भूमि अधिग्रहण को लेकर किसान फिर लामबंद, करेंगे आंदोलन: विवादों के लिए पृथक ट्रिब्यूनल बनाने की मांग
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देशभर में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सरकार और भूमि स्वामियों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। किसान अधिग्रहण के खिलाफ है। सरकार कानूनी छल कपट से जमीन छीन रही है। नतीजे में टकराव बढ़ता है।
सरकारी अधिकारी है कि आंदोलन के अलावा दूसरी भाषा समझते नहीं। ऐसा नहीं हो इसलिए किसान, भूमि अधिग्रहण की सरकारी मनमानी थोपे जाने वाले कानून का जवाब अब कानून की भाषा से देंगे।
भूमि अधिग्रहण पर देशव्यापी कार्यशाला आयोजन के तहत भारतीय किसान संघ की कार्यशाला में यह विचार अतिथियों द्वारा व्यक्त किए गए। कार्यशाला में अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश दत्तात्रेय कुलकर्णी, भारतीय एग्रो इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष प्रमोद चौधरी, कोषाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल, क्षेत्र संगठन मंत्री महेश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना, प्रांत मंत्री अतुल माहेश्वरी, अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण पटेल, दिलीप मुकाती, कृष्ण पाल सिंह, आनंद सिंह ठाकुर, पूर्व संभागायुक्त, हाई कोर्ट एडवोकेट, वरिष्ठ वकील, पत्रकार, किसान आदि उपस्थित थे।
कार्यक्रम में दिनेश कुलकर्णी ने कहा कि सरकार भूमि अधिग्रहण संबंधित विषयों/ विवादों के लिए पृथक ट्रिब्यूनल बनाए। भारतीय किसान संघ भूमि अधिग्रहण को लेकर देशभर में कार्यशाला आयोजित कर रहा है।
इसी तारतम्य में इंदौर के कृषि महाविद्यालय में एक कार्यशाला का आयोजन किसान संघ ने किया। इस आयोजन का निष्कर्ष यह रहा कि ग्रामीण हो या शहर भूमि स्वामियों के साथ सरकार पूरी तरह असंवेदनशील अमानवीय और अंग्रेजों की तरह व्यवहार करती है।
प्रदेश में कम मुआवजा
प्रदेश में इतना कम मुआवजा दिया जाता है कि दो गज जमीन भी खरीद नहीं सकते। पटवारी से लेकर कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर मुख्य सचिव और मुख्य सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक किसान या भूमि स्वामी की कोई सुनवाई नहीं होती। मजबूरन प्रभावितों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है, जहां बरसों बरस तक न्याय नहीं मिलता और पक्ष में निर्णय आ भी जाए तो सरकार के अफसर हैं कि कानून और फैसले को अपने तरीके से परिभाषित करते हुए इसे मानते नहीं।
1894 भूमि अधिग्रहण के काले कानून को बनाया हथियार
अंग्रेजों के बनाए 1894 भूमि अधिग्रहण के काले कानून को हथियार बनाकर मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में किसानों से कानून का उल्लंघन करते हुए खेती की उपजाऊ सिंचित भूमि नौकरशाही द्वारा एक तरह से छीनी जा रही है। भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अंतर्गत भू अर्जन शुरू किया जाता है।
इसके बाद की सारी कार्यवाही अंग्रेजों के समय के काले कानून के अनुसार की जाती है। यही कारण है कि सरकार और किसानों के बीच संघर्ष की स्थिति बनती है। शहर में दो गुना और ग्रामीण क्षेत्र में चार गुना मुआवजा 2013 के कानून अनुसार नहीं दिया जा रहा है। इससे भूमि स्वामी मजबूरन आंदोलन को बाध्य होते हैं। विकास योजना की डीपीआर कभी सार्वजनिक नही की जाती है। यही नही, मुआवजे का निर्धारण 2013 के कानून को ताक में रखकर किया जाता है।
विस्थापित को कानूनी जानकारी नहीं
कार्यशाला में यह तथ्य भी सामने आया कि ग्रामीणों की स्थिति तो यह है कि विकास योजना से प्रभावित विस्थापित होने वालों को कुछ भी कानूनी जानकारी नहीं होती। कुलकर्णी ने कहा कि किसानों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आंदोलन की राह पर चलना होगा तभी सरकार नींद से जगाती है।
अधिकारियों का सामना करने के लिए किसानों को कानून की जानकारी और कानूनी मदद के लिए किसान संघ के समूह बनाए जा रहे हैं। कार्यशाला में पीड़ित भूमि स्वामियों के साथ कानून के जानकार और कानूनी लड़ाई लड़ रहे लोगों ने बताया कि मध्य प्रदेश में भूमि अधिग्रहण की सरकार की सोची-समझी सुनियोजित रीति-नीति के खिलाफ हर राज्य के किसानों में गहरा आक्रोश है।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 अपने आप में लगभग पूर्ण है इस कानून को पूरी तरह लागू नही किया गया है। इस दौरान प्रमोद चौधरी ने हाईवे,सड़कों, अस्पताल, बांध, नहर, औद्योगिक विकास, एअरपोर्ट या किसी भी प्रकार से भूमि लेने के विषयों को रखा।
समापन सत्र में अखिल भारतीय संघठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी ने संबोधन कर भूमि अधिग्रहण कानून पर मध्य प्रदेश में भी पुनर्विचार कर आवश्यक है। इस अवसर पर प्रांत महामंत्री रमेश दांगी, प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना, सह संगठन मंत्री दिनेश शर्मा आदि उपस्थित थे।
कार्यशाला में प्रस्तुत सुझाव
जिस उद्देश्य के लिए जमीन ली ह, वह पूर्ण नहीं हो तो जमीन वापस दें।
स्थापित प्रोजेक्ट में भूमि मालिक को भी शेयर होल्डर बनाएं। { एक योजना के लिए एक जैसा मुआवजा मिले। {कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित न हो। {कोई भी योजना लाने से पहले भौतिक सत्यापन हो, ताकि बाद में संघर्ष पैदा नहीं हो।
{विकास प्राधिकरण के नाम पर जमीन का व्यापार हो रहा है कानून का पूर्ण रूप से पालन होना चाहिए, उसके लिए जवाब देही तय हो।
{ फास्ट ट्रैक कोर्ट बने। { मुआवजा गणना के संबंध में पुनर्विचार किया जाए। { बाजार मूल्य से किसानों को मुआवजा दिया जाए। { भूमि के बदले भूमि दी जाए।
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