बंपर वोट, किसे जीत, किसे चोट: दीदी का गढ़ ढहेगा या कमल खिलेगा
KHULASA FIRST
संवाददाता

पश्चिम बंगाल-तमिलनाडु में रिकॉर्डतोड़ मतदान, आजादी के बाद सबसे ज्यादा लोगों ने दिए वोट
एसआईआर के बावजूद बंगाल में छप्परफाड़ वोटिंग, भाजपा-टीएमसी दोनों ने किए जीत के दावे
मुख्य चुनाव आयुक्त ने वोटर्स के जज्बे को किया सैल्यूट, सोशल मीडिया पर जताया आभार
बंगाल में हुए ऐतिहासिक मतदान ने पूरे देश को चौंकाया, मोदी-शाह ने बताया ये ममता की विदाई
बंगाल से बाहर रहने वाले कामकाजी देश के हर हिस्से से पहली बार रिकॉर्डतोड़ वोट डालने पहुंचे
प्रधानमंत्री ने आज सुबह कोलकाता में किया नौका विहार, शाह ने वोटर्स का किया अभिनंदन
तमिलनाडु के 59 साल के इतिहास में पहली बार इतनी वोटिंग, सीएम की सीट पर 21 फीसदी ज्यादा मतदान
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कोलकाता में गंगा से जुड़कर बह रही हुगली नदी में आज सुबह नौका विहार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बॉडी लैंग्वेज बंगाल में कमल खिलने का इशारा कर रही थी। अर्बन वोटर्स के शेष बचे वोटर्स को संदेश देते पीएम ने गंगा को बंगाल की आत्मा बताया और नाविकों के साथ बिताए पल को सबके साथ साझा भी किया।
हाथ में कैमरा थामे प्रधानमंत्री की बेफिक्री बता रही थी कि ‘मोटा भाई’ की ‘भद्रलोक’ में एक पखवाड़े से बनी हुई स्थायी मौजूदगी रंग दिखा गई। ‘मोटा भाई’ की मतदान के बढ़े हुए प्रतिशत पर मतदाताओं का आभार व अभिनंदन करती सोशल मीडिया की पोस्ट भी सबको चौंका रही है।
‘मोटा भाई’ का उत्साह तो उन्हें शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ले आया। वहीं ‘दीदी’ की ईवीएम पर अभी से बयानबाजी भी कई सवाल खड़े कर रही हैं। चुनाव आयोग का सीना भी हिंसारहित 93 फीसदी मतदान के बाद ‘56’ इंची हो गया और उन्होंने वोटर्स के जज्बे को सैल्यूट किया।
बंग की सियासी जंग ने न सिर्फ पश्चिम बंगाल, बल्कि समूचे हिंदुस्तान को चौंका दिया है। इस ‘भद्रलोक’ में मतदाता ऐसा जागा कि उसने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। 93 प्रतिशत तक मतदान कर सूबे के बाशिंदों ने चुनावी जानकारों के तमाम समीकरण व कयासों को धोकर रख दिया। 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर हुए प्रथम चरण के इस प्रचंड मतदान वाले चुनाव को भाजपा ने अपनी लहर बताया तो टीएमसी ने ममता के पक्ष में मतदान का दावा किया है।
अब सबकी नजरें दूसरे चरण के शेष बचे चुनाव के साथ 4 मई पर टिक गई हैं कि क्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का गढ़ ढह जाएगा और कमल खिलेगा? या दीदी ‘मां-माटी-मानुष’ का दबदबा कायम रखेंगी? सुदूर दक्षिण भारत के तमिलनाडु ने भी लोकतंत्र के इस महायज्ञ में रिकॉर्ड रच दिया।
राज्य के 59 साल के इतिहास में पहली बार इतना वोटिंग हुई। यहां मौजूदा सीएम स्टालिन की सीट पर तो 21 फीसदी तक ज्यादा मतदान ने सबको चौंका दिया। पश्चिम बंगाल के ये बंपर वोट किसे जीत देंगे, किसे चोट? ये एकमात्र सवाल सूबे में 93 प्रतिशत हुए छप्परफाड़ मतदान के बाद से न सिर्फ बंगाल, बल्कि देशभर में गूंज रहा है।
राज्य में आजादी के बाद ये सबसे ज्यादा मतदान का उत्साह किसके पक्ष में है, इसके लिए अब 4 मई का बेसब्री से इंतजार शुरू हो गया है। मतदान के इस स्वस्फूर्त उत्साह ने सबको चौंका दिया। वोटिंग के आंकड़ों ने टीएमसी व भाजपा को भी हैरान कर दिया।
अब सब तरभफ ये ही मंथन है कि ये ममता बनर्जी की लहर है या सत्ता में बदलाव पर लगी मुहर। ये बंपर वोट किसे जीत देंगे, किसे चोट देंगे... ये चुनावी रणनीतिकार भी बता नहीं पा रहे हैं। राज्य का राजनीतिक मिजाज बढ़े हुए मतदान के बाद सत्ता परिवर्तन का साफ-साफ इशारा भी नहीं करता। इसलिए बंपर वोटिंग से कोई नतीजा निकालना फिलहाल सियासी रणनीतिज्ञ के लिहाज से सुरक्षित नहीं माना जा रहा।
तमिलनाडु में भी 85 प्रतिशत मतदाताओं ने वोटिंग कर इतिहास बना दिया। 1959 से अब तक राज्य में इतने वोट कभी नहीं डाले गए। सीएम स्टालिन की सीट पर तो बीते चुनाव की तुलना में 21 प्रतिशत तक ज्यादा वोटिंग हुई। चैन्नई में ये आंकड़ा 90 प्रतिशत तक जा पहुंचा।
मतदान के इस बढ़े प्रतिशत ने यहां भी चुनावी समीकरण को गड्डमड्ड कर दिया है। चुनाव के पहले राज्य में माना जा रहा था कि स्टालिन सरकार की विदाई हो सकती है, लेकिन कल हुए मतदान के बाद स्टालिन अपनी जीत का खुलकर दावा कर रहे हैं।
तमिल फिल्म के सुपर स्टार विजन की नई राजनीतिक पार्टी ने भी जीत के तमाम कयासों को उलझाने में अहम भूमिका निभाई है। यहां सभी 234 सीट पर एक ही चरण में चुनाव पूर्ण हो चुके हैं।
प्रवासी बंगालियों ने बदल दिए सारे समीकरण..चुनावी जानकार इस बेतहाशा वोटिंग के तीन अहम कारण बता रहे हैं। इनमें सबसे पहले वे प्रवासी बंगाली हैं, जो कामकाज के सिलसिले में बंगाल से बाहर डेरा डाले हुए हैं। ऐसे लाखों प्रवासी बंगाली इस बार वोटिंग करने देश के हर हिस्से से अपनी धरती पर पहुंचे।
इसमें तृणमूल कांग्रेस व भाजपा दोनों के समर्थक हैं। सबसे ज्यादा प्रवासी गुजरात व दक्षिण के राज्यों से बंगाल पहुंचे। गुजरात से तो इनके लिए स्पेशल ट्रेन तक चलाई गई। दूसरा प्रमुख कारण मतदाता सूची का शुद्धिकरण, यानी एसआईआर का रहा। मतदाताओं में ये एक अनजाना भय समा गया था कि वोट न डाला तो हो सकता है अगले चुनाव तक हमारा वोट भी कट जाए।
तीसरा कारण मौजूदा ममता सरकार के खिलाफ एंटीनकम्बेसी का माना जा रहा है, जिसमें भय, भ्रष्टाचार व ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे अहम थे। वहीं चुनावी एक्सपर्ट इसे तकनीकी रूप से पुराने मतदान के प्रतिशत से ही जोड़ रहे हैं कि एसआईआर के बाद मरे हुए, दो जगह दर्ज व राज्य छोड़कर जाने वाले मतदाता वोटिंग लिस्ट से हट गए। इनकी संख्या अगर जुड़ी हुई होती तो मतदान का ये प्रतिशत वही पुराने पैटर्न के हिसाब से 80-82 फीसदी के बीच रहता।
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