देर आए दुरुस्त आए: चार गुना मुआवजे के बावजूद नहीं रुकेगी गाइड लाइन बनाम बाजार मूल्य की लड़ाई
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भूमि अधिग्रहण मुआवजे की गणना-सरल भाषा में
1. गाइडलाइन मूल्य : सरकार द्वारा भूमि संपत्ति का क्षेत्र अनुसार तय किया गया दाम।
उदाहरण: सरकार कहती है इस जमीन का मूल्य या गाइडलाइन ₹10 लाख प्रति एकड़ है।
2. बाजार मूल्य: वही जमीन असल में बाजार में ₹50 लाख प्रति एकड़ में बिकती है।
3. मल्टीप्लिकेशन फैक्टर: गाइडलाइन को इस संख्या से गुणा करते हैं। मान लीजिए जमीन का गाइडलाइन मूल्य = ₹10 लाख
चरण... पुरानी व्यवस्था (फैक्टर 1)/ नई व्यवस्था (फैक्टर 2)
गाइडलाइन मूल्य... ₹10 लाख/ ₹10 लाख/ × मल्टीप्लिकेशन फैक्टर/ × 1 = ₹10 लाख/ × 2 = ₹20 लाख/ × सॉलेशियम (दोगुना)/ × 2 = ₹20 लाख/ × 2 = ₹40 लाख/ कुल मुआवजा/ ₹20 लाख/₹40 लाख
मोहन सरकार ने गेहूं उपार्जन फसलों के दाम आदि पर चौतरफा किसान विरोध, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उग्र होते आंदोलन और सरकार की बढ़ती अलोकप्रियता से ध्यान हटाने के लिए यह बड़ा फैसला कर लिया। हालांकि इसकी तैयारी मुख्यमंत्री ने पिछले वर्षों से ही शुरू कर दी थी, लेकिन टाइमिंग इस समय का रहा।
अब ग्रामीण क्षेत्र की कृषि भूमि के अधिग्रहण के बदले चार गुना मुआवजा देने का फैसला प्रदेश की कैबिनेट ने ले लिया। इससे खुलासा फर्स्ट की भूमि अधिग्रहण और उससे जुड़े विषयों पर भी मोहर लगी है।
यह है मामला- भू-अर्जन कानून 2013 की पहली अनुसूची के क्रमांक 2 के अनुसार किसी भी किसान के आकलित मुआवजे में एक गुणांक से गुणा किया जाएगा और यह गुणांक शहरी क्षेत्र के लिए 1 व ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 1 से 2 तक होगा, परंतु मध्य प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुखिया शिवराज सिंह ने नौकरशाही के दबाव-प्रभाव में सन् 2014 में इस गुणांक को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी 1 ही घोषित किया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को बहुत नुकसान हो रहा था।
उक्त कानून को केंद्र सरकार भी बार-बार संशोधित करके कमजोर करती रही। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ भारतीय किसान संघ ने बार-बार सरकार के सामने इस विसंगति को उठाते हुए मांग की कि इस गुणांक को 2 किया जाए। तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार द्वारा निर्णय न लेने पर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई, जो फाइनल हियरिंग पर है।
प्रेरक और उत्प्रेरक बना खुलासा फर्स्ट
सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, भूजल आदि जैसे संवेदनशील मुद्दों को सीधे प्रभावित करने वाली खेती-किसानी और मुआवजा राशि को लेकर पिछली और इस समय की सरकार को खुलासा फर्स्ट समाचार-पत्र और इसकी डिजिटल न्यूज सेवा के द्वारा लगातार सचेत करने के अभियान की भूमिका इस फैसले में साफ झलकती है।
मीडियानवीसों ने शायद इस विषय को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। इस फैसले से अब हो सकता है मुख्य धारा के मीडिया को विषय की गंभीरता समझ में आ जाए तो बात अलग है। डॉ. मोहन यादव की कैबिनेट ने भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजा देने के फैक्टर-1 की जगह फैक्टर-2 करने का जो फैसला लिया है, वह गाइड लाइन के आधार पर निर्धारित होगा।
यह फैसला भले ही मजबूरी में लेना पड़ा हो, लेकिन इससे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की बोल्ड डिसीजन लेने की क्षमता परिलक्षित होती है, जो शिवराजसिंह चौहान में नहीं थी।
सरकार के इस फैसले से किसानों के साथ अभी पूरा न्याय नहीं हुआ है। चार गुना मुआवजे की सार्थकता तभी है, जब भूमि क्रय-विक्रय की गाइड लाइन जहां कम है, उसे बाजार मूल्य के बराबर लाया जाए। प्रदेश में 2008 से अमूमन गाइडलाइन में ज्यादा वृद्धि नहीं हुई।
2018 में कमल नाथ की कांग्रेस सरकार ने और बड़ा अत्याचार करते हुए गाइडलाइन लगभग 20% कम कर दी। भारतीय किसान संघ के कृष्णपाल कहते हैं ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ, जब महंगाई चरम पर हो, जमीन के भाव आसमान पर हों और मध्य प्रदेश में गाइड लाइन के अनुसार जमीन कौड़ियों के भाव में अधिग्रहित होती है, क्योंकि गाइड लाइन प्रदेश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यंत कम है, जबकि इसी जमीन का बाजार मूल्य कई गुना ज्यादा है।
सरकार गाइड लाइन से चार गुना मुआवजा देती है तो भी फायदे में रहेगी, वहीं भूमि स्वामी किसान नुकसान में रहेंगे।
राज्य सरकार 2014 के बाद के सभी भू-अर्जनों पर फैसला लागू कर अतिरिक्त मुआवजा दे। यह मांग मां नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रमुख आलोक अग्रवाल ने की है। अब तक यह हो रहा था नर्मदा आंदोलन के आलोक अग्रवाल ने बताया
भूअर्जन कानून-2013 की पहली अनुसूची के क्रमांक 2 के अनुसार किसी भी किसान के आकलित मुआवजे में एक गुणांक से गुणा किया जाएगा और यह गुणांक शहरी क्षेत्र के लिए 1 और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 1 से 2 तक होगा, परंतु मप्र सरकार ने 2014 में इस गुणांक को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी 1 ही घोषित किया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को बहुत नुकसान हो रहा था।
मुख्य समस्या अब भी वही
भारतीय किसान संघ के लक्ष्मीनारायण पटेल, कृष्णपाल सिंह व दिलीप मुकाती का कहना है कि प्रदेश में 2008 के बाद से अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में गाइडलाइन दरों में अपेक्षित वृद्धि नहीं की गई। इंदौर की पश्चिमी रिंग रोड के खिलाफ भारतीय किसान संगठन ने गाइडलाइन बढ़ाने का आंदोलन शुरू किया था, जो अब निमाड़ तक पहुंच गया है। नर्मदा किनारे बड़वाह-धामनोद फोरलेन परियोजना से प्रभावित किसान शुरू से ही प्रोजेक्ट एरिया की भूमि की गाइडलाइन बढ़ाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।
उनकी मांग है- पहले गाइड लाइन को बाजार भाव के बराबर करो, तभी जमीन देंगे और चार गुना मुआवजा लेंगे।
मप्र सरकार का ऐतिहासिक निर्णय
अब ग्रामीण क्षेत्रों में मल्टीप्लिकेशन फैक्टर को बढ़ाकर 2.0 कर दिया गया है, जिससे किसानों को उनकी कृषि भूमि के बदले बाजार मूल्य का लगभग 4 गुना तक मुआवजा मिल सकेगा। इस निर्णय से किसानों को उनकी जमीन का बेहतर और न्यायसंगत मूल्य मिलना सुनिश्चित होगा। - डॉ. मोहन यादव, मुख्यमंत्री
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