इतिहास के खंडहरों में: धूल खा रहा है गांधी हॉल
KHULASA FIRST
संवाददाता

उपेक्षा और अव्यवस्था का प्रतीक; 25 करोड़ रुपये के जीर्णोद्धार के बाद भी उपेक्षा की शिकार है ऐतिहासिक धरोहर, संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ी खाई
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
किसी भी शहर की पहचान केवल उसकी आधुनिक इमारतों, चौड़ी सड़कों और विकास परियोजनाओं से नहीं होती, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरें उसकी आत्मा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं।
स्वच्छता और विकास के लिए देशभर में पहचान बनाने वाले इंदौर के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में से एक गांधी हॉल आज उपेक्षा और अव्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है।
1904 में होलकर राजवंश ने कराया निर्माण... सन् 1904 में होलकर राजवंश द्वारा निर्मित गांधी हॉल केवल एक भवन नहीं, बल्कि इंदौर के गौरवशाली इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। मूल रूप से ‘किंग एडवर्ड हॉल’ के नाम से स्थापित यह भवन इंडो-गोथिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
1905 में वेल्स के राजकुमार द्वारा इसका उद्घाटन किया गया था, जबकि 1918 में महात्मा गांधी ने यहां अपनी मध्य प्रदेश यात्रा के दौरान एक साहित्य प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था।
1948 के बाद नाम गांधी हॉल रखा... राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति में 1948 के बाद इसका नाम गांधी हॉल रखा गया, जो आज भी शहर की ऐतिहासिक पहचान का प्रमुख प्रतीक बना हुआ है।
विडंबना यह है कि जिस धरोहर को संरक्षित और सहेजकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना चाहिए था, वह आज धूल, जर्जरता और उपेक्षा की कहानी बयां कर रही है।
रखरखाव की कमी... भवन के कई हिस्सों में गंदगी, दीवारों पर दाग-धब्बे, टूट-फूट और रखरखाव की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब कुछ वर्ष पूर्व स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से इसके जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का कार्य किया गया था।
यदि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद धरोहर की स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता, तो यह परियोजना की गुणवत्ता, निगरानी और दीर्घकालिक रखरखाव पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
दरअसल, किसी ऐतिहासिक इमारत का संरक्षण केवल एक बार मरम्मत कर देने से पूरा नहीं होता। इसके लिए निरंतर देखरेख, नियमित रखरखाव और जवाबदेह प्रबंधन व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
दुर्भाग्य से हमारे यहां अधिकांश धरोहरों के साथ यही समस्या है कि करोड़ों रुपये खर्च कर पुनर्विकास तो कर दिया जाता है, लेकिन उसके बाद रखरखाव की जिम्मेदारी कहीं खो जाती है। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।
पीढ़ियां पुस्तकों और तस्वीरों में ही धरोहरों को देख पाएंगी... इंदौर में गांधी हॉल अकेली ऐसी धरोहर नहीं है जो संरक्षण की चुनौती से जूझ रही हो। शहर की कई ऐतिहासिक इमारतें और विरासत स्थल समय, उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के दबाव में अपनी पहचान खोते जा रहे हैं।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियां केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही इन धरोहरों को देख पाएंगी।
नियमित रखरखाव, पारदर्शी निगरानी और जवाबदेही जरूरी... गांधी हॉल की वर्तमान स्थिति सरकार, नगर प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के लिए चेतावनी है कि धरोहर संरक्षण को केवल परियोजना और बजट तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसके नियमित रखरखाव, पारदर्शी निगरानी और जवाबदेही की स्थायी व्यवस्था विकसित की जाए।
साथ ही नागरिकों की भागीदारी भी सुनिश्चित हो, ताकि ऐतिहासिक धरोहरें केवल सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक विरासत के रूप में संरक्षित की जा सकें।
गांधी हॉल केवल ईंट-पत्थरों से बनी एक इमारत नहीं, बल्कि इंदौर के इतिहास, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है। यदि ऐसी धरोहरें उपेक्षा का शिकार होती रहीं, तो एक दिन शहर की ऐतिहासिक स्मृति का भी क्षय हो जाएगा।
विकास और विरासत संरक्षण को साथ लेकर चलना ही किसी आधुनिक शहर की पहचान होती है। इंदौर को यह तय करना होगा कि वह अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को गौरव का विषय बनाए रखना चाहता है या उन्हें धीरे-धीरे इतिहास के खंडहरों में बदलते देखना चाहता है।
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