हिमालय के ‘अदृश्य’ महादेव: पंच केदार के रहस्यों की अनकही गाथा; केदारनाथ के बाद भी अधूरी है आपकी शिव भक्ति, जानिए हिमालय के ‘चार’ गुप्त धामों का रहस्य
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संवाददाता

पत्थरों में नहीं, हिमालय के इन 5 अंगों में धड़कते हैं महादेव, शिव का वो ‘मायावी’ रूप, जो आज भी हिमालय की कंदराओं में है जीवित
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे प्रसिद्ध शिवालय ‘केदारनाथ’ की यात्रा मात्र एक शुरुआत है, संपूर्ण सत्य नहीं? कहते हैं महादेव को ढूंढना हो तो खुद को खोना पड़ता है। उत्तराखंड की बर्फीली वादियों में केदारनाथ की गूंज तो हर ओर है, लेकिन शिव के उस विराट स्वरूप का क्या, जिसकी भुजाएं कहीं और हैं, मुख कहीं और, और जटाएं किसी तीसरी गुफा में?
पंच केदार की यह यात्रा केवल भूगोल की दूरी नापना नहीं, बल्कि महादेव के उस खंडित स्वरूप को अपनी श्रद्धा से पूर्ण करने का नाम है। हिमालय की गोद में यह एक ऐसा रहस्य दफन है जिसे आधुनिक विज्ञान नहीं, सिर्फ श्रद्धा समझ सकती है। हिमालय की दुर्गम चोटियों के पीछे महादेव के चार ऐसे दिव्य स्वरूप छिपे हैं, जिनकी गाथा द्वापर युग के रक्तपात और पांडवों के पश्चाताप से जुड़ी है।
जब महादेव ने बैल का रूप धरकर पांडवों को छकाया, तब उनके शरीर के पांच हिस्से पांच अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए। आज भी, भक्त की आस्था की असल परीक्षा उन्हीं संकरी घाटियों और बादलों के पार छिपे ‘पंच केदारों’ में होती है। केदारनाथ की ‘पीठ’ के दर्शन के बाद शिव के विराट स्वरूप को पूर्ण करने वाली यह यात्रा अध्यात्म और रोमांच का चरम है।
‘केदारखंड’ में पांचों धामों की महिमा का वर्णन
मुख्य रूप से स्कंद पुराण के केदारखंड में इन पांचों धामों की महिमा का वर्णन है। इसके अतिरिक्त महाभारत और शिव पुराण में भी इनसे जुड़ी कथाओं के संकेत मिलते हैं। शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा बताई गई है।
इसमें कहा गया है कि भगवान शिव अपने भक्तों के कल्याण के लिए केदार क्षेत्र में विभिन्न रूपों में वास करते हैं। यद्यपि मुख्य ज्योतिर्लिंग केदारनाथ है, लेकिन अन्य चार स्थान (तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मदमहेश्वर और कल्पेश्वर) महादेव की दिव्य शक्तियों के केंद्र माने गए हैं।
तुंगनाथ: केदारनाथ के बाद इस शृंखला का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है तुंगनाथ। समुद्र तल से 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। यहां महादेव की भुजाओं (बाहुओं) की पूजा की जाती है।
यहां की चढ़ाई भले ही सांसें फुला दे, लेकिन शिखर पर पहुंचते ही जो दृश्य दिखता है, वह अहसास कराता है कि महादेव की शक्तिशाली भुजाएं आज भी इस चराचर जगत की रक्षा कर रही हैं। तुंगनाथ पहुंचने के लिए सबसे पहले आपको चोपता पहुंचना होता है, जिसे उत्तराखंड का मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है।
ऋषिकेश से सड़क मार्ग द्वारा उखीमठ होते हुए चोपता पहुंचना होता है। यह दूरी लगभग 200 किमी की है। चोपता से मंदिर तक मात्र 4 किमी की पक्की चढ़ाई है। यह पंच केदार में सबसे आसान रास्ता माना जाता है।
मदमहेश्वर: चौखंबा शिखर की गोद में बसा ‘मदमहेश्वर’ वह पावन स्थान है जहां भगवान शंकर के मध्य भाग (नाभि) की पूजा होती है। यहां शिव लिंग के स्थान पर एक विशाल पत्थर को नाभि चक्र के रूप में पूजा जाता है। आसपास के मखमली हरे मैदान (बुग्याल) इसे धरती का स्वर्ग बनाते हैं।
इसे पंच केदार की ऊर्जा का केंद्र माना जाता है, जहां पहुंचकर मन की सारी व्याधियां शांत हो जाती हैं। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए उखीमठ को अपना आधार बनाना होता है। ऋषिकेश से उखीमठ और फिर वहां से रांसी गांव तक सड़क मार्ग से जाया जाता है।
रांसी गांव से मुख्य मंदिर तक लगभग 16 से 18 किमी की पैदल चढ़ाई है। यह मार्ग घने जंगलों और बेहद खूबसूरत पहाड़ी ढलानों से होकर गुजरता है।
रुद्रनाथ: पंच केदार यात्रा में रुद्रनाथ की चढ़ाई सबसे दुर्गम और साहसिक मानी जाती है। घने जंगलों और पथरीले रास्तों को पार करने के बाद ही महादेव के मुख के दर्शन नसीब होते हैं। यहां शिव नीलकंठ के रूप में एक प्राकृतिक गुफा में विराजते हैं।
यहां पितृ तर्पण का विशेष विधान है। मान्यता है कि यहां की गई पुकार सीधे महादेव के कानों तक पहुंचती है, क्योंकि यहां आप उनके मुख के साक्षात सम्मुख होते हैं। इसका मुख्य आधार गोपेश्वर (चमोली जिला) है।
गोपेश्वर के पास सगर गांव से पैदल यात्रा शुरू होती है। सगर गांव से लगभग 20-22 किमी की खड़ी और पथरीली चढ़ाई है। अनुभवी ट्रैकर्स भी यहां पहुंचने में 1.5 से 2 दिन का समय लेते हैं।
कल्पेश्वर: अंतिम पड़ाव है कल्पेश्वर, जहां महादेव की जटाएं प्रकट हुई थीं। उर्गम घाटी में स्थित यह मंदिर अपनी सादगी और जीवंतता के लिए जाना जाता है। यह एकमात्र ऐसा केदार है जिसके कपाट साल के 365 दिन खुले रहते हैं।
यहां एक प्राचीन गुफा में स्थित शिवलिंग पर चट्टानों से हमेशा पानी की बूंदें टपकती रहती हैं, जिसे भगवान की जटाओं से अविरल बहती गंगा का प्रतीक माना जाता है।
यहां पहुंचने के लिए ऋषिकेश-बद्रीनाथ हाईवे पर हेलंग नामक स्थान से उर्गम घाटी की ओर मुड़ना होता है। अब सड़क उर्गम गांव तक बन चुकी है। गांव से मंदिर तक मात्र 500 मीटर से 1 किमी का सीधा रास्ता है। यहां पहुंचना सबसे आसान है।
और यह ध्यान भी रखना आवश्यक... इस पूरी यात्रा के लिए ऋषिकेश मुख्य शुरुआती बिंदु है। यहां से आप बस या टैक्सी ले सकते हैं। कल्पेश्वर को छोड़कर बाकी चारों मंदिरों के कपाट सर्दियों (नवंबर से अप्रैल) में बंद रहते हैं।
यात्रा के लिए मई-जून या सितंबर-अक्टूबर का समय सबसे उत्तम है। रुद्रनाथ और मदमहेश्वर के लिए अच्छी ग्रिप वाले जूते और बरसाती साथ रखें, क्योंकि पहाड़ों का मौसम पल भर में बदल जाता है। पंच केदार की यह यात्रा केवल शारीरिक श्रम या पर्यटन नहीं, बल्कि बिखर कर खुद को समेटने और आत्मा के शुद्धिकरण की प्रक्रिया है।
केदारनाथ से शुरू होकर कल्पेश्वर की जटाओं तक पहुंचने वाली ये कड़ियां हमें बताती हैं कि महादेव कण-कण में व्याप्त हैं। इन ‘अदृश्य’ धामों को जानना उस अटूट रिश्ते को समझना है, जो हजारों साल बाद भी हिमालय की चोटियों पर उतना ही जीवंत और जागृत है।
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