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कहीं भारी न पड़ जाए गाइडलाइन पर गुस्सा

KHULASA FIRST

संवाददाता

30 जनवरी 2026, 3:48 pm
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कहीं भारी न पड़ जाए गाइडलाइन पर गुस्सा

उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इस मामले में जारी विवादों पर चर्चा से पहले नए नियमों को भी देख लेना चाहिए। नए नियमों में भेदभाव को पूरी तरह अनुचित, पक्षपाती व्यवहार माना गया है।

इसके तहत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ही नहीं, जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान, या विकलांगता जैसे आधार पर भी भेदभाव गलत माना गया है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की जनवरी में जारी गाइडलाइन के खिलाफ देशभर के छात्रों और शिक्षाविदों के एक बड़े तबके में भारी रोष दिख रहा है।

प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026  यानी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम को लेकर सामान्य वर्ग आशंकित है।

उसका कहना है कि यह गाइडलाइन निष्पक्ष नहीं है, और इसके ज़रिए सामान्य वर्ग के छात्रों का उत्पीड़न हो सकता है। 

दरअसल नए नियमों में ‹जातिगत भेदभाव› का मतलब केवल अनुसूचित जाति यानी एससी, अनुसूचित जनजाति यानी एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के खिलाफ भेदभाव बताया गया है।

विवाद इसी को लेकर है । सामान्य वर्ग के छात्रों और छात्र संगठनों का आरोप है कि यह परिभाषा एकतरफा है और इसमें ‹सामान्य वर्ग› के खिलाफ भेदभाव या झूठी शिकायतों का कोई जिक्र नहीं है। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की जनवरी में जारी गाइडलाइन के ख़िलाफ़ देशभर के छात्रों और शिक्षाविदों के एक बड़े तबके में भारी रोष दिख रहा है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 यानी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम को लेकर सामान्य वर्ग आशंकित है। उसका कहना है कि यह गाइडलाइन निष्पक्ष नहीं है, और इसके ज़रिए सामान्य वर्ग के छात्रों का उत्पीड़न हो सकता है।

इस मामले में जारी विवादों पर चर्चा से पहले नए नियमों को भी देख लेना चाहिए। नए नियमों में भेदभाव को पूरी तरह अनुचित, पक्षपाती व्यवहार माना गया है। इसके तहत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ही नहीं, जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान, या विकलांगता जैसे आधार पर भी भेदभाव गलत माना गया है।

इस नियम में शिक्षा में समानता को बाधित करने वाले या मानवीय गरिमा का उल्लंघन करने वाले हर काम को ग़लत माना गया है। इस गाइडलाइन के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केंद्र यानी ईओसी स्थापित करना जरूरी होगा।

इस केंद्र का उद्देश्य संस्थान में समता, सामाजिक समावेशन एवं समान पहुँच को बढ़ावा देना तो होगा ही, साथ ही शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समाधान करना भी होगा। इस गाइडलाइन के अनुसार, हर संस्थान  को ईओसी के तहत एक समता समिति बनानी होगी, जिसका अध्यक्षता संस्थान का प्रमुख होगा।

समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग व्यक्ति और महिला का प्रतिनिधित्व जरूरी होगा , ताकि समावेशी निर्णय-प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।

सामान्य वर्ग की आशंका की वजह है, पहले से लागू एससी और एसटी कानून, जिसके गलत इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी टिप्पणी कर चुका है। उसके तहत बिना वजह झूठे आरोपों के चलते सामान्य जीवन ही नहीं, बल्कि सरकारी दफ्तरों तक में सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ झूठे मामले दर्ज किए गए हैं और उन्हें बिना वजह प्रताड़ना और गिरफ्तारी तक झेलनी पड़ी है। उसी आलोक में यूजीसी के इस नए नियम का विरोध हो रहा है।

आलोचकों का मानना है कि इस नियम के मुताबिक़ जो इक्विटी कमेटियां› यानी समानता समितियां बनेंगी, वे शायद ही निष्पक्ष रहे। यह भी कहा जा रहा है कि समानता समितियों को इस नियम के तहत जो शक्तियां दी गई गईं हैं, उन्हें सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

विरोध कर रहे छात्रों का यह भी कहना है कि अगर कोई गलत शिकायत दर्ज करता है, तो उसे सजा देने का प्रावधान नहीं है, इससे सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए असुरक्षित माहौल बन सकता है। 

सामान्य वर्ग के बड़ा तबका इस नियम के दुरूपयोग को लेकर आशंकित हो उठा है। इसी आशंका ने वह विक्षुब्ध हो चुका है। उसका मानना है कि ये नियम शिक्षा सुधार के बजाय परिसरों में ना सिर्फ जातिवाद को बढ़ावा देगा, बल्कि सामाजिक विभाजन को भी बढ़ावा मिलेगा।

इन नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संस्थानों को दंडित किया जा सकता है, जिसके तहत उनकी फंडिंग रोकी जा सकती है, उनका डिग्री देने का अधिकार छीना जा सकता है और गंभीर उल्लंघन की स्थिति में उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है।  

हालांकि यूजीसी का कहना है कि यह ताजा नियम साल 2012 के उसके भेदभाव-विरोधी ढांचे की व्यवस्था को ही मजबूत करते हैं। यूजीसी का तर्क है कि उसने ये नियम उस आंकड़े के बाद लागू किए हैं, जिनके तहत पता चलता है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 2019 की तुलना में 2023 में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। वैसे हकीकत यह भी है कि यह निर्णय हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या की 10वीं वर्षगांठ और सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्देश के बाद आया है।

चूंकि रोहित वेमुला केस को लेकर उस वक्त देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कैंपस का राजनीतिक तापमान बढ़ गया था। तब इस आत्महत्या को बीजेपी विरोधी राजनीतिक ताकतों ने बीजेपी पर हमले के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था तो बीजेपी समर्थकों का मानना था कि इस मामले को बेवजह भेदभाव की राजनीति का रूप दिया गया था।

तब सामान्य वर्ग के छात्रों और वोटरों ने इस मुद्दे पर बीजेपी का खुलकर साथ दिया था। इसी वजह से उसे लगता है कि यूजीसी के नए नियमों से ना सिर्फ उसकी उपेक्षा हो रही है, बल्कि उनके हितों की अनदेखी की जा रही है।

एससी-एसटी उत्पीड़न के कानून को चाहे जितना भी समानता लाने वाला माना जाता हो, लेकिन जिस तरह उसके फर्जी इस्तेमाल की घटनाएं बढ़ी हैं, और उसके जरिए जिस तरह सामान्य  वर्ग के उत्पीड़न के वाकये बढ़े हैं, उससे सामान्य वर्ग इस कानून का घोर विरोधी हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बावजूद नौकरियों और पढ़ाई में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर क्षोभ और असंतोष अब भी सामान्य वर्ग में व्याप्त है। इन्हीं संदर्भों में यूजीसी के नए नियमों को लेकर आशंकाएं सामान्य वर्ग में बढ़ी है।

सामान्य वर्ग इस नियम के कितना खिलाफ है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया को देखना होगा, जहां #UGCRollback ( यूजीसी रोलबैक) ट्रेंड करता रहा। सोशल मीडिया पर अब भी सामान्य वर्ग के छात्र इस नियम को अन्यायपूर्ण मानते हुए इसके विरोध में अभियान चला रहे हैं।

करणी सेना सहित कुछ संगठन भी इस नियम के विरोध में उतर आए हैं। सवर्ण तबका भारतीय जनता पार्टी का पांरपरिक और निष्ठावान मतदाता है। एससी-एसटी के दुरूपयोग के मामले की सुनवाई के बाद  सुप्रीम कोर्ट ने जब उस पर सवाल उठाए थे तो सामान्य वर्ग के लोगों ने सोचा था कि इस कानून से मुक्ति मिल जाएगी।

हालांकि ऐसा नहीं हुआ। सामान्य वर्ग की जब  यह आस टूटी तो निराश भाव से वह चुप रह गया था। यूजीसी के नए नियमों को लेकर सतह पर कोई आंदोलन नहीं दिख रहा। लेकिन लोग अंदर ही अंदर खदबदा रहे हैं। अगर बीजेपी ने इस दिशा में नहीं सोचा तो विपक्षी खेमे से इस आंच को हवा दी जा सकती है।

जिसका असर आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों में पड़ सकता है। बीजेपी की ओर से इस विवाद को थामने की सांस्थानिक कोशिश अभी नहीं दिख रही है। हालांकि, इस विवाद को थामने  को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे प्रयास करते दिख रहे हैं।

उन्होंने सामान्य वर्ग के छात्रों को आश्वासन दिया है कि उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा।  लेकिन उनका यह आश्वासन  काम आता नहीं दिख रहा।  उन्होंने एक्स पर लिखा है, “नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनकर सवर्ण समाज को सर्वोच्च न्यायालय से मान्यता दिलाकर 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, यही सत्य है, उनके रहते सवर्ण जाति के बच्चों को कोई भी नुकसान नहीं होगा।बाबा साहब आंबेडकर के बनाए संविधान के आर्टिकल 14 का अनुपालन संविधान की मूल भावना है।”

भारत में करीब 41 करोड़ सवर्ण मतदाता हैं। उत्तर भारत में इसकी बड़ी हिस्सेदारी बीजेपी की समर्थक है। यूजीसी के नियमों को लेकर यही वर्ग विक्षुब्ध भी है। इसी सामान्य वर्ग का मतदाता मौजूदा सत्ता तंत्र पर अपने पारंपरिक समर्थक आधार के चलते ज्यादा अधिकार समझता है।

यूजीसी के नियमों से वह गुस्से में तो है, लेकिन अभी खुद को ठगा हुआ महूसूस नहीं कर रहा। उसे उम्मीद है कि मौजूदा सत्ता तंत्र उसकी भी भावनाओं की कद्र जरूर करेगा। हां, अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसकी  नाराजगी बढ़ सकती है। जिसकी कीमत मौजूदा तंत्र को चुकानी पड़ सकती है।

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