सड़क पर गुंडागर्दी थाने में खामोशी: कानून पर भारी राजनीतिक रसूख; क्या ये कानून की हत्या नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

पुलिस कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगी या सत्ताधारियों के दबाव में दबकर रह जाएगा ये सनसनीखेज मामला
पत्थर चले, खून बहा...लेकिन सत्तापक्ष से जुड़े आरोपी अब भी आजाद
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शनिवार रात हुआ मामूली विवाद रविवार दोपहर तक देखते ही देखते सत्ता, संगठन और सड़क की ताकत के टकराव में बदल गया। भाजपा और संघ के कार्यकर्ता आमने-सामने हो गए। दिनभर सड़क पर गुंडागर्दी होती रही।
घर, कार्यालय पर पथराव और तोड़फोड़ से शहर शर्मसार होता रहा। भाजपा के विवादित नेता वीरेंद्र शेंडगे समेत सात लोगों पर हत्या के प्रयास जैसा संगीन अपराध भी दर्ज हुआ, लेकिन 24 घंटे से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी एक भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई।
इस बीच, दूसरी तरफ खुलेआम गुंडागर्दी के वीडियो सामने आते रहे, जबकि पुलिस तमाशबीन बनी रही। आरोपियों के सत्तापक्ष से जुड़े होने के चलते थाने में खामोशी है।
यानि कानून पर राजनीतिक रसूख भारी है। ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या कानून सिर्फ आम लोगों के लिए है और सत्ता से जुड़े आरोपियों के लिए उसके मायने बदल जाते हैं?
उल्लेखनीय है कि अन्नपूर्णां थाना क्षेत्र का उषा नगर रविवार को किसी राजनीतिक अखाड़े में तब्दील दिखाई दिया। जिस विवाद की शुरुआत शनिवार रात हुई थी, वह अगले ही दिन हिंसा, पथराव और शक्ति प्रदर्शन में बदल गया।
जानकारी के मुताबिक उषा नगर निवासी नीतेश रात करीब 11 बजे कुत्तों को खाना खिलाने गया था। इसी दौरान भाजपा नेता वीरेंद्र शेंडगे ने उसे टोंक दिया। दोनों के बीच बहस शुरू हुई और नीतेश ने काॅल कर अपने पिता को मौके पर बुला लिया।
इधर, वीरेंद्र ने भी डाॅ. प्रशांत सोनी और अन्य लोगों को कॉल कर लिया। नीतेश ने उषा नगर निवासी संघ पदाधिकारी चेतन पाटिल, परमवीर राठौर और अन्य लोगों को बुला लिया। दोनों तरफ से मारपीट हुई और मामला अन्नपूर्णा थाने पहुंच गया।
सूचना मिलने पर हिंद रक्षक संगठन के एकलव्य गौड़ भी थाने जा पहुंचे। संघ की तरफ से वीरेंद्र गोयल को बुलाया गया। रात करीब 12 बजे उनकी संघ पदाधिकारी वासुदेव पाटीदार से चर्चा हुई और अंतत: संघ और भाजपा से जुड़े वरिष्ठ लोगों के हस्तक्षेप के बाद विवाद शांत हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। रविवार सुबह मेडिकल रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने जयानी आगार निवासी महिला की शिकायत पर भाजपा नेता वीरेंद्र शेंडगे, गिरीश शेडगे, शानू उर्फ सौरभ दिघे, मनीष इमोलिया, प्रशांत सोनी, प्रणय चितौड़ा, अमित कोकाटे समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या के प्रयास, घर में घुसकर हमला करने और अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर लिया। इधर, केस दर्ज होने के कुछ ही घंटे बाद उषा नगर में हालात और बिगड़ गए।
करीब 50 से 100 लोगों की भीड़ ने कथित तौर पर शेंडगे के घर और कार्यालय को निशाना बना लिया। पत्थरबाजी हुई, तोड़फोड़ हुई, वाहनों के कांच फोड़े गए और पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया।
बताते हैं पुलिस बल मौके पर मौजूद था, लेकिन उपद्रवियों को रोकने या तत्काल गिरफ्तार करने जैसी कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दी। वायरल वीडियो भी इसी ओर इशारा करते हैं कि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद उत्पात जारी रहा।
हमलावरों का समूह शेंडगे से जुड़े नरेंद्र तिवारी मार्ग स्थित शानू उर्फ सौरभ दिघे के घर पहुंच गया। वहां भी पत्थरबाजी और वाहनों में तोड़फोड़ की गई। परिजन का आरोप है कि घर में घुसकर हमला किया गया और परिवार के सदस्यों को धमकाया गया।
घटना के बाद शानू की मां की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। दूसरी ओर चेतन पाटिल पक्ष का आरोप है कि शनिवार रात उन पर जानलेवा हमला किया गया था।
सिर में गंभीर चोट लगने के बाद उनका उपचार कराया गया, जिसके आधार पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी स्पष्ट किया कि यह दो पक्षों के बीच का व्यक्तिगत विवाद है और संगठन का इससे कोई संबंध नहीं है।
घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कए... पहला सवाल पुलिस की निष्क्रियता को लेकर है। यदि हत्या के प्रयास का मामला दर्ज हो चुका था तो आरोपी खुलेआम कैसे घूमते रहे? यदि आरोपियों की गिरफ्तारी जरूरी नहीं थी तो फिर इतनी गंभीर धाराएं क्यों लगाई गईं? दूसरा सवाल कानून-व्यवस्था को लेकर है।
एक ही दिन में दो-दो बार तोड़फोड़, पथराव और हमला हुआ। भीड़ घरों और कार्यालयों तक पहुंची। इसके बावजूद पुलिस हालात को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकी? तीसरा और सबसे अहम सवाल राजनीतिक प्रभाव को लेकर उठ रहा है।
आरोपियों में भाजपा से जुड़े नाम सामने आए हैं। विधायक मालिनी गौड़ के प्रतिनिधि प्रणय िचत्तौड़ा का नाम भी एफआईआर में शामिल बताया जा रहा है। ऐसे में विपक्ष और स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या राजनीतिक रसूख कार्रवाई के रास्ते में दीवार बन रहा है?
तब पुलिसकर्मी से किया था विवाद... पूर्व में भाजपा नेता वीरेंद्र शेंडगे का महू नाका चौराहा पर ट्रैफिक पुलिस से रोकने को लेकर विवाद हो गया था। उनका आरोप था कि पुलिसकर्मी ने उन्हें थप्पड़ मारा था।
इसके बाद बड़ी संख्या में कार्यकर्ता महू नाका चौराहा पर एकत्रित हो गए थे। विवाद के बाद चक्काजाम कर दिया गया था। घंटे हंगामा चलता रहा था।
तब भी पुलिस अफसरों को सत्ता पक्ष के सामने झुकना पड़ा था। टीआई और संबंधित ट्रैफिक पुलिसकर्मी को बाने से हटाने के बाद मामला शांत हुआ था।
बिना वारंट कर सकती है गिरफ्तारी... हाईकोर्ट एडव्होकेट मनीष यादव का कहना है कि केस 109, 330(2), 623(5), 296(ए) बीएनएस जैसी धाराओं में दर्ज हुआ है। यह एक बहुत ही संगीन अपराध है।
इसमें पुलिस बिना वारंट के आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती है। वहीं, मामले में एसीपी अन्नपूर्णा शिवेंदु जोशी ने खुलासा फर्स्ट को बताया कि अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। वहीं, वीरेंद्र शेंडगे पक्ष की तरफ से आवेदन लिया गया है, जिसकी जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
सोशल मीडिया पर जमकर पिट रही भद
ये वीरेंद्र शेंडगे स्वीमिंग कोच था, इसके पास करोड़ों रुपए की संपत्ति और आलीशान घर कहां से आया। उसकी संपत्ति की जांच होना चाहिए?
जो देखने में आ रहा है उससे लगता है जल्द ही गंदी स्थिति होने वाली है भारतीय जनता पार्टी की।
बेरोजगारों के पास कोई काम नहीं है।
एक दिन आएगा तुम्हारे पाले हुए तुमको ही मारेंगे। आरोपी सामान्य नागरिक होते तो क्या पुलिस का रवैया यही रहता?
क्या पुलिस की यह चुप्पी कानून का सम्मान है या सत्ता के दबाव का परिणाम?
बगले झांकती पुलिस, सीना ताने खड़े सवाल
क्या नेताओं के लिए अलग कानून? जानलेवा हमले जैसे केस में गिरफ्तारी क्यों नहीं? मामूली गुंडे-बदमाशों के हाथ-पैर तोड़ने वाली पुलिस आखिर सत्ता के सामने बेबस क्यों?
पुलिस को आखिर कार्रवाई से कौन रोक रहा? छोटे-मोटे गुंडे-बदमाशों पर जोर आजमाइश करने वाली पुलिस क्या इन सत्ताधारी पक्ष से जुड़े आरोपियों को सबक सिखा पाएगी?
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