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क्या ब्रिक्स दे पाएगा कृषि-खाद्य सुरक्षा का नया मॉडल: इंदौर घोषणा-पत्र पर दुनिया की निगाह

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संवाददाता

12 जून 2026, 4:08 pm
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क्या ब्रिक्स दे पाएगा कृषि-खाद्य सुरक्षा का नया मॉडल

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दुनिया की लगभग आधी आबादी, वैश्विक कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा और खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की बैठक इंदौर में सरहदों को पार कर ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की पूरी अर्थव्यवस्था खेती-किसानी के संकट के कारण चौराहे पर है।

ब्रिक्स देश मिलकर इसे दिशा दे सकते हैं लेकिन यह इतना आसान होगा क्या? इस सवाल का जवाब शायद सम्मेलन के घोषणा-पत्र में मिले।

युद्ध, जलवायु परिवर्तन, व्यापारिक प्रतिबंध और आपूर्ति शृंंखला संकट ने वैश्विक कृषि व्यवस्था को गहरे दबाव में डाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है सदस्य देश अपने-अपने भू-राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर साझा एजेंडे पर सहमति बना लेते हैं तो इंदौर घोषणा-पत्र वैश्विक खाद्य सुरक्षा, कृषि व्यापार के साथ सस्टेनेबल एग्रीकल्चर की दिशा में ऐतिहासिक दस्तावेज साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों की राय एकदम स्पष्ट है, चीन को दुनिया के हर क्षेत्र मेंअपने प्रभुत्व की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सदस्य देशों का साथ देना चाहिए। भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री एवं कृषि मामलों के अंतरराष्ट्रीय जानकार दिनेश कुलकर्णी का कहना है ब्रिक्स देशों के पास कृषि उत्पादन, उर्वरक, ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन और विशाल उपभोक्ता बाजार की ऐसी क्षमता है, जो अमेरिका और यूरोप केंद्रित वैश्विक कृषि व्यवस्था का प्रभावी विकल्प बन सकती है।

हालांकि, सदस्य देशों की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और वैश्विक बाजार पर प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा इंदौर घोषणा को प्रभावित कर सकती है।

चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसके सामरिक हित पाकिस्तान, ईरान तथा अन्य क्षेत्रों से जुड़े हैं। ऐसी स्थिति में भारत को रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे ब्रिक्स पर किसी एक देश का प्रभुत्व न हो। भारत, रूस और ब्राजील कृषि क्षेत्र में ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत हैं और इन्हीं के सहयोग से कृषि आत्मनिर्भरता का मजबूत ढांचा तैयार किया जा सकता है।

कैसा हो सकता है मेनीफेस्टो
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इंदौर घोषणा-पत्र में कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने आ सकते हैं। जैसे ब्रिक्स देशों के बीच कृषि व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं में भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने पर सहमति बन सकती है ताकि डॉलर आधारित व्यवस्था और प्रतिबंधों का प्रभाव कम हो।

रूस, ब्राजील और अन्य उत्पादक देशों के सहयोग से साझा उर्वरक बैंक या ‘फर्टिलाइजर पूल’ की अवधारणा पर चर्चा हो सकती है, जिससे संकट के समय सदस्य देशों को खाद की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए ‘क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर’ को ब्रिक्स की आधिकारिक कृषि नीति का हिस्सा बनाया जा सकता है। भारत की डिजिटल कृषि पहल, एग्रीस्टैक, ड्रोन तकनीक और एआई कृषि मॉडल को सदस्य देशों के साथ साझा करने की दिशा में भी पहल संभव है।

चुनौतियां, जिनसे जूझ रहे ब्रिक्स देश
विशेषज्ञों के अनुसार ब्रिक्स देशों की कृषि प्रणालियां भले अलग हों, लेकिन कुछ चुनौतियां सभी देशों के लिए समान हैं। डॉ पांडे और कुलकर्णी कहते हैं पहली चुनौती वैश्विक लॉजिस्टिक्स और व्यापार मार्गों की असुरक्षा है।

लाल और काला सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री परिवहन महंगा हुआ है और कई मामलों में मालभाड़ा कई गुना तक बढ़ गया है। दूसरी चुनौती उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों की है। रूस और बेलारूस दुनिया के प्रमुख उर्वरक उत्पादक हैं।

प्रतिबंधों और आपूर्ति बाधाओं के कारण पोटाश और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी गई है। तीसरी चुनौती खाद्य सुरक्षा की है। आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते कई देशों ने गेहूं, चावल और चीनी जैसे उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए, जिससे गरीब और विकासशील देशों में खाद्य असुरक्षा गहरी हुई है।

अफ्रीका बनेगा नई कृषि कूटनीति का केंद्र
दिनेश कुलकर्णी का मानना है भारत को अफ्रीकी देशों के साथ कृषि व्यापार, तकनीक हस्तांतरण और ग्रामीण विकास सहयोग को प्राथमिकता देना चाहिए। चीन अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और रणनीतिक सहयोग कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए कृषि कूटनीति का विस्तार आवश्यक हो गया है।

दुनिया की दाल-रोटी का सवाल
दुनिया आज भुखमरी, कुपोषण, जल संकट का सामना कर रही है। ऐसे में ब्रिक्स देशों को साझा खाद्यान्न भंडार, कृषि तकनीक साझेदारी और आपातकालीन खाद्य सहायता जैसी व्यवस्थाओं पर विचार करना होगा।

डॉ. पांडे और दिनेश कुलकर्णी का मानना है सदस्य देश अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं और इंदौर घोषणा को केवल औपचारिक दस्तावेज न रहने दें, तो यह सम्मेलन वैश्विक कृषि शासन, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ विकास की नई दिशा तय कर सकता है।

युद्ध और प्रतिबंधों ने बढ़ाया संकट
अंतरराष्ट्रीय कृषि विशेषज्ञ डॉ. एचएन पांडे का कहना है वैश्विक कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध और जलवायु परिवर्तन हैं। वैश्विक खाद्यान्न, उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित किया है।

जब काला सागर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सीमित नहीं रहता, भारत के ग्रामीण इलाकों तक महसूस होता है।

किसान, उपभोक्ता, मजदूर, व्यापारी और पूरी अर्थव्यवस्था कीमत चुकाती है। इंदौर सम्मेलन की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि खाद्य सुरक्षा को केवल व्यापारिक नहीं बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए।

इसके लिए ऐसा पारदर्शी और न्यायसंगत वैश्विक कृषि व्यापार मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें नियम शक्तिशाली देशों के हितों से नहीं, किसानों और उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं से तय हों।

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