रंग-रंगीलो फागुणियो छायो रे: ब्रज की गलियों से अहिल्या नगरी इंदौर तक छाई फागन की मस्ती
KHULASA FIRST
संवाददाता

यूपी के मथुरा-वृंदावन से मध्य प्रदेश के झाबुआ अंचल तक छाया फागुन
हर तरफ बिखरने लगे फागुन के रंग, शुरू हुए फागोत्सव, देवालय में शुरू हुई पिचकारी
ब्रज की मशहूर होली की मची धूम, कल बरसाना में हुई लड्डू होली, आज लठ्ठमार होली की मचेगी धूम
मालवा-निमाड़ अंचल में शुरू हुई भगोरिया की मस्ती, वनवासी अंचल में मांदल की थाप पर खनकने लगे घुंघरू
इंदौर में शुरू हुई रंगों की मस्ती, गली, मोहल्लों, मंदिरों में शुरू हुए फागोत्सव, गुलाल के साथ बिछने लगी सामाजिक जाजम
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
रंग-रंगीलो फागुणियो आयो भी, छायो भी। जी हां, फागुन जब आया, तब महसूस नहीं हुआ। मौसम के बदले मिजाज के कारण इस बरस रंगों का ये महीना दबे पांव आया। लेकिन अब सब तरफा छाया हुआ है। हर तरफ फागुन की मस्ती छाई है। क्या कुदरत, क्या इंसान... सब फागुन की मस्ती में झूम रहे हैं।
शीतल, मंद, सुगंध बयार के साथ जहां प्रकृति फागुन के साथ झूम रही है तो नीलगगन पर शुक्ल पक्ष का चांद भी शीतलता छिड़क रहा है। मानव मन ने भी फाग गीतों की मस्ती, होली की रंगत से नाता जोड़ लिया है। घर-आंगन, मन-आंगन में रंग पर्व ने डेरा डाल लिया है। होलाष्टक भी कल से लग गया है।
यानी फागुन के वे आखिरी आठ दिन के ठाठ, जब होली का सुरूर परवान पर होता है। तभी तो सब तरफ फागुन छा गया है। ब्रज मंडल, यानी उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन, बरसाना, गोकुल से लेकर मध्य प्रदेश के वनांचल झाबुआ तक एक समान फागुन छाया हुआ है।
‘महुए' की महक के साथ मांदल की थाप पर ‘वन सुंदरियों' के घुंघरू की खनक व ‘कुर्राटे' गूंज गए हैं। अहिल्या नगरी इंदौर भी इससे अछूती नहीं। इस उत्सवप्रिय शहर के देवालयों से लेकर गली, मोहल्लों और कॉलोनियों में फागुन के रंग बिखर गए हैं।
कै सो ये देश निगोरा-जगत होरी ब्रज होरा...। जी हां, वाकई दुनिया-जहां में होली होती है, लेकिन ब्रज की होली इस सबसे ऊपर है। हो भी क्यों नहीं? ब्रज की संकरी गलियों से ही तो निकलकर रंगों का ये पर्व भारत के गांव-गांव तक पहुंचा। द्वापरयुग में अपनी प्रियतमा राधाजी के संग कुंवर कन्हाई ने ऐसी होली खेली कि वह कालजयी हो गई और भारत के लोकपर्व के रूप में जन्म-जन्मांतर तक स्थापित हो गई।
उसी ब्रज में हुरियारों की धूम मची है। राधेरानी के बरसाने के ‘रंगीली महल से' ‘नंदगांव' हुरियारों को होली खेलने का न्योता भेज दिया गया है। न्योता स्वीकार लिया गया, इसकी सूचना जैसे ही बरसाना पहुंची, उसी रंगीली महल से खुशी के रूप में ‘रंगीलीजी' ने अपनी सखियों के संग लड्डू बरसाए। ये लड्डूमार होली कल, यानी मंगलवार को ब्रज में मन गई।
आज बुधवार को नंदगांव के हुरियारों की टोलियां, ‘होली के रसिया सांवरे' और ‘दाऊ दादा' के संग होली खेलने बरसाने पहुंचेंगे। रंगीली गली में ये सब घेर लिए जाएंगे और होली की हरकतों के कारण बरसाने की गुजरिया इनका स्वागत लठ्ठ से करेंगी। हंसी-ठिठोली के संग ये जग प्रसिद्ध लट्ठमार होली की धूम आज दोपहर बाद मचेगी।
खबर लिखे जाने तक बरसाने के चप्पे-चप्पे पर देशी-विदेशी लोगों का सैलाब जमा हो गया है। गुरुवार को नंदगांव की मशहूर होली के साथ ब्रज एक बार फिर द्वापरयुग को जीएगा। इसके बाद बारी आएगी गोकुल की छड़ीमार होली की। मथुरा में चतुर्वेदी समाज का डोला और वृंदावन में बांके बिहारीजी की होली की तैयारियों ने अंतिम रूप ले लिया है।
दाऊ, यानी बलरामजी के ‘हुरंगे' के साथ ब्रज में रंगों की मस्ती मुकाम पाएगी। प्रदेश का मालवा-निमाड़ अंचल भी फागुन की मस्ती से अछूता नहीं है। सबसे पहले रंगत छाई है वनांचल में। धार-झाबुआ-बड़वानी-खरगोन में भगोरिया पर्व की धूम शुरू हो गई है। वनवासी समाज, यानी आदिवासियों के इस लोकपर्व की रंगत देखते ही बन रही है।
झूले डल गए हैं। जगह-जगह मेले सज गए हैं। सजी-संवरी ‘वन सुंदरियों' का रूप-लावण्य देखते ही बन रहा है। छैला बने युवा उन्हें रिझाने के लिए बांसुरी की तान छेड़े हुए हैं। माहौल में महुआ की सुगंध घुल गई हैं, जो पूरे वातावरण को और भी मादक बना रही हैं। मांदल की थाप के साथ हर तरफ कुर्राटे गूंज रहे हैं।
देशभर में बिखरे पड़े वनवासी बंधु-भगिनियों के जत्थे के जत्थे अपने अंचल लौट आए। परस्पर पर्व मनाने की खुशियां इनके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती हैं। खुशियों की इस रंगत को नजदीक से निहारने के लिए मंगलवार से वनांचल में भीड़ जुट गई है। आने वाले सात दिन ये लोकपर्व पूरे उफान पर रहेगा। झाबुआ, आलीराजपुर, छकतला, पेटलावद, थांदला, कुक्षी, जोबट, अंजड़, बड़वानी, खरगोन, धार के मेले इसके गवाह बनेंगे।
श्री गोवर्धननाथ मंदिर में वसंत पंचमी से उड़ रहे हैं अबीर-गुलाल के गुबार
उत्सवप्रिय शहर इंदौर रंगों की इस मस्ती से कैसे अछूता रह सकता है? यहां भी हर तरफ फागोत्सव की धूम मची है। कहीं ‘भोंपूजी' के फाग गीत गूंज रहे हैं तो कहीं ‘द्वारका मंत्री' फाग की तान छेड़े हुए हैं। मंदिरों में ठाकुरजी के कपोलों पर गुलाल मली जा रही है। प्राचीन श्री गोवर्धननाथ मंदिर में होली की ये छटा सबसे अलग व अनूठी है।
हवेली में वसंत पंचमी से अबीर-गुलाल उड़ रहा है। यहां ठाकुरजी अपनी प्राणप्रिया के संग 40 दिन एक जैसा रंग खेलते हैं। ताल पखावज, चंग, ढप, किन्नरी के साथ यहां कीर्तनियों के मुख से रसिया गान गूंज रहे हैं। हवेली के मुख्य कीर्तनिया राधेश्याम राठौर की अगुआई में होली की धमाल के शास्त्रीय राग गूंज रहे हैं।
यहां हर दिन राजभोग दर्शन में अबीर-गुलाल के गुबार के बीच बड़ी संख्या में वैष्णवजन अपने इष्ट के संग होली खेल रहे हैं। रंगभरी ग्यारस से रंगों की मस्ती तब और परवान चढ़ जाएगी, जब ठाकुरजी पिचकारियों से टेसू व केसर के गीले रंगों से होली खेलेंगे।
प्रभु श्री गोवर्धननाथजी के इन सतरंगी रंगों से तनबदन को तरबतर करने की बेताबी पुराने इंदौर में छाई हुई है। उधर, बाजार भी रंगों से गुलजार हो गए हैं। रंगों की दुकान के साथ तरह-तरह की पिचकारी का बाजार भी सज-धजकर तैयार हो गया है।
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