राजस्व विभाग में तहसीलदार व नायब तहसीलदार पदस्थापना पर मनमानी: 3-4 साल से जमे अफसरों को मलाईदार पद
KHULASA FIRST
संवाददाता

12 नवागत अफसर दो माह से बिना तैनाती, वेतन से परेशान
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजस्व प्रशासन में राजनीतिक सिफारिशों और वरिष्ठ अधिकारियों की साठगांठ के बूते नियमों को ताक पर रखकर पदों पर कब्जे का यह सिलसिला चरम पर पहुंच चुका है। सामान्य प्रशासन विभाग के नियम स्पष्ट कहते हैं कि 3 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद किसी भी अधिकारी का जिले से बाहर स्थानांतरण होना अनिवार्य है। इसके बावजूद इंदौर में प्रशासनिक तंत्र इस कदर अपाहिज हो चुका है कि 3 से 4 वर्षों से जमे अधिकारियों को हटाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है।
नियम विरुद्ध व्यवस्था में बदलाव नहीं हो पा रहा... बीते वर्ष शिवम वर्मा को नगर निगम कमिश्नर के पद से कलेक्टर बनाए जाने के बाद, उनसे उम्मीद थी कि वे अपने शहरी विकास के लंबे अनुभव का लाभ प्रशासनिक कसावट में लाएंगे। हालांकि, कलेक्टर पद का प्रभार संभालने के बावजूद प्रशासनिक व्यवस्था में जमी बर्फ पिघलने का नाम नहीं ले रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री और ‘डॉक्टर'हैं, इसके बावजूद, जिले में अपेक्षित प्रशासनिक सर्जरी नहीं हो पा रही है। जिले की कमान संभाल रहे प्रशासनिक मुखिया की यह नाकामी सवाल खड़े करती है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है जिसके कारण इस नियम विरुद्ध व्यवस्था में बदलाव नहीं हो पा रहा है? चहेते अफसरों को संरक्षण देकर पूरी राजस्व व्यवस्था को व्यक्तिगत स्वार्थ की बलि चढ़ा दिया गया है।
इस प्रशासनिक मनमानी का खमियाजा उन 12 नए स्थानांतरित होकर आए तहसीलदार और नायब तहसीलदार अफसरों को भुगतना पड़ रहा है, जो पिछले दो महीने से बिना पदस्थापना और बिना कार्य आवंटन के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह है कि इन नवागत अफसरों को दो माह से वेतन तक जारी नहीं हो सका है। बिना राजनीतिक वरदहस्त और मजबूत पहुंच वाले अफसरों को न्यायालय तक नसीब नहीं हो रहा है, जबकि रसूखदार अफसर सालों से फील्ड और मलाईदार न्यायिक जिम्मेदारियों पर कुंडली मारकर बैठे हैं।
प्रशासनिक तंत्र में सिफारिश ही एकमात्र योग्यता बनी... वरिष्ठता और नियमों को दरकिनार कर जमे अफसरों का गणित साफ इशारा करता है कि प्रशासनिक तंत्र में सिफारिश ही योग्यता है।
तहसीलदार विवेक सोनी जनवरी 2022 से महू तहसीलदार के पद पर कार्यरत हैं। तहसीलदार नारायण नांदेड़ा 2023 से न्यायिक तहसीलदार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तहसीलदार पूनम तोमर 2023 से सांवेर तहसीलदार के पद पर जमी हुई हैं।
तहसीलदार शेखर चौधरी 2023 से न्यायिक तहसीलदार बने हुए हैं। तहसीलदार विकास रघुवंशी 2023 से शिप्रा में न्यायिक अधिकारी हैं, जबकि महू तहसीलदार विवेक सोनी की बहन तहसीलदार शिखा सोनी 2023 से न्यायिक तहसीलदार के रूप में पदस्थ हैं। प्रभारी तहसीलदार कमलेश कुशवाहा 2022 से न्यायिक अधिकारी बने हुए हैं।
प्रभारी तहसीलदार धर्मेंद्र सिंह चौहान 2023 से न्यायिक अधिकारी की कुर्सी संभाले हैं। तहसीलदार लोकेश आहूजा 2023 से न्यायिक तहसीलदार के पद पर बरकरार हैं। नायब तहसीलदार राधावल्लभ धाकड़ 2022 से चार वर्षों से न्यायिक अधिकारी के रूप में टिके हुए हैं।
सरकार की छवि को धूमिल कर रहा
प्रभारी मंत्री मुख्यमंत्री मोहन यादव के प्रशासनिक नियंत्रण वाले जिले में इस तरह का खुला पक्षपात और नियमों की धज्जियां उड़ाना पूरी भाजपा सरकार की छवि को धूमिल कर रहा है। संभागायुक्त और कलेक्टर का इस पूरे ढर्रे पर मौन साधे रहना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
यदि वरिष्ठ अधिकारी तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप कर वर्षों से जमे अफसरों को जिले से बाहर का रास्ता नहीं दिखाते और नवागत अफसरों को न्यायसंगत पदस्थापना व वेतन जारी नहीं करते, तो यह साफ हो जाएगा कि प्रशासन निष्पक्षता खोकर पूरी तरह दबाव तंत्र के आगे घुटने टेक चुका है।
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