यहां डर से बहुत पुराना नाता है: बात पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंद्रशेखर शर्मा 94250-62800 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश के राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा चर्चित पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा दिन न बचे। पता हो कि इस राज्य की 294 सदस्यों वाली विधानसभा के दो चरणों में होने जा रहे चुनाव के लिए इसी माह की 23 और 29 तारीख को मतदान होगा। वोटों की गिनती होगी। इसके करीब एक हफ्ते बाद। यानी आगामी चार मई को और इसी दिन नतीजे भी सामने होंगे। चलिए, इस बार इसी चुनाव के चाल-चलन पर थोड़ी बात करते हैं।
दरअसल बहुत लोग हैं, जिन्हें चुनाव में इस बार भाजपा का कमल पूरे शबाब पर खिलने के आसार लग रहे हैं! बोले तो उन्हें भाजपा की जीत की खुशबू आ रही है और इसके पीछे कुछ दमदार वजहें भी।
नमूने के लिए एसआईआर है, उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट व देश के चुनाव आयोग की सक्रियता है और है इस सबसे बुरी तरह परेशान वहां की लड़ाका मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हाथ-पैर पटकना।
बताते हैं कि इस एसआईआर की वजह से वहां की मतदाता सूची में से 80 लाख से भी ज्यादा नाम फाइनली ‘डिलीट’ हुए हैं या होंगे। ये तो हुई एक कायदे की बात और दूसरा बहुत अहम तथ्य यह कि पश्चिम बंगाल चुनाव का डर से बहुत पुराना नाता है। जी हां, वहां की चुनावी हिंसा और उसके सिलसिले से शायद ही कोई हो, जो नाफहम यानी अपरिचित हो।
जानकार कहते हैं कि वहां चुनाव में इस डर के बीज डाले गए सत्तर के दशक में। बोले तो छप्पन (मजेदार संयोग देखिए!) बरस पुराना हो गया है डर का यह सिलसिला। तब वहां शुरू इसे ‘लेफ्ट’ ने किया था। अलबत्ता उस पर जाने से मतलब नहीं। हां, आप ताजा हालात जान लीजिए।
वो हालात यह हैं कि वहां 1970 से ही एक ‘गुंडा कैडर’ रहा है। इसका ताजा स्वरूप यह है कि आप किसी भी मोहल्ले, कॉलोनी, या सोसायटी में आदि में रहते हों, वहां सब जगह इनका दखल है।
दखल बोले तो आपके यहाँ शादी हो, तलाक हो, पुलिस थाने का मसला हो, कोर्ट जाना हो या और कोई मसला हो यानी हर जगह यह कैडर आपको हांकता है कि आपको यह करना है और यह नहीं।
जमा इस कैडर को लोकल पुलिस से लेकर प्रशासन और कोर्ट तक द्वारा खूब संरक्षण दिया जाता है। बदले में ऐसा नहीं कि इस कैडर को सिर्फ चुनाव के समय नकदी देने के साथ शराब बांटने आदि काम संभालने को कहा जाता है, बल्कि पूरे पांच साल यह कैडर अपनी दादागीरी वाली मनमानी चलाता है और तमाम तरह की वसूली में सरकार से लाभान्वित होता है! बोले तो एक किस्म का गुंडाराज! इधर, ताजा वीडियोज सामने आए हैं
इन वीडियोज में टीएमसी के लोकल नेता लोगों के घर जाकर खुलेआम धमका रहे हैं कि ‘वोट टीएमसी को ही देना वरना चुनाव के बाद सबको देख लेंगे।’ धमकाने वाले ये नेता उसी गुंडा कैडर के नुमाइंदे हैं। खास बात यह कि वहां के लोग इस ‘वरना’ के नतीजे 1970 से देखते-भुगतते आ रहे हैं तो उनका भयाक्रांत होना लाजिमी भी।
सो जानकारों का कहना है कि तमाम बातें अपनी जगह लेकिन भाजपा यहां केवल एक ही सूरत में जीत सकती है। वो यह कि वो मतदाताओं के मन से इस कैडर के उस ‘डर’ को निकाल फेंके। गोया कमल की राह में डर का दलदल ही एकमात्र बाधा है।
इस सिलसिले में बताना बनता है कि इस चुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा और मोदी सरकार से दूबदू लड़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आप देखिए उन्होंने ईडी और सीबीआई के अधिकारियों पर चढ़ाई से लेकर चुनाव आयोग तक से पंगे लेने में कोई गुरेज नहीं किया है।
उधर, मतदाताओं के उस डर के इलाज के लिए यह भी देखना बनता है कि भाजपा के चुनावी चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह पश्चिम बंगाल पहुंच चुके हैं। जमा केवल पहुंचे नहीं हैं, बल्कि, उन्होंने कहा है कि वो 15 दिन वहीं रहेंगे। इसका एक मतलब यह है कि देश का गृह मंत्री 15 दिन वहीं कैम्प करेगा।
मालूम हो कि इस चुनाव में भारी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बल भी वहां तैनात होगा। कुल मिलाकर बात यह है कि बेशुमार लोगों को वहां इस बार ‘कमल-राज’ आता दिख रहा है। अलबत्ता चार मई को सब साफ हो ही जाना है।
यद्यपि ऐसे चुनावों में यह चलन अकसर देखने में आता है कि लोग सरकार बदलते ज्यादा हैं और चुनते कम हैं और यह थोड़ी बारीक बात है। पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए 148 सीटें चाहिए होती हैं और एक राजनीतिक प्रेक्षक का कहना है कि ममता बनर्जी इस बार सौ का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएंगी।
बहरहाल अमित शाह से याद आये आदित्यनाथ योगी। सो इसलिए कि योगी ने विधानसभा में कहा था ‘माफिया को मिट्टी में मिला देंगे।’ नतीजा सबको पता। दूसरी तरफ अमित शाह हैं और योगी ने यदि एक राज्य के माफिया को मटियामेट किया है तो मोटा भाई ने कई राज्यों में फैले नक्सलवाद से देश को मुक्त कर दिखाया है।
हालांकि बात इन दोनों की तुलना की उतनी नहीं है, जितनी यह है कि डर कितना ही गहन या कद्दावर हो, सिर्फ एक निश्चय से उसे चूहा साबित किया जा सकता है। (यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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