बिल्डर्स और कॉलोनाइजरों की बढ़ी मुश्किलें: मास्टर प्लान; अहिल्या पथ और आश्रय निधि के नोटिस से अटका कारोबार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बिल्डर बंटी नागर की आत्महत्या के बाद इंदौर के रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़ी कई पुरानी समस्याएं एक बार फिर चर्चा में हैं। बिल्डर्स और कॉलोनाइजर का कहना है कि पिछले दो साल से कई जरूरी अनुमतियां और प्रोजेक्ट अलग-अलग सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं में अटके हुए हैं। उनका कहना है कि यदि इन मामलों का जल्द समाधान नहीं हुआ तो जमीन सौदों और निर्माण परियोजनाओं पर असर बढ़ सकता है।
मास्टर प्लान का इंतजार, 79 गांवों के प्रोजेक्ट प्रभावित
रियल एस्टेट कारोबारियों के मुताबिक इंदौर के नए मास्टर प्लान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से इंदौर से जुड़े 79 गांवों में विकास परियोजनाएं प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों में छोटी टाउनशिप के नए प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
बिल्डर्स और कॉलोनाइजरों का कहना है कि 10 एकड़ या उससे अधिक जमीन के मामलों में धारा 16 के तहत मिलने वाली विशेष मंजूरी की प्रक्रिया भी करीब डेढ़ साल से प्रभावित है। इससे किसानों और कॉलोनाइजरों, बिल्डर्स के बीच हुए जमीन सौदों और रेशियो डील पर असर पड़ा है।
इसी तरह के एक मामले में बंटी नागर की बाल्याखेड़ा स्थित जमीन की धारा 16 की मंजूरी अटकी होने की बात भी सामने आई थी। इससे करीब 50 करोड़ रुपए की राशि प्रभावित होने का दावा किया गया है।
अहिल्या पथ को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं
जून 2024 में आईडीए की ओर से प्रस्तावित अहिल्या पथ को लेकर भी बिल्डर्स, कॉलोनाइजरों और जमीन मालिकों की परेशानी बनी हुई है। इससे जुड़े आठ गांवों में पहले से स्वीकृत कॉलोनियों की एनओसी और नई टाउनशिप के मामलों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
रियल एस्टेट कारोबारियों के मुताबिक करीब 16 टाउनशिप इससे प्रभावित हैं। उनका कहना है कि अहिल्या पथ का प्रस्ताव बाद में शासन स्तर से वापस लिए जाने के बावजूद इससे जुड़े प्रोजेक्ट अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं।
चरनोई भूमि के नियम से कॉलोनियों की मंजूरी अटकी
ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलोनी की विकास अनुमति को लेकर कॉलोनी सेल और जिला प्रशासन की प्रक्रिया भी बिल्डर्स के लिए चुनौती बनी हुई है।
नियम के तहत टीएंडसीपी की मंजूरी से पहले कॉलोनी के एप्रोच रोड को लेकर कॉलोनी सेल से रिपोर्ट ली जाती है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र में चरनोई भूमि की उपलब्धता भी देखी जाती है।
बिल्डर्स और कॉलोनाइजरों का कहना है कि इस प्रक्रिया के कारण कई मामलों में एप्रोच रोड की अनुमति और उसके बाद टीएंडसीपी की मंजूरी अटक रही है।
उनका कहना है कि नियम का उद्देश्य भले ही कॉलोनी तक सड़क की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, लेकिन प्रक्रिया के कारण कई परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
70 बिल्डर्स को आश्रय निधि के नोटिस
इंदौर नगर निगम की ओर से आश्रय निधि की वसूली को लेकर करीब 70 बिल्डर्स को नोटिस जारी किए गए हैं। कारोबारियों के मुताबिक इन नोटिसों में करीब 200 करोड़ रुपए की राशि का उल्लेख है।
बिल्डर्स और कॉलोनाइजरों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से पहले नियमों की स्पष्टता जरूरी है। उनका दावा है कि मध्य प्रदेश के अन्य नगरीय निकायों में इस तरह के नोटिस नहीं दिए गए हैं।
इंडस्ट्रियल पार्क को लेकर भी नोटिस
इसी बीच जिला प्रशासन की कॉलोनी सेल की ओर से कुछ इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करने वालों को भी आश्रय निधि से जुड़े नोटिस दिए गए हैं। नोटिस में संबंधित परियोजनाओं को अवैध कॉलोनी घोषित करने की कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई है।
कारोबारियों का कहना है कि इन परियोजनाओं में उद्योग संचालित हैं और कुछ मामलों में रेरा पंजीयन भी मौजूद है। उनका सवाल है कि इंडस्ट्रियल पार्क पर आश्रय निधि लागू करने का आधार क्या है।
25 हजार करोड़ के कारोबार पर असर का दावा
रियल एस्टेट कारोबारियों के अनुसार इंदौर का रियल एस्टेट सेक्टर करीब 25 हजार करोड़ रुपए सालाना का है। इससे सरकार को पंजीयन शुल्क के रूप में भी बड़ी राशि प्राप्त होती है।
इसके अलावा निर्माण क्षेत्र से जुड़े सीमेंट, सरिया, मजदूरी और अन्य कारोबारों के जरिए रोजगार और टैक्स राजस्व भी जुड़ा है।
कारोबारियों का कहना है कि मंजूरियों में देरी का असर केवल बिल्डर्स पर नहीं, बल्कि जमीन मालिकों, निवेशकों, मजदूरों और निर्माण सामग्री से जुड़े कारोबार पर भी पड़ता है।
क्रेडाई बोला- छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान जरूरी
क्रेडाई इंदौर के अध्यक्ष संदीप श्रीवास्तव के मुताबिक रियल एस्टेट सेक्टर की समस्याओं को अलग-अलग स्तरों पर लगातार उठाया जा रहा है।
उनका कहना है कि कई मामलों में समस्या छोटी प्रक्रिया या नियमों से जुड़ी है, लेकिन उसके कारण बड़े प्रोजेक्ट अटक रहे हैं।
उन्होंने कहा कि रियल एस्टेट सेक्टर रोजगार और सरकार को राजस्व देने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र है, इसलिए संबंधित विभागों को नियमों में स्पष्टता लाकर समाधान का रास्ता निकालना चाहिए।
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