भूलना मत: हिंदू होने पर मिली मौत; कश्मीर घूमने जरूर जाओ, आतंकी हरकत याद रखना
KHULASA FIRST
संवाददाता

पहलगाम हमले की पहली बरसी पर देश एक बार फिर गमगीन
प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री ने ‘आतंकिस्तान’ को किया आगाह, भूले नहीं हम पहलगाम
सालभर बीत गया, पीड़ितों के परिवारों में अब तक नहीं सूखे आंखों से आंसू
परिजन को रह-रहकर याद आते हैं हताहत हुए बेटे, पति, पिता, भाई
भुलाए नहीं भूल रहा वह भयानक मंजर, धर्म पूछकर करीब से दागी थी कायरों ने गोलियां
हमले को एक बरस पूरा होने पर देश ने लिया आतंक के खात्मे का संकल्प, घटनास्थल पर श्रद्धांजलि
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बीते साल की तारीख 22 अप्रैल और इसी तारीख पर हुई 26 मौतों को याद कर भारत एक बार फिर गमगीन है और गुस्से में भी। कोलकाता, करनाल, कानपुर से लेकर इंदौर जैसे उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक गम एक समान पसरा हुआ है। जिन्होंने अपने प्रियजन को इस जघन्य हत्याकांड में खोया, उनकी आंखों से आंसू अब तक सूख नहीं पाए हैं।
जिन आंखों से आंसू बह नहीं रहे, वे पथरा गई हैं। पथराई आंखें शून्य में ताकती रहती हैं कि अब बस वे लौट आएंगे, जिनके साथ धरती की जन्नत हंसी-खुशी घूमने गए थे। जिस जगह को स्वर्ग समझ तफरीह को गए थे, वहीं से स्वर्गवासी होकर लौटने का किसने सोचा था। लेकिन पड़ोस के मुल्क से भारत में आए और भारत के कुछ गद्दारों द्वारा छिपाए गए चंद कायरों ने मौत बरसा दी।
मौत भी धर्म के नाम पर, धर्म का पूछकर। बस, इतना सुनना काफी था कि हिंदू हैं। उसके बाद शरीर से सटाकर गोली दाग दी गई। पत्नी, बच्चों के सामने, बहन के सामने, मां के सामने। रत्तीभर भी रहम नहीं किया उन जल्लादों ने, जो निहत्थे व निर्दोष हिंदुओं को मारकर स्वयं को बहादुर मान रहे थे। हिंदुस्तान आतंकिस्तान, यानी पाकिस्तान के कायरों के कृत्य को भूला नहीं है... याद रखना... ‘सिंदूर’ अभी तक सुलग रहा है।
कश्मीर घूमने जाओ, कोई गुरेज नहीं। घाटी की शान में कसीदे भी पढ़ो, कोई दिक्कत नहीं। वादियों से लाड़ लड़ाओ, कोई समस्या नहीं। लेकिन भूलना मत पहलगाम को। बिसराना मत बेसरन घाटी को। स्मरण रखना, कैसे धर्म पूछकर गोलियां मारी गई थीं। भुलना मत, हिंदू होने की कीमत कैसे चुकाई थी।
इस्लाम के नाम से दहशतगर्दी का मंजर सदा आंखों के सामने रखना। सिर से सटाकर मारी गई गोलियां याद रखना। रोती-बिलखती बहन, बेटियां, मां व मासूम बच्चों के चेहरे याद रखना। खुशनुमा वादियों की मस्ती में इतना मशगूल मत हो जाना कि अपनों का दर्द भूल जाओ। इस मुल्क को मिले घाव भूल जाओ।
भूलना मत उस बेटी का दर्द, जिसके हाथ में शादी की मेहंदी का रंग गाढ़ा ही था। उस सिंदूर को भी मत भूलना, जो मांग में गहराई तक दमक रहा था। उस बेटे को भी मत भुला देना, न उस बिटिया को, जिनकी शादी हुए सप्ताहभर भी नहीं बीता था। उस पिता को भी मत भूलना, जो अपने बच्चों को बचाते हुए काल-कवलित हो गया।
उस सुहागिन का दर्द भी अपना समझना, जो सालभर बाद भी उस भयानक मंजर को याद रख फूट-फूट रो पड़ती है। जान बचाकर भागते, जान की भीख मांगते निहत्थों को भूलना मत और भूलना मत उन क्रूर चेहरों को, जो इस्लाम के नाम पर मौत देकर चले गए। उन बूढ़े मां-बाप को मत नजरअंदाज कर देना, जिन्होंने घर में मीठा बनाना तो दूर, बाजार से मीठा लाकर खाने की भी हिम्मत न जुटाई।
उस युवा बेटे की पीड़ा को अपने हृदय में महसूस करना, जिसके पिता ये कहते हुए कायर इस्लामी आतंकियों की गोली का शिकार हो गए कि बेटा, मां व बहन का ध्यान रखना। किसी की गोद सूनी हुई, किसी का सुहाग छीना गया, किसी के हाथ की कलाई की राखी बिछड़ गई, किसी के सिर से पिता का साया उठ गया।
ये तमाम खौफनाक मंजर आंखों में सदा समाए रखना। कश्मीर बहुत सुंदर है, लेकिन ये कुरूपता इसी घाटी में हिंदुओं को मिली है... भूलना मत। आज ही के दिन पहलगाम में एक-दो नहीं, पूरे 26 निहत्थे हिंदुओं को इस्लामिक, जेहादी आतंकवादियों ने सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया था कि वे सनातनी धर्म को मानने वाले हैं।
जन्नत की हूरों के पास जाने के ख्वाब पालने वालों ने उन निहत्थों पर अपनी कायरता का प्रदर्शन किया, जो बाल-बच्चों, परिवार के संग घूमने आए थे। उस घाटी में वे भरोसे के साथ आए थे, जो आतंक का अड्डा थी। बावजूद वे आए, ताकि वादियों के पुराने दिन, रंगत, रोजगार व जिंदगी पुनः लौटे। बड़ा दिल लेकर कश्मीर आए हिंदुओं को बर्बरता के साथ मारना जेहाद है? धिक्कार है, जेहाद शब्द को बदनाम व शर्मसार करने वाले आतंकियो! देश तुम्हारे इस कायर जेहाद को कभी नहीं भूलने वाला।
सावधान! जेहादियो, जख्म अभी हरा ही है, भरा नहीं...
पहलगाम की बरसी पर देश का जख्म फिर हरा हो गया। प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री व रक्षामंत्री ने एक बार फिर आतंक के खिलाफ लड़ने के अपने संकल्प को दोहराया। देश के हुक्मरानों ने पाकिस्तान व पाकपरस्त आतंक के आकाओं को एक बार फिर चेताया कि भूलना मत, अभी ऑपरेशन सिंदूर जारी है।
वही ऑपरेशन, जिसने पाकिस्तान में घुसकर आतंक की कमर तोड़कर रख दी थी। महज चंद घंटों में घुटनों के बल ला दिया था उन तत्वों को, जो जेहाद के नाम पर बड़ी-बड़ी बात करते थे। आतंक के अड्डों को नेस्तनाबूद करने वाले ऑपरेशन सिंदूर की दहशत पाकिस्तान को सदा याद रखना होगी।
अगर ऑपरेशन सिंदूर को भूलकर वह फिर कोई नापाक हरकत हिंदुस्तान की सरजमीं पर करता है, तो उसे इस बार कोई बर्बाद होने से बचा नहीं पाएगा। पहलगाम हमले की बरसी पर भारत का ये ही संकल्प है- हम न डरेंगे, न झुकेंगे, न धर्म पूछकर मारी गई इस्लामिक आतंक की घटना को भूलेंगे।
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