करोड़ों की संपत्ति पर कब्जे की साजिश नाकाम: मृत किराएदार के नाम खोला खाता
KHULASA FIRST
संवाददाता

नगर निगम के नामांतरण घोटाले का नया खुलासा
जांच के बाद हटाया फर्जी नाम, बहाल किया असली मालिक का अधिकार
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम में नामांतरण से जुड़े कथित घोटालों का लगातार खुलासा हो रहा है। अब वार्ड क्रमांक-70, जोन-2 स्थित 274/2 लाबरिया भेरू क्षेत्र की एक बहुमूल्य संपत्ति में ऐसे मामले का खुलासा हुआ है जिसने निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरोप है कि करीब 9400 वर्गफीट की संपत्ति, जो रजिस्ट्री और नामांतरण के बाद राजेंद्र कौर गांधी के नाम दर्ज थी, उसमें से 3600 वर्गफीट हिस्से का अलग खाता खोलकर मृत किराएदार वनिता बाई पटेल और अन्य के नाम दर्ज कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस वनिता बाई पटेल की मृत्यु हो चुकी थी, उनके नाम पर नगर निगम में खाता किस आधार पर खोला गया? आखिर किस अधिकारी या कर्मचारी ने दस्तावेजों की जांच किए बिना मृत व्यक्ति और कथित किराएदारों के नाम संपत्ति दर्ज कर दी?
मामले का खुलासा तब हुआ जब बकाया कर के नाम पर उक्त संपत्ति की नीलामी संबंधी विज्ञप्ति जारी की गई। इसके बाद लेजर की जांच में सामने आया कि एक ही संपत्ति के दो अलग-अलग खाते बना दिए गए थे और संपत्ति का वास्तविक क्षेत्रफल भी कम दर्शाया गया।
करोड़ों की संपत्ति बची, लेकिन सवाल बरकरार... यह मामला केवल एक नामांतरण त्रुटि का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए मूल्य की संपत्ति पर कथित कब्जे की कोशिश का संकेत माना जा रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि मृत व्यक्ति के नाम खाता किसने खोला?,
संपत्ति का क्षेत्रफल कम क्यों दर्शाया गया?, दो अलग-अलग खाते बनाने के पीछे किसकी भूमिका थी?, क्या यह अकेला मामला है या नगर निगम में नामांतरण का कोई बड़ा खेल चल रहा है?
जांच की मांग तेज... अभिभाषक प्रमोद कुमार द्विवेदी ने पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा है कि यदि समय रहते दस्तावेजों की पड़ताल नहीं होती तो करोड़ों रुपए की संपत्ति विवादों में फंस सकती थी।
नामांतरण घोटाले की आंच अफसरों तक... नामांतरण घोटाले में लगातार हो रहे खुलासों के बीच अब इसकी आंच निगम के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच गई है। निगम प्रशासन ने राजस्व उपायुक्त केशव सगर को राजस्व विभाग से हटाकर स्थापना एवं स्टोर शाखा में पदस्थ कर दिया है, हालांकि प्रशासनिक गलियारों में इस कार्रवाई को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि महज विभाग बदलना कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे बढ़ते विवाद और जनाक्रोश को शांत करने की प्रारंभिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
शिकायतों के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
संपत्ति स्वामी राजेंद्र कौर गांधी ने पहले नगर निगम में शिकायत की, लेकिन लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में अभिभाषक प्रमोद कुमार द्विवेदी के माध्यम से मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की गई और संबंधित दस्तावेजों की मांग उठाई गई।
बताया जाता है कि मामले को लेकर उप पंजीयक कार्यालय और कलेक्टर कार्यालय में भी आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं तथा विभिन्न माध्यमों से इस पूरे प्रकरण का खुलासा किया गया।
अपर आयुक्त की जांच में खुलासा... मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर आयुक्त आलोक सिंह ने जांच कराई। इस दौरान कथित किराएदार को कई बार दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए सूचना दी गई, लेकिन वह कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
इसके बाद नगर निगम ने फर्जी खाते को हटाते हुए वनिता बाई पटेल और अन्य के नाम दर्ज प्रविष्टि निरस्त कर दी और संपत्ति पर पुनः राजेंद्र कौर गांधी का नाम दर्ज कर दिया। इसकी जानकारी स्वयं नगर निगम कार्यालय से फोन कर संपत्ति स्वामी को दी गई।
जांच रिपोर्ट के बाद एफआईआर की चेतावनी
सूत्रों के अनुसार निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि नामांतरण प्रकरणों की जांच रिपोर्ट आने के बाद जो भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की भी कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि इस घोषणा के बाद भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि निगम के पूर्व के कई मामलों में भी दोषी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन आज तक कई मामलों में मुकदमे दर्ज नहीं हो सके।
सवालों के घेरे में नगर निगम
नगर निगम में सामने आ रहे एक के बाद एक मामलों ने यह आशंका और गहरा दी है कि नामांतरण शाखा में वर्षों से कोई बड़ा खेल चल रहा था, जिसका धीरे-धीरे अब खुलासा हो रहा है। नगर निगम की रिकॉर्ड व्यवस्था और संपत्ति प्रबंधन प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
यदि मृत व्यक्तियों के नाम खाते खुल सकते हैं और वास्तविक मालिकों की संपत्ति का क्षेत्रफल बदला जा सकता है, तो शहर की हजारों संपत्तियों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। यदि समय रहते जांच नहीं होती तो करोड़ों रुपए की संपत्तियां विवादित होकर असली मालिकों के हाथ से निकल सकती थीं।
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