मालवा के कद्दावर नेताजी की नई भूमिका पर दिल्ली में मंथन
Khulasa First
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
मप्र मंत्रिमंडल में फेरबदल भले ही अभी दूर हो, लेकिन दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों मालवा के एक कद्दावर नेता और प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री को लेकर गहन मंथन चल रहा है। बताते हैं पहले उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने की तैयारी थी, मगर ‘मोटा भाई’ की अनिच्छा के चलते यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।
इसके बाद दिल्ली में विकल्पों पर नए सिरे से विचार शुरू हुआ। अब चर्चा है कि कद्दावर नेताजी को या तो भाजपा की प्रस्तावित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कोई अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, या फिर पहले की तरह पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में किसी नई भूमिका के साथ मैदान में उतारा जा सकता है।
माना जा रहा है कि मालवा के इस दिग्गज को प्रदेश की सक्रिय राजनीति से अलग करने की तैयारी लगभग तय है। इसकी एक बड़ी वजह मौजूदा प्रदेश नेतृत्व के साथ उनकी केमिस्ट्री का न बैठ पाना बताया जा रहा है, जिसके संकेत वे समय-समय पर अपने तेवरों और व्यवहार से देते रहे हैं।
अब निगाहें दिल्ली दरबार के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, राष्ट्रीय मंच पर नई जिम्मेदारी मिलेगी या फिर बंगाल की रणभूमि में एक बार फिर नई सियासी भूमिका। नारदजी कहते हैं, मालवा के कद्दावर नेताजी की आगे की राजनीतिक भूमिका को लेकर पूरे प्रदेश में उत्सुकता बनी हुई है।
विधायक-मंत्री की जुगलबंदी की खुसर-पुसर!
मप्र के सत्ता गलियारों में इन दिनों एक खास जुगलबंदी को लेकर खुसर-पुसर है। प्रदेश भाजपा की एक पदाधिकारी-विधायक और सरकार के एक वरिष्ठ मंत्रीजी की जोड़ी इन दिनों कुछ ज्यादा ही सुर में बताई जा रही है। चर्चाएं हैं कि यह तालमेल अब इतना गहरा हो चला है कि मंत्रीजी के विभाग से जुड़े कई अहम और बड़े प्रोजेक्ट विधायक के परिजनों तक ही सीमित होकर रह गए हैं।
बताया जाता है कि यह जुगलबंदी आज की नहीं है। इसकी शुरुआत उस समय हुई थी, जब दोनों ही लोकसभा में माननीय हुआ करते थे। तभी से रिश्तों की आत्मीयता बनी रही, जो अब मप्र के राजनीतिक गलियारों में खुले तौर पर महसूस की जा रही है।
नारदजी बता दें, यह वही विधायक हैं जिन्हें दक्षिण भारत के एक प्रभावशाली बड़े भाईसाहब, जो कभी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और मध्यप्रदेश के प्रभारी रह चुके हैं, ने लोकसभा का रास्ता दिखाया था। अब पुराने रिश्ते नई सियासी धुन में फिर से गूंजते नजर आ रहे हैं।
विदिशा के भाईसाब का ‘सुदर्शना राग’
‘मामाजी’ की विदिशा भाजपा में अब एक नया किस्सा चर्चा का विषय बन रहा है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं एक नामचीन भाईसाहब और उनकी कथित रागात्मकता। भोपाल से दिल्ली तक कई बड़े भाईसाबों के खास ये भाईसाहब इन दिनों एक ‘सुदर्शना राग’ में कुछ ज्यादा ही डूब रहे हैं। जो सुर कभी निजी दायरे तक सीमित होते थे, उसके आलाप अब बाहर तक सुनाई देने लगे हैं।
‘सुदर्शना राग’ का यह रियाज इतना गहरा गया है कि भाईसाब की घर-गृहस्थी की शांति भी डगमगाने लगी है। आगे यह ‘सुदर्शना राग’ थमेगा या और परवान चढ़ेगा, कहना मुश्किल है। फिलहाल तो भाईसाहब की सियासी नैया ‘सुदर्शना राग’ के भंवर में बुरी तरह से फंसती नजर आ रही है।
पीसीसी के कथा वाचक नेताजी का इस्तीफा
पीसीसी में असंतोष लंबे समय से भीतर ही भीतर सुलग रहा है। यह असंतोष तब खुलकर सामने आया, जब पीसीसी के बुंदेलखंडी नेताजी, जिन्हें कथावाचक के रूप में जाना जाता है, ने उपेक्षा से आहत होकर इस्तीफा दे दिया। बताते हैं कि कथावाचक नेताजी को न तो संगठन में अपेक्षित महत्व मिल रहा था, न प्रदेश नेतृत्व और प्रभारी स्तर पर तवज्जो दी जा रही थी।
हालांकि, फिलहाल नेताजी का इस्तीफा नामंजूर कर दिया गया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने पीसीसी की अंदरूनी कलह को सार्वजनिक कर दिया है। संगठन में ऊपर से नीचे तक असंतोष की जो स्थिति अब तक दबे स्वरों में थी, वह इस इस्तीफे के जरिए सामने आ गई। नारदजी कहते हैं कि यह मामला केवल एक नेता की नाराजगी का नहीं, बल्कि पीसीसी में गहराते मतभेदों का संकेत है, जिन्हें नजरअंदाज करना पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है।
मोहग्रस्तता के शिकार विशिष्टजी!
प्रमोटी विशिष्टजी जैसे-तैसे एक जिले के कलेक्टर तो बन गए, पर मन अभी भी पुराने साहब के दरबार में ही अटका है। लूप लाइन में रहते हुए कलेक्टरी के लिए जितना जतन किया, उतनी ही बेचैनी अब कलेक्टरी मिलने के बाद दिखाई दे रही है। कारण साफ है, साहब को जो जिला मिला है, वह उनके ख्वाबों के नक्शे से कुछ छोटा निकला।
असल पीड़ा जिले की नहीं, बल्कि पुराने साहब से छूटते नाते की है। बीस साल तक जिस दरबार के आंख-कान रह चुके विशिष्टजी अब भी उसी दरबार में वापसी की राह तलाश रहे हैं। पूरी ताकत झोंकी जा रही है। कहीं तंत्र-मंत्र, कहीं पूजा-अनुष्ठान, तो कहीं ग्रह-नक्षत्र साधने की कोशिश।
पर, सारी गणित वहीं अटक जाती है, जहां सवाल उठता है कि वापसी के लिए केंद्रीय नेतृत्व को मनाएगा कौन? ऐसे में विशिष्टजी के लिए कबीरदास जी कहते हैं कि- ‘मोह नदी विकराल है, कौउ न उतरै पार।’
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