अन्नदाता सड़क पर: सरकार मौन; चार गुना मुआवजा और सर्विस रोड की मांग
KHULASA FIRST
संवाददाता

1000 ट्रैक्टर मार्च इंदौर से भोपाल तक, मुख्यमंत्री को देंगे ज्ञापन
"किसान करेंगे भोपाल कूच"
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के पश्चिमी हिस्से में बन रहे ग्रेटर रिंग रोड (पश्चिम बायपास) के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों और सरकार के बीच टकराव अब सड़क पर उतरने वाला है। मुआवजे की दर को लेकर महीनों से चल रही खींचतान अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है।
किसान बाजार दर से चार गुना मुआवजे की मांग पर अड़े हैं, जबकि सरकार दो गुना मुआवजा देने पर सहमत है। इसे लेकर करणी सेना परिवार के नेतृत्व में प्रभावित किसान 20 जुलाई को इंदौर से भोपाल तक 1000 ट्रैक्टरों का विशाल मार्च निकालकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपेंगे।
जिले की तीन तहसीलों के एक हजार किसान प्रभावित... केंद्र सरकार के नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा बनाए जा रहे इस रिंग रोड परियोजना के दायरे में इंदौर जिले की तीन तहसीलों के लगभग एक हजार किसान प्रभावित हो रहे हैं। सांवेर, हातोद और देपालपुर के 39 गांव इसकी जद में हैं। किसानों का कहना है कि अधिग्रहण के बावजूद अब तक इन गांवों में सर्विस रोड का निर्माण शुरू नहीं हुआ, जो उनकी नाराजगी की एक और बड़ी वजह है।
आंदोलनकारी किसानों की प्रमुख मांग अधिग्रहित भूमि का बाजार दर से चार गुना मुआवजा और नेशनल हाईवे के दोनों ओर सर्विस रोड निर्माण की है। किसानों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप उन्हें अधिग्रहण पर चार गुना मुआवजा मिलना चाहिए, लेकिन प्रशासन गाइडलाइन दर के आधार पर मुआवजा तय करने पर अड़ा है, जो दो गुना के बराबर बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री को सौंपे जाने वाले ज्ञापन में इसके सहित अन्य मांगें भी शामिल हैं...वर्तमान गाइडलाइन के अनुसार अधिग्रहित भूमि का चार गुना मुआवजा। भूमिहीन होने वाले किसानों के लिए विशेष पुनर्वास एवं रोजगार पैकेज। भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों में निष्पक्ष मध्यस्थता।
इंटरचेंज निर्माण के नाम पर अनावश्यक अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण पर रोक। किसानों को समय पर पर्याप्त खाद उपलब्ध कराना और खाद की कीमतों में राहत। नीलगाय एवं अन्य जंगली पशुओं से फसलों को हो रहे नुकसान का स्थायी समाधान।
...ताकि किसानों की आवाज सरकार तक पहुंचे... करणी सेना परिवार का कहना है कि किसान विकास कार्यों के विरोधी नहीं हैं और प्रदेश के विकास के लिए अपनी भूमि, श्रम व योगदान देने को सदैव तैयार रहे हैं, लेकिन विकास के नाम पर किसानों के अधिकारों, सम्मान और आजीविका से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
संगठन के अनुसार यह ट्रैक्टर रैली किसी प्रकार का टकराव या विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से किसानों की आवाज़ सरकार तक पहुंचाने का प्रयास है। करणी सेना परिवार ने विश्वास जताया कि प्रदेश सरकार किसानों की समस्याओं को गंभीरता से सुनेगी और न्यायोचित निर्णय लेकर प्रभावित परिवारों को राहत देगी। संगठन ने सरकार से आग्रह किया है कि पारदर्शी एवं न्यायसंगत निर्णय लिया जाए, ताकि विकास और किसानहित दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकें।
पहले भी हो चुका है आंदोलन...किसानों का यह विरोध नया नहीं है। इससे पहले भारतीय किसान संघ के नेतृत्व में भी इसी मुद्दे पर आंदोलन हो चुका है, जिसके बाद राज्य सरकार ने जमीन की खरीद-बिक्री की गाइडलाइन दर में बढ़ोतरी कर मुआवजा निर्धारित किया था।
किसानों के मुताबिक इसके बाद राज्य सरकार चार गुना मुआवजा देने से जुड़ा कानून भी लेकर आई थी और इसी आधार पर अब किसान चार गुना मुआवजे की मांग पर कायम हैं। नेशनल हाईवे अथॉरिटी द्वारा भी अपनी परियोजनाओं में होने वाले भूमि अधिग्रहण के बदले में गुणांक दो, यानी चार गुना मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है।
फिर भी राज्य सरकार द्वारा दो से तीन गुना मुआवजा ही निर्धारित किया गया और वह भी गाइडलाइन के आधार पर।
20 जुलाई को इंदौर से भोपाल तक ट्रैक्टर मार्च... किसानों की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए करणी सेना परिवार के नेतृत्व में 20 जुलाई को विशाल ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया जा रहा है। रैली इंदौर से भोपाल के लिए प्रस्थान करेगी और वापसी भी होगी।
इसके लिए किसानों ने धन संग्रह और आवश्यक साजो-सामान जुटाना शुरू कर दिया है। करीब एक हजार ट्रैक्टरों के इस मार्च में सांवेर, हातोद और देपालपुर तहसील के 39 गांवों के किसान और ग्राम प्रतिनिधि शामिल होंगे।
प्रभावित होने वाले किसान और उनकी जमीन
रिंग रोड परियोजना के दायरे में इंदौर जिले की तीन तहसीलों- सांवेर, हातोद और देपालपुर के 39 गांव आ रहे हैं। संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार-
तहसील प्रभावित अधिग्रहित भूमि
किसान (हेक्टेयर)
सांवेर 454 189.4392
हातोद 363 165.3972
देपालपुर 174 87.3073
(कुल 991 किसानों की 442.1437 हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण हो रहा है।)
जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आक्रोश
आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि प्रभावित क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की नाकामी और स्वार्थगत राजनीति के कारण उन्हें आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। क्षेत्र के विधायकों और सांसदों ने किसानों के पक्ष में काम नहीं किया।
नेताओं ने किसानों के आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की। स्टेट हाईवे के विरोध में हुए आंदोलन भी नेताओं के निकम्मेपन के कारण हुए। सरकार ने आंदोलन की ताकत देख किसानों की मांगें मानी, लेकिन इसका श्रेय लेने नेता खड़े हो गए थे, जबकि यह आंदोलन पूरी तरह गैर राजनीतिक है। किसान विरोधी राजनीति के चलते हो रहे आंदोलनों के कारण सरकार की ही बदनामी हो रही है।
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