चाट-कचौरी: हेरिटेज वॉक नहीं; इवेंटनुमा सरकारी आयोजन से किसान नाउम्मीद, खेत-खलिहान और गांव दिखाइए ब्रिक्स प्रतिनिधियों को
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
यहां चल रही ब्रिक्स एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस भी अन्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय इवेंट की तरह साबित हो रही है। इंदौर और प्रदेश के अफसर और मंत्री अक्सर इस तरह के महत्वपूर्ण आयोजनों में 56 दुकान के चाट-पकौड़े, कचौरी खिलाने, छतरी और राजवाड़ा घुमाने (इसे हेरिटेज वॉक कहकर भ्रमित किया जाता है) और वनवासी या जनजाति समाज से विदेशियों का स्वागत राजा-महाराजाओं की तरह कराते हैं साथ में देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा जोड़ दिया जाता है। किसानों का कहना है ब्रिक्स प्रतिनिधियों कोे खेत-खलिहान व गांव दिखाएं।
सम्मेलन ला पाएगा बदलाव?
ब्रिक्स कृषि मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक में जलवायु-अनुकूल कृषि, खाद्य सुरक्षा, कृषि तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, प्राकृतिक खेती और छोटे किसानों की आय बढ़ाने जैसे विषयों पर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं।
लेकिन आयोजन स्थल से कुछ किमी दूर खेतों में काम कर रहे किसानों के मन में सवाल वही पुराना है क्या ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन उनकी जिंदगी में कोई ठोस बदलाव ला पाते हैं?
सांवेर, बेटमा, महू और आसपास के किसानों का कहना है कि खेती की सबसे बड़ी चुनौतियां आज भी लागत, खाद-बीज की उपलब्धता, मौसम की अनिश्चितता और फसलों के उचित मूल्य से जुड़ी हैं।
उनका मानना है रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक घटनाक्रमों का असर खाद और कृषि इनपुट की कीमतों पर सीधे पड़ा, लेकिन समाधान अभी भी किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है।
किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों का तर्क है जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक खेती, पशुधन आधारित कृषि और टिकाऊ खेती की चर्चा केवल सम्मेलन कक्षों तक सीमित नहीं रहे।
नई तकनीक, बेहतर बीज, मौसम संबंधी सलाह और लागत कम करने वाले मॉडल वास्तव में छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंचें, तभी इन बैठकों की सफलता मानी जाएगी।
ना च-गाने सैर सपाटे का नाम ही समझ लीजिए जी-20, जी-7 हो या ब्रिक्स सम्मेलन हैं। सरकार के लिए इवेंट है, ऐसा लोगों का मानना है और किसानों का भी। ऐसा इवेंट, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता मीडिया तक की एंट्री नहीं है, वहां ऐसा क्या गोपनीय एजेंडा है जिसके कारण विदेशियों को लोगों से दूर रखा जा रहा है।
खासकर किसानों से भी, जिनके लिए यह सारी करोड़ों का इवेंट है। किसान कहते हैं नेताओं को अपनी इमेज मेकिंग के लिए इस तरह के आयोजन सुहाते हैं। शहर कितना स्वच्छ है इसकी हवा और पानी बता देगा।
इससे किसानों को ज्यादा उम्मीद नहीं है। इसलिए भी नहीं है कि प्रदेश के लगभग 5 लाख किसानों से सरकार ने एक तरह से धोखाधड़ी की। उनका गेहूं पंजीयन के बाद भी समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदा गया। ऐसी सरकार क्या किसानों को उनकी उपज का उचित दाम दिलवाएंगी?
खेती की जमीन का अधिग्रहण और समर्थन मूल्य का अभाव होने से खेती एक तरह से खत्म की जा रही है। किसानों को फसल का उचित मूल्य आज तक नहीं मिल पाया।
इसके कई उदाहरण है जो प्रदेश और केंद्र सरकार के दावो के विपरीत हैं।और खेती-किसानी की वास्तविक स्थिति भी चाहे जी-20 हो या ब्रिक्स देश के संगठन उनके दावो और नीतियों के बिल्कुल विपरीत है।
किसानों की प्रतिक्रिया एकदम स्पष्ट है फाइव स्टार होटलों में बनने वाली कृषि कूटनीति का वास्तविक लाभ क्या भारत के छोटे किसानों को मिल सकेगा। मेहमानों को खेत-खलिहान और गांव भी दिखाना चाहिए, ताकि नीतियां बनाने में उन्हें सुविधा हो, खेती का असल परिदृश्य समझ सकें और उसके आधार पर किसानों को उपज का दाम, कम लागत, खेती की भूमिका, संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ठोस काम हो सके।
इसके विपरीत इस तरह के सम्मेलन इंदौर में बीते कुछ वर्षों से इवेंट के रूप में होने लगे हैं। इससे नेता अफसर और विदेशी लोगों का खूब आदर-सत्कार, मीडिया पब्लिसिटी तो हो जाती है लेकिन किसानों और खेती की दशा नहीं बदलती।
एक ओर इंदौर में सम्मेलन हो रहा है, दूसरी ओर समीप ही हातोद में किसान आंदोलन कर रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जगह-जगह आंदोलन हो रहे हैं, क्योंकि खेती की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है।
ग्रामीण और किसान अपनी जमीन देना नहीं चाहते और सरकार सिर्फ खेती की जमीन का अधिग्रहण करना चाहती है। प्रदेश सरकार ने 5 लाख किसानों का गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदने से इनकार कर दिया और दूसरी तरफ सम्मेलन में किसानों को उच्च दाम, किसानों का कल्याण आदि दावे किए जा रहे हैं। इतना बड़ा विरोधाभास इस तरह के सम्मेलनों की हकीकत बयां करता है।
विशेषज्ञों का कहना है जी-20, जी-7 या ब्रिक्स जैसे मंच नीतिगत दिशा तय कर सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा सकते हैं और नई पहल शुरू कर सकते हैं, लेकिन किसानों की तकदीर तब बदलती है जब फैसले जमीन पर उतरते हैं।
खेतों में बदलाव का पैमाना भाषण नहीं, बल्कि किसान की लागत, उसकी आय और उसकी फसल की सुरक्षा है। असल में इस तरह के आयोजन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जुड़े संबंधित देशों के हित साधने तक ही सीमित होते हैं इन्हें बाजार से मतलब होता है खेती किसानी से नहीं।
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