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जलती चिताओं की भस्म से होली: राख से रंगा घाट; नरमुंड, चश्मा लगाकर आए संन्यासी, दिखा आस्था और उत्सव का अद्भुत संगम

KHULASA FIRST

संवाददाता

28 फ़रवरी 2026, 3:30 pm
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जलती चिताओं की भस्म से होली

खुलासा फर्स्ट, वाराणसी।
जलती चिताएं, शोक में डूबे परिजन और उन्हीं चिताओं की राख से होली खेलते नागा साधु-संन्यासी-यह अलौकिक नजारा इन दिनों काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट पर देखने को मिल रहा है।

परंपरागत मसाने की होली
शनिवार को यहां परंपरागत मसाने की होली पूरे विधि-विधान और भक्ति भाव के साथ मनाई जा रही है। घाट पर कोई गले में नरमुंडों की माला डाले नजर आया, तो कोई डमरू की थाप पर नाचता दिखा।

ऊर्जा से भर उठा माहौल
रंग, गुलाल और चिता की भस्म से सराबोर साधु-संन्यासी जब घाट पर उतरे, तो माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।

जश्न के बीच गुजरती रही शवयात्राएं
मसाने की होली के दौरान घाट पर उत्सव और मृत्यु-दोनों का दृश्य एक साथ दिखाई दिया। रंगोत्सव के बीच से शवयात्राएं गुजरती रहीं, जो काशी की उस मान्यता को जीवंत करती हैं, जहां मृत्यु भी मोक्ष का उत्सव मानी जाती है।

विदेशी पर्यटक भी झूमते नजर आए
भारतीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी चिता की राख और रंगों में सराबोर होकर झूमते नजर आए।

डमरू नाद से हुआ शुभारंभ
शनिवार को मसाने की होली का शुभारंभ डमरू वादन से हुआ। डमरू की गूंज के बीच साधु-संन्यासी मणिकर्णिका घाट पहुंचे, पूजन-अर्चन किया और भस्म, अबीर व गुलाल अर्पित किए। इसके बाद चिता भस्म से होली खेली गई।

तीन लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे काशी
मसाने की होली के इस अद्भुत पर्व में शामिल होने के लिए देश-विदेश से तीन लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे हैं। आम दिनों में जिस चिता की राख से लोग दूरी बनाते हैं, उसी राख को आज श्रद्धा और आस्था का प्रतीक मानकर लोग अपने शरीर पर लगाते नजर आए।

मसाने की होली काशी की उस अनूठी परंपरा को दर्शाती है, जहां जीवन और मृत्यु, भय और भक्ति, शोक और उत्सव-सब एक ही घाट पर एक साथ दिखाई देते हैं।

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