वैध कॉलोनियों पर अफसरशाही का ब्रेक: मप्र कॉलोनी अधिनियम-2026 के उद्देश्य पर सवाल; विकास अनुमति के नाम पर महीनों अटक रही फाइलें
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एक ओर मध्यप्रदेश सरकार मप्र कॉलोनी अधिनियम-2026 लागू कर अवैध कॉलोनियों पर अंकुश लगाने का दावा कर रही है। कलेक्टर शिवम वर्मा भी लगातार अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन के कॉलोनी सेल में वैध कॉलोनी विकसित करने वाले कॉलोनाइजर ही अफसरशाही के रवैये से परेशान हैं।
आरोप है कि लाखों रुपए की वैधानिक फीस और रेडक्रॉस निधि में राशि जमा करने के बावजूद विकास अनुमति की फाइलें महीनों तक अधिकारियों की टेबल पर धूल खा रही हैं।
कॉलोनाइजरों का कहना है कि वैध प्रक्रिया इतनी जटिल और महंगी बना दी गई है कि कई लोग नियमों का पालन करने के बजाय अवैध कॉलोनियां विकसित करना अधिक आसान समझने लगे हैं। ऐसे में शासन की मंशा और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास है।
रेडक्रॉस निधि में 6 लाख जमा, फिर भी नहीं मिल रही विकास की अनुमति... जानकारी के अनुसार कॉलोनी लाइसेंस प्रक्रिया में कॉलोनाइजरों को रेडक्रॉस निधि में तीन चरणों में राशि जमा करना पड़ती है लाइसेंस के लिए 2 लाख, विकास अनुमति के लिए 2 लाख और पूर्णता प्रमाण पत्र के लिए 2 लाख रुपए यानी एक ही कॉलोनी के लिए 6 लाख रुपये रेडक्रॉस निधि में जमा कराए जाते हैं। इसके बाद भी विकास अनुमति समय पर जारी न होने से कॉलोनाइजर प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
अपर कलेक्टर कार्यालय पर फाइलें रोकने के आरोप... कॉलोनाइजरों का आरोप है कि अपर कलेक्टर रिंकेश वैश्य के पास कई विकास अनुमति की फाइलें लंबे समय से लंबित हैं। उनका कहना है कि विकास अनुमति जारी करने से पहले शाखा प्रभारी से चर्चा आवश्यक है, जबकि शाखा स्तर पर सभी तकनीकी परीक्षण और कमियों का निराकरण पहले ही किया जा चुका होता है।
इसके बावजूद अंतिम आदेश जारी होने में लगभग एक माह या उससे अधिक का समय लग रहा है। सूत्र बताते हैं कि फाइलों के अनावश्यक लंबित रहने को लेकर पूर्व शाखा प्रभारी एवं तत्कालीन एसडीएम प्रदीप सोनी की अपर कलेक्टर रिंकेश वैश्य से तीखी बहस भी हो चुकी है।
यह मामला उस समय प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना था। बताया जाता है कि उस दौरान भी पूर्ण फाइलें लंबे समय तक अपर कलेक्टर न्यायालय में अटकी रहीं, जिसके कारण शाखा प्रभारी को कलेक्टर की नाराजगी झेलना पड़ी थी।
कॉलोनाइजरों का दावा-क्षेत्र के हिसाब से तय है रेट
कॉलोनाइजरों का आरोप है कि विकास अनुमति के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की कॉलोनियों के अनुसार अलग-अलग दरें तय हैं। उनका दावा है कि निर्धारित राशि पहुंचने पर विकास अनुमति शीघ्र जारी हो जाती है, जबकि ऐसा न होने पर फाइलें लंबे समय तक लंबित रहती हैं।
बताया जाता है कि करीब 15 दिन पहले जिन कॉलोनियों का प्रेजेंटेशन पूरा हो चुका है, उनकी सभी औपचारिकताएं भी पूर्ण हो गई हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में अभी तक विकास अनुमति जारी नहीं की गई है।
लाइसेंस जल्दी, विकास अनुमति में महीनों का इंतजार
सूत्रों के मुताबिक लाइसेंस तो अपेक्षाकृत आसानी से जारी हो जाता है, लेकिन विकास अनुमति के समय पूरी प्रक्रिया अचानक धीमी पड़ जाती है। कॉलोनी सेल द्वारा विज्ञप्ति प्रकाशन और प्रेजेंटेशन जैसी सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद फाइल अपर कलेक्टर न्यायालय भेजी जाती है, जहां वह लंबे समय तक लंबित रहती है। कॉलोनाइजरों का आरोप है कि प्रेजेंटेशन के बाद यदि मनमुताबिक व्यवस्था न की जाए तो विकास अनुमति मिलने में अनावश्यक देरी होती है और संबंधित कार्यालयों के लगातार चक्कर लगाना पड़ते हैं।
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