पहले डामर, फिर सीमेंट, जनता की गाढ़ी कमाई पर चला बुलडोजर: निगम का गजब कारनामा: सरकारी खजाने और जनता के समय की बर्बादी, छावनी क्षेत्र में सड़क निर्माण के नाम पर खेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट...इंदौर।
नगर निगम की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मास्टर प्लान के तहत छावनी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के लिए प्रशासन ने स्थानीय लोगों के आशियाने तोड़े और उन्हें बेघर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन निगम के इंजीनियरिंग विभाग की अदूरदर्शिता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर अब यह निर्माण कार्य एक भद्दा मजाक बनकर रह गया है।
हाल ही में निगम ने जिस सड़क को बड़े तामझाम के साथ डामर से तैयार किया था, उसे कुछ ही समय के भीतर फिर से खोद डाला गया। अब उसी स्थान पर सीमेंट की सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। यह कोई मामूली चूक नहीं, बल्कि इंदौर के करदाताओं के टैक्स के पैसों की सरासर बर्बादी है। जिस डामर की सड़क को बनाने में लाखों रुपये खर्च किए गए, उसे बिना किसी ठोस कारण के खोदकर नष्ट कर देना निगम के अधिकारियों की नियोजन क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या विभाग के पास निर्माण कार्य शुरू करने से पहले कोई स्पष्ट योजना नहीं थी?
एक ही सड़क पर पहले डामर और फिर सीमेंट का निर्माण इस बात को पुख्ता करता है कि निगम में काम करने का कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं है, बल्कि केवल कागजी खानापूर्ति और बिलों का भुगतान सुनिश्चित करने के लिए मनमानी की जा रही है। स्थानीय लोग इस तमाशे को देख कर हतप्रभ हैं। सड़क निर्माण में हुई इस धांधली ने पूरे इलाके में धूल और गंदगी का अंबार लगा दिया है। निगम के इस 'खोदो और बनाओ' खेल के कारण यातायात पूरी तरह बाधित हो गया है और लोगों का जीवन दूभर हो गया है। हैरानी की बात यह है कि निगम के जिम्मेदार आला अधिकारी इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्या इस बर्बादी की जवाबदेही तय की जाएगी या फिर भविष्य में भी इंदौर की जनता का पैसा इसी तरह निर्माण के नाम पर गड्ढों में भरा जाता रहेगा?
लोगों की तकलीफों से ज्यादा ठेकेदारों के हितों की चिंता
मास्टर प्लान के नाम पर मकान तोड़े गए, उम्मीद थी कि शहर को बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन निगम ने अपनी अक्षमता से साबित कर दिया है कि उन्हें जनता की तकलीफों से ज्यादा अपने ठेकेदारों के हितों की चिंता है। अब सवाल यह है कि इस दोहरी लागत और अनावश्यक खोदाई का खर्च किसकी जेब से भरा जाएगा?
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