बिना कोर्ट-कचहरी सीधा इंसाफ: जहां अपराधी खुद कबूल करता है अपना गुनाह
KHULASA FIRST
संवाददाता

इस मंदिर की चौखट पर आते ही थर-थर कांपते हैं मुजरिम
देवभूमि के क्रोधी लोक देवता की कहानी, जहां खौफ खाता है अपराधी
तर्कशास्त्र नतमस्तक, चारधाम मार्ग से दूर उत्तरकाशी का कोना
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
उत्तराखंड को यूं ही ‘देवभूमि’ नहीं कहा जाता। इसके दुर्गम शिखरों और संकरी घाटियों में कदम-कदम पर इतिहास, मिथक और लोक-परंपराएं इस कदर गुथी हुई हैं कि आधुनिक विज्ञान और तर्कशास्त्र भी उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं।
आमतौर पर यमुनोत्री और गंगोत्री के मुख्य मार्गों से गुजरने वाले सैलानी उत्तराखंड के एक ऐसे अनछुए और रहस्यमयी कोने से अनजान रह जाते हैं, जिसकी न्याय पद्धति के आगे आज की आधुनिक न्यायपालिका और कड़े कानून भी दंग रह जाते हैं।
हम बात कर रहे हैं उत्तरकाशी जिले के सुदूर ‘रंवाई-जौनसार’ क्षेत्र की, जहां टोंस और रूपिन-सूपिन नदियों के पवित्र संगम पर बसा है एक छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा जिसका नाम है- नेटवाड़।
यह वह इलाका है जो पूरी दुनिया में सनातन धर्म की मुख्यधारा से बिल्कुल उलट, महाभारत के खलनायक माने जाने वाले कौरवों और उनके सहयोगियों की पूजा के लिए जाना जाता है।
इसी नेटवाड़ के केंद्र में स्थापित है एक अत्यंत विस्मयकारी और जागृत स्थान। इसे पोखू देवता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
न्याय का अलौकिक विधान- जब कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते इंसान की पीढ़ियां गुजर जाती हैं, तब रंवाई घाटी के लोग अपनी जमीन के विवाद, चोरी या पारिवारिक झगड़े लेकर सीधे पोखू देवता के दरबार में अर्जी लगाते हैं। यहां न वकील होते हैं, न दलील... बस सीधा और अचूक न्याय होता है!
दुर्योधन की सल्तनत और ‘पोखू’ की सत्ता
स्थानीय लोक-मान्यताओं और सदियों से चली आ रही मौखिक ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, रंवाई और जौनसार-बावर का यह सुदूर इलाका महाभारत काल में कौरवों का गढ़ हुआ करता था। यहां के स्थानीय लोग खुद को कौरव संस्कृति का संवाहक मानते हैं।
नेटवाड़ में पूजे जाने वाले पोखू देवता को वास्तव में महाबली कर्ण या दुर्योधन का प्रतिनिधि, रक्षक या उनका सेनापति (कुछ लोककथाओं में कर्ण का सारथी) माना गया है।
मान्यता है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब इस क्षेत्र में गहरा शून्य छा गया, तब पोखू देवता ने इस घाटी की कमान संभाली और प्रजा की रक्षा का दायित्व लिया।
तब से लेकर आज तक वे इस क्षेत्र के निर्विवाद शासक और सर्वोच्च न्यायाधीश हैं।
रौंगटे खड़े कर देने वाला नियम : वास्तुकला और पूजा पद्धति के लिहाज से यह मंदिर भारत के सबसे अनूठे और डरावने मंदिरों में से एक माना जाता है।
यहां का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि गर्भगृह में स्थापित देवता की मूर्ति के सामने खड़े होकर या उनकी आंखों में आंखें डालकर कोई भी इंसान पूजा नहीं कर सकता।
यहां तक कि मंदिर के मुख्य पुजारी को भी इसकी अनुमति नहीं है।
यहां पूजा करने का कड़ा नियम है कि आपको देवता की ओर अपनी पीठ करनी होगी और उल्टा खड़े होकर ही प्रार्थना या आहुति देनी होगी।
स्थानीय जानकारों के अनुसार, पोखू देवता का रूप इतना उग्र, ओजस्वी और न्यायप्रिय है कि कोई भी सामान्य इंसान उनके तेज और क्रोधित दृष्टि का सामना सीधे नहीं कर सकता।
यदि कोई भूलवश भी उनकी आंखों में देख ले, तो उसका भारी अनिष्ट होना तय माना जाता है। इसी खौफ और परम श्रद्धा के कारण सदियों से यहां पीठ दिखाकर ही शीश नवाने की परंपरा अक्षुण्ण है।
बिना वकीलों की ‘अलौकिक अदालत’
आज के आधुनिक दौर में भी कड़ाके की ठंड हो या विपरीत मौसम, लोग अदालतों के बजाय इस मंदिर के फैसले पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। पीड़ित पक्ष मंदिर में आकर देवता के आगे अपनी झोली फैलाता है।
मान्यता है कि यहां की गई पुकार के बाद दोषी व्यक्ति को पोखू देवता की अदृश्य शक्ति ऐसा कड़ा मानसिक और शारीरिक दंड देती है कि वह खुद-ब-खुद अपना अपराध स्वीकार कर पीड़ित का हक वापस लौटा देता है।
आज भी इस क्षेत्र के कई बड़े जमीनी और पारिवारिक विवाद बिना किसी पुलिस या कोर्ट-कचहरी के, सिर्फ इसी मंदिर की चौखट पर सुलझ जाते हैं। यह मंदिर उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के पास ‘नेटवाड़’ नामक स्थान पर टोंस नदी के किनारे है।
इस क्षेत्र से प्रसिद्ध ‘हर की दून’ ट्रेक शुरू होता है। पास के गांवों में दुर्योधन व कर्ण के प्राचीन काष्ठ-वास्तुकला से बने भव्य मंदिर भी हैं।
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