दवाइयों से लेकर जांच तक स्वास्थ्य सेवाओं में खुली लूट: हाई कोर्ट की डबल बेंच आज करेगी याचिका पर सुनवाई
KHULASA FIRST
संवाददाता

एक ही दवा के अलग-अलग दाम, जांच के रेट में भी भारी अंतर
डॉक्टरों की मनमानी पर उठे सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश में स्वास्थ्य सेवाएं अब सेवा नहीं, ‘संगठित कारोबार’ बन चुकी हैं। मरीजों की मजबूरी को हथियार बनाकर दवाइयों और मेडिकल जांच के नाम पर खुलेआम लूट मचाई जा रही है।
हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अब इस ‘मेडिकल माफिया’ के खिलाफ आवाज हाई कोर्ट तक पहुंची है, जहां एक जनहित याचिका ने पूरे सिस्टम का खुलासा किया है।
मेडिकल जांच और दवाइयों की कीमतों में अंतर को लेकर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर जस्टिस विजय कुमार शुक्ला एवं आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच आज सुनवाई करेगी।
याचिका वरिष्ठ पत्रकार रमण रावल द्वारा सीनियर एडवोकेट विजय आसुदानी के माध्यम से दाखिल की गई है, जिसमें स्वास्थ्य व्यवस्था में लूट को चुनौती दी गई है।
एक ही दवा के दाम अलग-अलग, मरीज आखिर जाए तो जाए कहां?- याचिका का सबसे गंभीर बिंदु दवाइयों के रेट में भारी अंतर को लेकर है। बताया गया है कि एक ही ड्रग (जैसे पैरासिटामॉल) अलग-अलग कंपनियों के नाम से बाजार में उपलब्ध है, लेकिन कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क है।
कहीं यह दवा 5 रुपए में मिल रही है तो कहीं उसकी कीमत 3 से 4 गुना ज्यादा वसूली जा रही है। याचिका में कई ऐसी दवाओं की सूची भी प्रस्तुत की गई है, जो इस ‘रेट गैप’ का खुलासा करती है। सवाल यह है कि जब दवा एक ही है, तो कीमत में इतना अंतर क्यों?
जांच के नाम पर खेल, हर लैब का अलग रेट- दूसरा बड़ा मुद्दा मेडिकल जांच की कीमतों में भारी असमानता का है। अलग-अलग लैब और निजी अस्पताल एक ही जांच के लिए अलग-अलग रेट वसूल रहे हैं।
कहीं सस्ती जांच उपलब्ध है, तो कहीं वही जांच कई गुना महंगी। चौंकाने वाली बात यह कि यदि कोई मरीज सस्ती लैब से जांच करा लेता है, तो आमतौर पर डॉक्टर उसकी रिपोर्ट को मान्य ही नहीं करते।
यानी मरीज को मजबूर किया जाता है कि वह ‘चयनित’ और महंगी लैब में ही जांच कराए। यह सीधे-सीधे गठजोड़ और कमीशनखोरी की ओर इशारा करता है।
सरकार की चुप्पी पर सवाल- याचिका में यह भी खुलासा किया गया है कि सरकार ने करीब 10 साल पहले इस तरह की अव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाया था, लेकिन आज तक उसका नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया।
निजी अस्पतालों में इलाज कम, बिल ज्यादा
मामले ने और गंभीर मोड़ तब लिया, जब शहर के एक निजी अस्पताल प्रतिभा हॉस्पिटल एंड आईवीएफ सेंटर पर गंभीर आरोप सामने आए। यहां इलाज के नाम पर जो खुलासा हुआ, वह चौंकाने वाला है।
मरीज को सस्ती (जेनेरिक) दवाएं दी गईं, लेकिन बिल महंगी (ब्रांडेड) दवाओं का बनाया गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि मरीज को धीरे-धीरे आराम मिला और उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा, जिससे बिल लगातार बढ़ता गया।
हॉस्पिटल नहीं, होटल बन चुके हैं
याचिका और आरोपों में यह भी कहा गया है कि अस्पताल अब ‘हॉस्पिटैलिटी बिजनेस’ में बदल चुके हैं। डॉक्टर कमीशन आधारित सिस्टम में काम कर रहे हैं।
दवाइयों में 70% तक का मार्जिन रखा जा रहा है। यानी इलाज अब ‘कमाई का जरिया’ बन चुका है।
अब कोर्ट से उम्मीद
पूरा मामला यह साबित करता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का गंभीर अभाव है। मरीज मजबूर, सिस्टम मौन और निजी अस्पताल बेलगाम हैं। अब निगाहें हाई कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां से उम्मीद की जा रही है कि इस ‘मेडिकल लूट’ पर लगाम लगाने के लिए कड़े निर्देश जारी होंगे। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह लूट बेलगाम होती जाएगी और इसकी कीमत हर आम आदमी को अपनी जेब और जान दोनों से चुकाना पड़ेगी।
प्रतिभा हॉस्पिटल में अव्यवस्था के आरोप
इंटरनेट पर अस्पताल के रिव्यू भी इस अव्यवस्था की पुष्टि करते नजर आते हैं। मरीजों और उनके परिजन ने हॉस्पिटल के कैशलेस डिपार्टमेंट और मैनेजमेंट को बेहद खराब बताया। एक मामले में 10,000 रुपए का रिफंड 40 दिन बाद भी नहीं मिला, जबकि इंश्योरेंस क्लेम पूरा सेटल हो चुका था।
स्टाफ का असहयोग, लंबा इंतजार और धीमा रिस्पॉन्स लगातार शिकायतों में सामने आया। डॉक्टरों के देरी से आने और रूखे व्यवहार की भी शिकायतें मिलीं। कैशलेस अप्रूवल में गड़बड़ी, मरीजों को जानकारी न देने और घंटों इंतजार कराने, नर्सिंग स्टाफ की लापरवाही और गलत उपचार जैसे गंभीर आरोप लगे। मरीजों ने अस्पताल को महंगा, अव्यवस्थित और गैर-पेशेवर बताया।
80 वर्षीय मरीज के साथ लापरवाही
करीब 80 वर्षीय नंदकुंवर शर्मा को अस्पताल में भर्ती कराया गया। आरोप है कि भर्ती के दौरान लिया गया यूरिन सैंपल लैब तक पहुंचा ही नहीं। इसके बावजूद यूटीआई (यूरिन इन्फेक्शन) का कोई उपचार नहीं दिया गया।
सिर्फ सोडियम का इलाज कर दो दिन में छुट्टी दे दी गई। चार दिन बाद जब हालत बिगड़ी तो दोबारा भर्ती करना पड़ा और तब जाकर संक्रमण की पुष्टि हुई, जबकि मरीज 20 दिन से परेशानी झेल रही थी। यह घटना घोर लापरवाही के साथ ही गंभीर चिकित्सा अपराध की ओर संकेत करती है।
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