धरती का वैकुंठ है बद्रीनाथ धाम: जहां आज भी जीवंत है सतयुग की शांति
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बहुनि सन्ति तीर्थानि दिवि भूमौ रसासु च। बद्री सदृशं तीर्थं न भूतं न भविष्यति॥ अर्थात्: आकाश, पृथ्वी और पाताल में बहुत से तीर्थ हैं, लेकिन बद्रीनाथ जैसा तीर्थ न कभी था और न कभी भविष्य में होगा। इस पुराण में बद्रीनाथ को ‘मुक्तिप्रदा’ कहा गया है, जिसका अर्थ है मोक्ष प्रदान करने वाला स्थान।
हिमालय की गोद में, जहां अलकनंदा की लहरें वैकुंठ का गान करती हैं और नर-नारायण पर्वत ध्यान की मुद्रा में खड़े हैं, वहीं स्थित है ‘धरती का वैकुंठ’ यानी बद्रीनाथ धाम। 23 अप्रैल की पावन तिथि को शीतकाल के छह महीनों की लंबी निद्रा के बाद भगवान बद्रीनारायण अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए जागृत होंगे।
चार धाम यात्रा का यह अंतिम पड़ाव केवल एक गंतव्य नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का एक दिव्य अनुभव है। भागवत पुराण में इस क्षेत्र को भगवान के ‘नर-नारायण’ अवतार की तपस्थली बताया गया है। इसमें उल्लेख है कि भगवान विष्णु यहां सतयुग से निराहार रहकर मानवता के कल्याण के लिए तपस्या कर रहे हैं।
भागवत पुराण के अनुसार, यह वह स्थान है, जहां ज्ञान और भक्ति का साक्षात् मिलन होता है। पद्म पुराण में बद्रीनाथ को ‘योगसिद्ध’ क्षेत्र कहा गया है। इसमें वर्णन है कि इस स्थान के दर्शन मात्र से मनुष्य के पिछले कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां की अलकनंदा नदी को ‘पापमोचिनी’ के रूप में पूजा गया है।
विष्णु पुराण में इस धाम के भौगोलिक और आध्यात्मिक स्वरूप का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर बद्रीनाथ के दर्शन करता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। यहां भगवान को ‘बद्रीविशाल’ के नाम से संबोधित किया गया है।
पुराणों के अनुसार, सतयुग में यह धाम प्रत्यक्ष ‘वैकुंठ’ था, त्रेतायुग में यह ‘योग सिद्ध’ स्थान बना, द्वापर युग में इसे ‘मणिभद्र आश्रम’ कहा गया और वर्तमान कलियुग में यह ‘बद्रीनाथ धाम’ के नाम से विख्यात है।
आदि गुरु शंकराचार्य और मंदिर का पुनरुद्धार... बद्रीनाथ धाम की वर्तमान व्यवस्था और पूजा पद्धति का श्रेय 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि गुरु शंकराचार्य को जाता है। इतिहास कहता है कि उन्होंने ही अलकनंदा नदी के ‘नारद कुंड’ से भगवान की शालिग्राम से बनी प्रतिमा को निकाला था और उसे गरुड़ गुफा में स्थापित किया था। आज भी, यहां के मुख्य पुजारी (रावल) दक्षिण भारत के नंबूदरी पाद ब्राह्मण ही होते हैं, जो भारत की सांस्कृतिक एकता का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है।
भगवान विष्णु का ‘तप’ और ‘बदरी’ का रहस्य... बद्रीनाथ धाम से जुड़ी पौराणिक कथाएं अत्यंत रोचक हैं। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु इस निर्जन हिमालयी क्षेत्र में कठोर तपस्या कर रहे थे, तब उनकी पत्नी लक्ष्मी ने उन्हें हिमपात और भीषण ठंड से बचाने के लिए ‘बदरी’ (बेर) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया था।
भगवान की रक्षा के लिए माता द्वारा किए गए इस बलिदान के कारण ही इस स्थान को ‘बद्रीनाथ’ (बदरी के नाथ) और यहां की वनस्पति को ‘बदरी वन’ कहा गया। यहां भगवान विष्णु अपनी चतुर्भुज मूर्ति में शांत, ध्यानमग्न मुद्रा (पद्मासन) में विराजमान हैं। मान्यता है कि यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान विष्णु योग मुद्रा में स्थित हैं, जो शांत चित्त और आत्मज्ञान का प्रतीक है।
विभिन्न पुराणों में समय-समय पर बद्रीनाथ के लिए इन नामों का भी प्रयोग किया गया है।
मुक्तिप्रदा : मोक्ष देने वाली भूमि।
योगसिद्धा: जहां योग की पूर्णता प्राप्त होती है।
बद्रिकाश्रम: बद्री (बेर) के वृक्षों वाला आश्रम।
विशाला: अपने विशाल आध्यात्मिक प्रभाव के कारण।
नर-नारायण स्थान: ऋषियों की तपस्या के कारण।
धाम के रोचक और रहस्यमयी पहलू
बद्रीनाथ केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, इसके कण-कण में रहस्य और चमत्कार बसे हैं। तप्त कुंड : मंदिर के ठीक नीचे अलकनंदा किनारे स्थित यह गर्म पानी का कुंड किसी चमत्कार से कम नहीं है। बाहर का तापमान शून्य से नीचे होने पर भी इस कुंड का पानी उबलता रहता है, जहां श्रद्धालु दर्शन से पहले स्नान करते हैं।
माणा गांव (भारत का अंतिम गांव): बद्रीनाथ से महज तीन किमी की दूरी पर स्थित इस गांव का संबंध महाभारत काल से है। यहीं व्यास गुफा है, जहां बैठकर महर्षि व्यास ने महाभारत लिखी थी। शंख की ध्वनि वर्जित: बद्रीनाथ मंदिर के भीतर शंख नहीं बजाया जाता।
इसके पीछे पौराणिक कारण यह है कि जब अगस्त्य मुनि ने राक्षसों का वध किया था, तब दो राक्षस (वातापी और आतापी) भागकर शंख में छिप गए थे। वहीं वैज्ञानिक तर्क यह है कि हिमालय के इस संवेदनशील क्षेत्र में शंख की प्रतिध्वनि से बर्फ के पहाड़ों के खिसकने का खतरा रहता है।
शीतकालीन प्रवास और ‘अखंड ज्योति’ का महत्व
हिमालय की भीषण बर्फबारी के कारण जब अक्टूबर-नवंबर में मंदिर के कपाट बंद होते हैं, तो भगवान की उत्सव मूर्ति को जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर लाया जाता है। कपाट बंद करते समय मंदिर के भीतर एक दीपक जलाया जाता है, जिसे ‘अखंड ज्योति’ कहते हैं। 23 अप्रैल को जब कपाट खुलेंगे, तो भक्त सबसे पहले इसी ज्योति के दर्शन करेंगे, जो छह महीने बाद भी प्रज्वलित मिलती है।
यह विश्वास की वह अटूट लौ है, जो हर श्रद्धालु के हृदय में बसती है। कपाट खुलने के साथ ही देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में ‘जय बद्री विशाल’ के जयघोष गूंजने लगेंगे। बद्रीनाथ की यात्रा केवल पापों के शमन के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति की उस असीम शक्ति को महसूस करने के लिए है, जहां पहुंचकर मनुष्य स्वयं को भूलकर ब्रह्म में लीन हो जाता है। यदि आप शांति और मोक्ष की तलाश में हैं, तो बद्रीनाथ धाम की पुकार आपके लिए ही है।
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