महिला वन रक्षकों पर कार्रवाई के बजाय अफसरों का संरक्षण: वन मंडल में महाभ्रष्टाचार पर पर्दा
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का ढोंग करने वाले इंदौर वन मंडल में इन दिनों चल रहे साठगांठ और सौदेबाजी के खेल ने पूरे विभाग की साख को धूल में मिला दिया है। सरकारी फाइलों और बैंक खातों के साथ ‘डिजिटल डकैती’ कर शासकीय धन का गबन करने वाली दागी महिला वन रक्षकों को बजाय सलाखों के पीछे भेजने या तत्काल प्रभाव से निलंबित करने के विभाग के रसूखदार अफसर उन्हें एयरकंडीशंड कमरों में बैठाकर खुला संरक्षण दे रहे हैं।
खुलासा हुआ है कि जिन महिलाकर्मियों ने पशुहानि मुआवजे के नाम पर वित्तीय अनियमितताएं की, महज एक बनावटी माफीनामा और गोल-मोल स्पष्टीकरण पेश किया, उस पर विभाग के आला अफसरों ने अपनी ‘दरियादिली’ दिखाते हुए भ्रष्टाचार की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
वन रक्षक प्रतिभा पाटिल और कंप्यूटर ऑपरेटर नीतू महोबिया ने पशुहानि प्रकरणों में हितग्राहियों के बैंक खातों के साथ जो ‘खेला’ किया, उसे अब महज मानवीय भूल या टाइपिंग की गलती बताकर रफा-दफा किया जा रहा है।
सरकारी पत्र क्रमांक व्यय/1/2025/6318 के जवाब में इन कर्मचारियों ने खुद स्वीकार किया है कि उनसे त्रुटि हुई और शासन को 38 हजार रुपए से अधिक की हानि पहुंची। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी खजाने में सेंधमारी करने के बाद महज खेद प्रकट कर देने से अपराध की श्रेणी बदल जाती है?
सजा के बजाय रसूख के दम पर मिल रही सुख-सुविधाएं... हैरान करने वाला पहलू यह कि विभाग द्वारा वसूली का कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया था, इसके बावजूद इन शातिर कर्मियों ने अपनी मर्जी से 38 हजार रुपए जमा करा दिए, ताकि मामला ठंडा पड़ जाए और किसी भी नई जांच की आंच उन तक न पहुंचे।
भ्रष्टाचार के इस खेल में जिन कर्मचारियों पर दंडात्मक कार्रवाई होना थी, उन्हें फील्ड ड्यूटी से हटाकर कार्यालय के मलाईदार पटलों पर बैठा दिया गया। माधवी सिंगला, प्रतिभा पाटिल, ज्योत्स्ना चौधरी, नेहा वर्मा और पल्लवी निगम जैसी महिला वन रक्षक रसूख के दम पर दफ्तर में जमकर मनमानी कर रही हैं, जबकि इनके साथ ही कंप्यूटर ऑपरेटर रितु, शिखा वैष्णव और अस्थायी कर्मी भी फील्ड के बजाय दफ्तर की सुख-सुविधाओं का आनंद ले रहे हैं।
रेंजर स्तर के आवास पर सिंगला का कब्जा
हद तो तब हो गई, जब रेंजर स्तर के अधिकारियों के लिए आरक्षित आलीशान सरकारी आवास पर वन रक्षक माधवी सिंगला ने अवैध रूप से कब्जा जमा लिया और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक पद्मप्रिया बालकृष्णन के सख्त बेदखली आदेश को रद्दी की टोकनी में डाल दिया।
कई बड़े नामों का होगा खुलासा
भोपाल स्थित प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय की सख्ती के बावजूद इंदौर वन मंडल का तंत्र पूरी तरह कुंभकर्णी नींद में सोया है और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक सतर्कता एवं शिकायत द्वारा 15 दिन में मांगा गया जवाब भी अब तक फाइलों में ही दबा है। स्थानीय अधिकारियों की यह सुस्ती और गोल-मोल जवाब देने की कार्यप्रणाली साफ तौर पर यह बताने के लिए काफी है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यदि इन फाइलों की निष्पक्ष जांच हो, तो कई बड़े अधिकारी भी भ्रष्टाचार की इस लपेट में आएंगे। यही कारण है कि दागियों को बचाने के लिए पूरा महकमा ढाल बनकर खड़ा हो गया है। खुलासा फर्स्ट प्रमुखता से इन मुद्दों का खुलासा करता रहा है, लेकिन जिम्मेदार मूकदर्शक बने बैठे हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या विभाग के पास इतना नैतिक साहस बचा है कि वह इन आस्तीन के सांपों को निलंबित कर सलाखों के पीछे भेजे या फिर साठगांठ का यह शर्मनाक खेल इसी तरह बेखौफ चलता रहेगा।
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