भाजपा के अनुशासित संगठन में आखिर किसके इशारे पर चलता है मंच: प्रदेश महामंत्री को पीछे बैठने का इशार; महापौर के करीबी की भूमिका ने खड़े किए सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

वरिष्ठ पदाधिकारी की गरिमा से खिलवाड़ पर कार्यकर्ताओं में नाराजगी
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव के निगम आयोजनों में मंच व्यवस्था को लेकर उठते सवाल अब केवल व्यवस्थागत चूक तक सीमित नहीं रह गए हैं। रविवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में आयोजित सुदामा नगर रिंग रोड उद्घाटन समारोह में प्रदेश भाजपा महामंत्री गौरव रणदिवे को पीछे बैठने का कथित तौर पर इशारा किए जाने के बाद भाजपा के भीतर एक बार फिर प्रोटोकॉल, मर्यादा और मंच संचालन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में पूर्व पार्षद भरत पारख का नाम सामने आ रहा है।
मुख्यमंत्री के मंच पर पहुंचने के दौरान रणदिवे भी उनके साथ मंच पर पहुंचे। मंच पर सुमित मिश्रा और श्रवण चावड़ा आगे बैठे थे, जबकि प्रताप करोसिया, सावन सोनकर और मेघराज जैन सहित अन्य नेता भी मौजूद थे।
इसी दौरान भरत पारख द्वारा रणदिवे को पीछे बैठने का इशारा किए जाने की बात सामने आई। बताया जा रहा है कि इस घटनाक्रम से रणदिवे असहज हुए और कुछ देर बाद मंच से उतरकर कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गए।
भरत पारख कौन होते हैं प्रोटोकॉल तय करने वाले?... घटना के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर बैठे नेता को मंच पर कहां बैठना है, इसका निर्णय लेने का अधिकार आखिर किसके पास था?
यदि मंच पर स्थान को लेकर कोई व्यवस्थागत समस्या थी तो उसे कार्यक्रम के आयोजकों या संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के माध्यम से सुलझाया जा सकता था, लेकिन प्रदेश महामंत्री को सार्वजनिक मंच पर पीछे बैठने का संकेत दिया जाना संगठनात्मक मर्यादा और पद की गरिमा के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करता है।
भरत पारख की भूमिका को लेकर अब भाजपा के भीतर यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें पार्टी के प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी या फिर मंच पर व्यवस्था संभालने के नाम पर उन्होंने अपनी भूमिका की सीमा से आगे जाकर हस्तक्षेप किया?
कार्यशैली पर भी होने लगी चर्चा... रविवार की घटना के बाद भरत पारख की कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर चर्चाएं फिर तेज होने की बात कही जा रही है। वरिष्ठ नेताओं के साथ सार्वजनिक मंच पर व्यवहार में संयम, मर्यादा और संगठनात्मक अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में प्रदेश महामंत्री को पीछे बैठने का इशारा किए जाने की घटना ने भरत पारख की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भोपाल तक पहुंची चर्चा, अब संगठन की नजर?... रविवार के घटनाक्रम की चर्चा भाजपा संगठन के भोपाल स्तर तक पहुंचने की बात कही जा रही है। यदि प्रदेश महामंत्री के साथ मंच पर वास्तव में इस तरह का व्यवहार हुआ है तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि संगठनात्मक प्रोटोकॉल और वरिष्ठ पदाधिकारियों की प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय बन जाता है।
अब निगाह इस बात पर है कि भाजपा संगठन इस घटनाक्रम को किस रूप में लेता है और क्या भविष्य में निगम के बड़े राजनीतिक आयोजनों के लिए मंच व्यवस्था और प्रोटोकॉल की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जाएगी।
पहले सत्तन, अब रणदिवे… क्या संयोग है?
महापौर के निगम आयोजनों में वरिष्ठ नेताओं के सम्मान को लेकर इससे पहले भी विवाद सामने आ चुका है। नर्मदा चतुर्थ चरण के भूमिपूजन कार्यक्रम में वरिष्ठ भाजपा नेता सत्यनारायण सत्तन के सम्मान को लेकर विवाद की चर्चा हुई थी और उनके कार्यक्रम से लौटने की बात सामने आई थी।
अब प्रदेश महामंत्री गौरव रणदिवे से जुड़ा घटनाक्रम सामने आने के बाद पार्टी के भीतर सवाल उठ रहा है कि आखिर महापौर के कार्यक्रमों में वरिष्ठ नेताओं के सम्मान और मंच प्रोटोकॉल को लेकर बार-बार विवाद क्यों खड़े हो रहे हैं?
मंच पर ‘मनमानी’ या महज व्यवस्था की चूक?
भाजपा एक कैडर आधारित और अनुशासित राजनीतिक संगठन माना जाता है। यहां प्रदेश महामंत्री का पद संगठनात्मक रूप से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में मुख्यमंत्री की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में प्रदेश महामंत्री के साथ इस तरह का व्यवहार होना सामान्य मंचीय अव्यवस्था मानकर टाल देना भी आसान नहीं होगा।
कार्यकर्ताओं का सवाल है कि क्या अब निगम के कार्यक्रमों में कौन आगे बैठेगा और कौन पीछे, यह संगठनात्मक पद से नहीं बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव से तय होगा?
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