अहम टिप्पणी: वोटर लिस्ट से नाम हटने भर से नागरिकता खत्म नहीं होती; इस मामले में मांगा जवाब
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाने मात्र से उसकी नागरिकता समाप्त नहीं हो जाती।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले में भारत निर्वाचन आयोग (EC) और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका में क्या मांग की गई है?
याचिका में कहा गया है कि जिन लोगों के नाम SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलना बंद नहीं होना चाहिए। साथ ही, नागरिकता से जुड़े मामलों का अंतिम निर्णय होने तक उन्हें सभी वैधानिक सुविधाएं मिलती रहनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता प्रसनजीत बोस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि नागरिकता से जुड़े करीब 34 लाख मामले अभी लंबित हैं, जबकि अब तक केवल 38 हजार मामलों का ही निपटारा हो सका है।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में केवल 19 ट्रिब्यूनल कार्यरत हैं। ऐसे में ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने, उनकी वेबसाइट पर आदेश और नियम सार्वजनिक करने व वैध दस्तावेज रखने वाले लोगों से बार-बार अतिरिक्त दस्तावेज न मांगने की मांग की गई।
योजनाओं का लाभ रोकने का आरोप
याचिका में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत संचालित अन्नपूर्णा योजना सहित कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों को नहीं देने संबंधी अधिसूचनाएं जारी की हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हट गए हैं। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऐसे लोगों को जाति प्रमाणपत्र जारी करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
SIR में 58.20 लाख नाम हटे
याचिका में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.20 लाख नाम हटाए गए हैं। इससे पहले राज्य में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ थी, जो ड्राफ्ट सूची में घटकर 7.08 करोड़ रह गई।
हटाए गए नामों में 24.17 लाख मतदाता मृत पाए गए, 1.38 लाख नाम डुप्लीकेट या फर्जी बताए गए, जबकि 32.65 लाख नाम स्थानांतरण, अनुपलब्धता या अन्य कारणों से सूची से बाहर किए गए।
कोर्ट ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगा है। अब अदालत दोनों पक्षों का पक्ष सुनने के बाद आगे की सुनवाई में इस मामले पर निर्णय करेगी।
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