जे ऐसे हो गए हैं, जैसे परिवार की मिल्कियत।
ये मिल्कियत के कब्जे संगठन भी लाख चाहकर भी हटा नहीं पा रहा। तो फिर ये सवाल स्थापना दिवस पर उभरकर आना लाजिमी है न, क्या ये पहले वाली भाजपा है?
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