ग्रहण से मुक्त हो और गहरे हुए रंग: एक दिन बाद ही सही; शहर में खूब छाई रही होली की रंगत
KHULASA FIRST
संवाददाता

होलिका दहन के एक दिन बाद पहली बार मनी धुलेंडी
याद नहीं आता कि कभी ऐसा भी हुआ हो कि होली आज जली और रंग परसों बरसे, यानी होलिका दहन के बाद
धुलेंडी दूसरे दिन न मनाते हुए तीसरे दिन मनाई जाए। इंदौर में तो इस बार ऐसा ही हुआ। दहन व धुलेंडी के बीच एक दिन के
अंतराल से ये अंदेशा था कि त्योहार का उत्साह व रंग की उमंग इस बार बैरंग सी रहना है। धुलेंडी पर होली है...का शोर
भी बैरंग-बेमन से होने की चिंता पसरी हुई थी। इस बार चंद्रग्रहण जो आ गया था। सब कुछ गड्डमड्ड हो गया था, लेकिन इंदौर
को उत्सव प्रेमी शहर का तमगा यूं नहीं मिला हुआ है। 24 घंटे के लंबे इंतजार के बाद भी जब इंदौरियों ने धुलेंडी मनाई तो इतने
रंग उड़े कि हर तरफ रंगों का गुबार छा गया। यूं लगा जैसे ‘ग्रहण’ से मुक्त जो रंग और भी ज्यादा गहरे-गाढ़े हो चले। खूब रंग उड़े।
होली जैसे बड़े त्योहार के बाद अब मीठी खीर-सिवइयां वाली ईद आ रही है। मुस्लिम बंधु-बांधवों का रमजान जो चल रहा है। इसके
पूर्व अपन का इंदौर एक बार और रंग में तरबतर होगा। अहिल्या नगरी की विश्व प्रसिद्ध रंगपंचमी जो आ रही है।
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कौन कहता है अब होली से ज्यादा जोर रंगपंचमी का हो गया है? होली की रंगत अब पहले जैसी नहीं रही? इस बार तो रंग के इस सबसे बड़े त्योहार पर ‘ग्रहण’ भी लग गया था। जी हां, चंद्रग्रहण के आ जाने से होली का त्योहार ज्योतिषीय गणना में उलझ गया था। मुहूर्त-सूतक व होलिका दहन के अलग-अलग समय ने बड़ा असमंजस सनातन मतावलंबियों के बीच पैदा कर दिया था।
तय हुआ कि होलिका की सजावट व पूजन तो सोमवार को होगा, दहन भी सोमवार को और अगले दिन धुलेंडी नहीं मनेगी। ग्रहण के कारण बदले इस मुहूर्त के कारण त्योहार का उत्साह फीका हो गया। भला ऐसा भी होता है कि जिस रात होलिका का दहन हुआ, दूसरे दिन की सुबह से होली है का...शोर न मचे। रंगों की मस्ती के साथ इस शोर के लिए एक दिन का इंतजार करना हुरियारों के लिए तो किसी सजा से कम नहीं था और सबको लग रहा था कि इस बार यह त्योहार बस रस्म अदायगी तक सिमटेगा।
बुधवार को तो ऐसा कुछ नजर नहीं आया। इस उत्सवप्रिय शहर इंदौर में तो होली ऐसी जोरदार मनाई गई कि ब्रज की जग प्रसिद्ध होली का वह रसिया बरबस स्मरण हो उठा, जिसमें जिक्र था कि किस तरह रंग-गुलाल के गुबार से गगन के बदरा भी लाल हो गए। कल होली पर दिनभर धरती और आसमान के बीच ऐसे ही रंग के गुबार उड़ते रहे। गुलाल, अबीर के सूखे रंगों के बाद अब इस शहर में गीले रंगों के वंदन अभिनंदन की तैयारी शुरू हो गई है। समाज के फाग उत्सवों ने भी जोर पकड़ लिया है। होली की ठिठोली की महफिलें भी सजने लगी हैं।
रंग बरसाती रंगारंग गेर ये गीले रंग लेकर बस अब इंदौर की सड़कों पर निकलने वाली है। इसकी तैयारी शुरू हो गई है। महज चार ही दिन तो शेष हैं। इंतजार तो लखन दादा की उस पारंपरिक फाग यात्रा का भी शुरू हो गया है, जिसमें राधा-कृष्ण टेसू के फूलों से बने रंग बरसाते मातृशक्ति के साथ निकलेंगे। होली के रूप में सामाजिक उत्सव की पूर्णता के बाद अब सर्व समाज के सामूहिक उत्सव के पर्व रंगपंचमी की तैयारियों ने अंतिम रूप धारण करना शुरू कर दिया है।
होली पर भी इंदौर में रंगों की वो ही रंगत छाई, जैसी रंगपंचमी पर रहती है। बस फर्क इतना सा था कि होली अपने-अपने समाज, ईष्ट-मित्र, प्रिय-परिजन व गली-मोहल्लों, मल्टी-सोसायटी में खूब मनी। बस सड़क पर सामूहिकता का दृश्य नहीं था।
रंगों की मस्ती में डूबे हुरियारों के हुजूम और जत्थे तो दिनभर सड़क पर नजर आए, लेकिन ये जुलूस की शक्ल नहीं ले पाए। लिहाजा रंगपंचमी सा दृश्य नहीं बन पाया। इसका आशय ये नहीं कि इंदौर होली नहीं खेलता या खेलना कम कर दिया।
कल कुछ भी कमतर नहीं था, न उत्साह-उमंग, न रंग की तरंग, सब भरपूर था। गली-मोहल्लों से लेकर मुख्य बाजारों व सड़कों तक रंग ही रंग छाए हुए थे। सबसे जोरदार दस्तक थी बाल-गोपालों की टोलियों की। दिन निकलते ही उनके हाथ में गुब्बारे आ गए और इन गुब्बारों से कोई नहीं बच पाया। किसी की पीठ सिंकाई तो किसी के गाल पर झन्नाटेदार गुब्बारा पड़ा। किसी के तो कान पर ऐसा पड़ा कि देर तक सन्न-सन्न का असर बना रहा। इन बच्चों की मस्ती के संग की होली की रंगत की शुरुआत हुई।
बड़े-बूढ़ों ने तो उस रस्म के साथ होली के त्योहार की शुरुआत की, जिसमें गमगीन चेहरे, परिवारों में रंग बरसाया जाता है। अलसुबह से विभिन्न समाजों ने ये रस्म पूरी शिद्दत के साथ निभाई। समाजजन हर उस चौखट पर रंग लेकर पहुंचे, जहां होली के रंग..बेरंग थे।
प्रिय, परिजन के अवसान से दुःखी परिजन के भाल पर गुलाल के टीके के संग जिंदगी में फिर रंग भरने का ये काम समाजजन ने गमी के रंग की रस्म निभाकर पूर्ण किया। व्यक्तिगत तौर पर भी लोग अपने उन परिचितों तक रंग लेकर पहुंचे, जिन्होंने इस बरस अपनों को खोया।
इस काम में न केवल पुरुष, बल्कि महिलाएं भी पीछे नहीं थीं। महिलाओं की सामाजिक गेर भी समाज के गमगीन घरों तक लोटे में गीला, गाढ़ा व पक्का रंग लेकर पहुंची।
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