ब्रिक्स को साबित करना होगी अपनी ताकत: विकल्प है प्रकृति आधारित सस्टेनेबल एग्रीकल्चर
KHULASA FIRST
संवाददाता

अमेरिका के टैरिफ वार और खाड़ी युद्ध से बढ़ा खेती का संकट
दुनिया की खेती-किसानी की लगाम अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के हाथ में
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत की अध्यक्षता में यहां आज से ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका द्वारा लडे जा रहे खाड़ी युद्ध और दुनिया पर लगाए गए टेरिफ से भारत सहित ब्रिक्स देश जूझ रहे हैं। दुनिया की अर्थव्यवस्था ओधे मुंडे मुंह गिर रही है।
अमेरिका द्वारा भारत पर थोपी गई जबरिया कृषि संधि साबित करती है दुनिया की खेती-किसानी की लगाम अब भी अमेरिका जैसे मुट्ठीभर ताकतवर देशों के हाथ में ही है।
दूसरी ओर चीन ब्राज़ील साउथ अफ्रीका और रूस जैसे देश कृषि मामलों में भारत के सामने बड़ी चुनौतिया पेश कर रहे हैं। वही डॉलर की मजबूती भारत समेत अन्य देशों कभी आर्थिक संकट बढ़ा रही है।
बढ़ती महंगाई के साथ कृषि उत्पादों की न्यूनतम बाजार मूल्य श्रृंखला से भारतीय किसान परेशान है। छोटे किसानों और खेती आधारित मजदूर के लिए आजीविका का संकट गहरा गया है। ऐसे में भारत की सनातन या सस्टेनेबल एग्रीकल्चर, जो प्रकृति आधारित है, ब्रिक्स देशों के लिए अनुकरणीय हो सकती है।
अपने राष्ट्र में खेती सहित महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों का संकट विकास और आत्मनिर्भरता का द्वंद दिनों दिन बढा रहा है। अमेरिका जैसे बड़े देश खेती में दी जा रही सब्सिडी को खत्म करवाना चाहते हैं। हम रासायनिक उर्वरकों के लिए विदेशों पर निर्भर हैं।
खेती की लागत बढ़ रही है और किसान का फायदा कम से कम होता जा रहा है। इससे सभी विकासशील देशों मैं खेती सुरक्षित नहीं रह गई हैं। ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है तो खाद्य सुरक्षा के लिए खेती- किसानी को सबसे पहले बचाया जाना जरूरी है।
खेती की भूमि को तथाकथित आधुनिक विकास तेजी से निगल रहा है। इस आधुनिक विकास के कारण खड़ा हुआ जलवायु संकट खेती के लिए और बड़ी चुनौती है।
वर्तमान हालातो के मद्देनजर इंदौर बैठक में खाद्य सुरक्षा, छोटे किसानों का सशक्तिकरण, जलवायु परिवर्तन से कृषि की सुरक्षा और कृषि व्यापार जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होगी।
दावा किया जा रहा है यह सम्मेलन भारत की कृषि नेतृत्व क्षमता को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का अवसर है।
ब्रिक्स के पास खेती का बड़ा भाग
ब्रिक्स देशों के पास विश्व की करीब 42 प्रतिशत कृषि भूमि, 68 प्रश कृषि जोतें व 42 प्रतिशत वैश्विक खाद्य उत्पादन है।
सवाल समाधान का?
बैठक में जलवायु संकट रोधी, डिजिटल खेती, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सलाह, अनुसंधान में सहयोग, बीज और तकनीक के आदान-प्रदान तथा कृषि व्यापार को सरल बनाने जैसे उपायों पर चर्चा होगी।
ब्रिक्स देश छोटे किसानों को बाजार, तकनीक और वित्तीय संसाधनों से जोड़ने के लिए साझा रणनीति बनाने का प्रयास करेंगे। महत्वपूर्ण है बैठक मप्र में हो रही है, जो गेहूं, सोयाबीन और दलहन उत्पादन में अग्रणी है।
ब्रिक्स क्या है?
ब्रिक्स विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। प्रमुख सदस्य हैं ब्राज़ील रूस, इंडिया , चाइना व साउथ अफ्रीका। हाल के वर्षों में विस्तार भी हुआ है। इसमें नए देशों को शामिल किया गया है, जिससे यह समूह वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में अधिक प्रभावशाली बना है। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देशों के नाम के पहले अक्षरों से ब्रिक्स शब्द बना है।
चुनौतियां ब्राजील, चीन व रूस से भी
खेती-किसानी के मामले में भारत के मुकाबले ब्राज़ील ब्राज़ील सोयाबीन, चीनी और मांस उत्पादन में बेहद मजबूत है। चीन कृषि प्रसंस्करण और तकनीक में
आगे है।
रूस गेहूं निर्यात का बड़ा खिलाड़ी है। ऐसे में भारतीय किसानों को गुणवत्ता, उत्पादकता और लागत प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्राकृतिक उत्पाद, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों का पालन करना होगा।
उर्वरक कूटनीति
खाड़ी युद्ध के कारण रासायनिक उर्वरकों का संकट बड़ा हो गया है भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देश में है। यह बैठक उर्वरक कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। ब्रिक्स देशों में रूस और चीन उर्वरकों के बड़े उत्पादक हैं। सहयोग बढ़ने पर उर्वरकों और कृषि आदानों की आपूर्ति स्थिर हो सकती है, जिससे लागत कम रखने में मदद मिलेगी।
रणनीतिक अवसर
भारत इस सम्मेलन से खुद को ‘वैश्विक खाद्य सुरक्षा और छोटे किसानों के हितों के प्रतिनिधि’ के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
छोटे किसानों, डिजिटल कृषि, मोटे अनाज मिलेट श्री अन्न, जैविक खेती और जलवायु-अनुकूल कृषि मॉडल को ब्रिक्स मंच पर बढ़ावा देकर अपनी महत्ता स्थापित कर सकता है।
ब्रिक्स के सामने प्रमुख चुनौतियां
जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़ और अनियमित वर्षा।
छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने की चुनौती।
खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करना।
उर्वरकों और कृषि आदानों की लागत।
उत्पादों के लिए स्थिर बाजार और बेहतर मूल्य।
नई तकनीकों और डिजिटल नवाचार का सीमित प्रसार।
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