‘दवाई लूटकांड’ का खुलासा होने के बाद भी जिम्मेदारों ने साधी चुप्पी: कमीशनखोरी के आरोप में घिरे डॉ. जैन दम्पति
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रतिभा हॉस्पिटल एंड आईवीएफ सेंटर से जुड़े एक कथित ‘दवाई लूटकांड’ का खुलासा होने के बाद भी जिम्मेदारों की चुप्पी ने प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी है मामले में पीड़ित परिवार शहर के प्रथम नागरिक पुष्यमित्र भार्गव का रिश्तेदार है। खुलासा होने पर मौके पर पार्षद भी विरोध करने पहुंचे थे, इसके बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव चर्चा का विषय है।
सूत्रों के अनुसार प्रतिभा हॉस्पिटल एंड आईवीएफ सेंटर के संचालक डॉ. भरत जैन और डॉ. मून जैन पर आरोप है सस्ती जेनेरिक दवाओं को महंगी एथिकल (ब्रांडेड) बताकर मेडिकल स्टोर के माध्यम से मरीजों से भारी वसूली कर रहे हैं। इसका खुलासा खुद पीड़ित परिवार के डॉक्टर सदस्य ने किया, जिससे मामला और गंभीर हो गया।
सबसे बड़ा सवाल है जब महापौर के अपने रिश्तेदार लूट के शिकार हैं, तब भी अस्पताल पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। क्या राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक उदासीनता के चलते मामले को दबाया जा रहा है? खाद्य एवं औषधि प्रशासन के रिकॉर्ड में मोहम्मद अनस अंसारी को पंजीकृत फार्मासिस्ट बताया गया है, जिनका लाइसेंस 2027 तक वैध है लेकिन मौके पर उनकी अनुपस्थिति गंभीर गड़बड़ी की ओर संकेत करती है।
80 वर्षीय महिला के इलाज में गंभीर लापरवाही का आरोप
एक 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला नंदकुंवर शर्मा के इलाज को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनके अनुसार भर्ती के दौरान लिया गया यूरिन सैंपल जांच के लिए लैब तक नहीं पहुंचा। यूटीआई (यूरिन संक्रमण) का इलाज समय पर नहीं किया गया। केवल सोडियम का उपचार देकर दो दिन में छुट्टी दे दी गई। हालत बिगड़ने पर दोबारा भर्ती से संक्रमण की पुष्टि हुई। परिजनों का कहना है उक्त अस्पताल में दवाइयों की कीमतों में भारी अंतर पाया गया। 200 रुपये का इंजेक्शन 1200 रुपए में बेचा गया।
हाई कोर्ट में जनहित याचिका फिर भी कार्रवाई गायब
मेडिकल जांच और दवाइयों की कीमतों में भारी अंतर को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर ठोस कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करता है।
अस्पतालों में अनियमितताओं की भरमार
शहर के कई अस्पतालों में अनियमितताओं और कमीशनखोरी की शिकायतें पहले भी सामने आ
चुकी हैं।
36 से अधिक अस्पतालों में फायर सेफ्टी सिस्टम नहीं
आवासीय क्षेत्रों में अवैध संचालन
सीएमएचओ कार्यालय को कई शिकायतें की गईं इसके बावजूद न तो सख्त जांच दिख रही है और न ही प्रभावी कार्रवाई।
क्या स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ कमाई का जरिया बन गई हैं?
क्या प्रशासन और अधिकारी सिर्फ राजनीतिक संतुलन साधने में लगे हैं?
जब वीआईपी परिवार को न्याय नहीं तो आम जनता का क्या होगा?
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