भोजशाला मूल रूप से हिंदू धार्मिक स्थल: हाई कोर्ट में हिंदू पक्ष ने रखे सशक्त वैज्ञानिक प्रमाण
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर चल रही कानूनी जंग सबसे अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। हाई कोर्ट में हिंदू समाज द्वारा लगातार चार दिन रखे गए सशक्त तर्कों व प्रमाणों ने बहुचर्चित विवाद को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
हिंदू पक्ष ने अपने तर्कों का समापन कर अदालत के सामने एएसआई सर्वे, वैज्ञानिक परीक्षणों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर जोरदार दावा किया भोजशाला मूल रूप से प्राचीन मंदिर है और उस पर पूर्ण अधिकार हिंदू समाज को दिया जाना चाहिए।
इस दौरान अदालत में गहमागहमी का माहौल रहा। प्रस्तुत तथ्यों और दस्तावेजों ने मामले की गंभीरता को बढ़ा दिया है। अब सभी की निगाह न्यायालय की अगली कार्यवाही और फैसले पर टिकी हुई हैं।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने डिवीजन बेंच के समक्ष विस्तार से पक्ष रखते हुए कहा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई) द्वारा कराए गए करीब 98 दिन लंबे सर्वे में कई ऐसे प्रमाण सामने आए हैं, जो इस स्थल के मंदिर स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
संरचना में उपयोग किए गए पत्थरों, स्तंभों और स्थापत्य शैली में स्पष्ट भिन्नता दिखाई देती है, जो अलग-अलग कालखंडों में निर्माण और बदलाव की ओर संकेत करती है। यह तथ्य इस बात को बल देता है मूल संरचना मंदिर थी, जिसमें बाद में परिवर्तन किए गए।
धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख
अधिवक्ता जैन ने उन धार्मिक चिह्नों का विशेष उल्लेख किया, जो सर्वे और खुदाई में सामने आए हैं। इनमें कृतिमुख, भगवान गणेश की मूर्ति, त्रिशूल, शंख, घंटियां और अन्य प्रतीक शामिल हैं।उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि इस प्रकार के प्रतीक किसी इस्लामिक ढांचे का हिस्सा नहीं हो सकते।
ऐसे में यह मानने के पर्याप्त आधार हैं भोजशाला का मूल स्वरूप मंदिर का था, जिसे बाद में बदला गया। हिंदू पक्ष ने अपने दावों को और मजबूत करने के लिए वैज्ञानिक जांचों का भी सहारा लिया। कार्बन डेटिंग, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वे और पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त निष्कर्षों को अदालत के सामने रखा।
अधिवक्ता जैन के अनुसार, इन वैज्ञानिक परीक्षणों से संकेत मिलता है वर्तमान ढांचे से पहले प्राचीन संरचना मंदिर के रूप में विकसित हुई थी। साथ ही, मौजूदा ढांचे में प्रयुक्त कई खंभे और पत्थर उसी मूल संरचना के अवशेष हैं।
2003 के आदेश पर उठे सवाल: हिंदू पक्ष ने 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी कटघरे में खड़ा किया, जिसमें भोजशाला परिसर में पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित किए गए थे।
अदालत से मांग की गई इस आदेश को निरस्त किया जाए, क्योंकि ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के विपरीत है। हिंदू पक्ष का कहना है यदि साक्ष्य मंदिर की पुष्टि करते हैं, तो फिर पूर्ण अधिकार भी उसी आधार पर तय होना चाहिए।
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