खाकी वर्दी में फरिश्ता: चोरल डैम में गूंजी 'बचाओ-बचाओ’ मौत से तीन बार भिड़ा; तीन जिंदगियां खींच लाया बाहर
KHULASA FIRST
संवाददाता

डूबते व्यक्ति ने गले से जकड़ा, फिर भी नहीं हारी हिम्मत
एक को न बचा पाने का दर्द, अब भी मलाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कभी-कभी जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक फैसला खड़ा होता है। चोरल डैम के किनारे भी ऐसा ही एक फैसला हुआ। एक तरफ गहरे पानी में समाती दो जिंदगियां थीं, तो दूसरी तरफ परिवार सहित पिकनिक मनाने आया एक पुलिसकर्मी।
उसने न यह सोचा कि सामने मौत खड़ी है, न यह कि तैराकी किए उसे बरसों बीत चुके हैं। उसने सिर्फ इतना सुना बचाओ...बचाओ...और अगले ही पल अपनी पत्नी के हाथ में मोबाइल और पर्स थमाकर मौत के पानी में छलांग लगा दी।
इस दौरान उन्होंने एक को बचा लिया, दूसरे को बचाने जाते उससे पहले डूब रहे किशोर का रिश्तेदार खुद पानी में कूद गया और वह भी डूबने लगा। उसे बचाने लगे तो डूबते व्यक्ति ने उन्हें गले से जकड़ लिया, खुद डूबने की नौबत आ गई। इस बीच एक विडंबना और खड़ी हो गई।
पुलिसकर्मी की सांसें टूटतीं देख, उनका वह भानजा जिसे तैरना नहीं आता था, भावनाओं में बहकर उन्हें बचाने पानी में कूद गया। हिम्मत जुटाकर पुलिसकर्मी ने खुद को छुड़ाया और डूबते व्यक्ति को किनारे लगाया, लेकिन भानजे की चीख सुनकर तीसरी बार हिम्मत जुटाई और बदन टूटने के बावजूद भानजे को भी बचा लाए।
उस दिन हेड कांस्टेबल उपदेश सिंह तोमर सिर्फ पुलिसकर्मी नहीं रहे, बल्कि तीन जिंदगियों के लिए फरिश्ता बन गए। हालांकि, एक किशोर को न बचा पाने का दर्द अब भी उनके सीने में जिंदा है।
इंदौर के परदेशीपुरा थाने में हेड कांस्टेबल उपदेश सिंह रविवार को पत्नी सोनम, बच्चों आध्या (11), अधिराज (5) और भानजे नैतिक पिता रिंकू चौहान निवासी गौरी नगर व अन्य रिश्तेदार के साथ पहले पाताल पानी फिर चोरल डैम पिकनिक मनाने पहुंचे थे।
वहां डैम के किनारे परिवार के साथ सुकून के कुछ पल बिता रहे हेड कांस्टेबल उपदेश सिंह तोमर ने अचानक मदद की गुहार सुनी। उन्होंने पत्नी सोनम से कहा, लगता है कोई डूब रहा है...। पत्नी कुछ समझती और प्रतिक्रिया देती, उससे पहले उन्होंने मोबाइल और पर्स उसके हाथ में थमाया और करीब 50 मीटर दौड़ते हुए डैम तक पहुंचे। अगले ही पल उन्होंने बिना एक पल गंवाए गहरे पानी में छलांग लगा दी।
पत्नी की आंखों में डर...फिर गर्व के आंसू... जब उपदेश सिंह किनारे लौटे तो पत्नी सोनम, बेटी आध्या और बेटा अधिराज फूट-फूटकर रो रहे थे। उन्हें लगा था कि शायद वे अपने पति और पिता को खो चुके हैं। बाद में जब सब सुरक्षित लौटे तो डर गर्व में बदल गया। सोनम कहती हैं, उस दिन मुझे अपने पति पर गर्व हुआ। उन्होंने खाकी की शपथ को सच साबित करते हुए अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाने की कोशिश की।
बरसों पुरानी तैराकी, लेकिन हौसला नया था
मूलत: मुरैना जिले के उपदेश सिंह तोमर बताते हैं कि पिता के जेल विभाग में पदस्थ होने के चलते उनकी उज्जैन पदस्थापना के दौरान मैं महज 14-15 साल का था। शिप्रा नदी घर (सरकारी क्वार्टर) से 500 मीटर दूर ही थी।
स्विमिंग पूल में दोस्तों के साथ मामूली तैरना सीख लिया था, लेकिन असली तैराकी शिप्रा नदी में ही सीखी। इस बीच 2011 से जिला पुलिस बल में सिलेक्शन हो गया और शादी, फिर दो बच्चे। पदस्थापना के दौरान से ही इंदौर में हूं।
पुलिस सेवा में आने के बाद उन्हें कभी नदी या डैम में तैरने का मौका नहीं मिला। उन्हें खुद भरोसा नहीं था कि वे किसी की जान बचा पाएंगे, लेकिन उस क्षण इंसानियत ने डर पर जीत हासिल कर ली।
दूसरे को बचाने में लगा मैं खुद डूब जाऊंगा
चंदन नगर क्षेत्र का परिवार पिकनिक मनाने पहुंचा था। परिवार का सुल्तान (करीब 15 वर्ष) और मो. ताहिर मंसूरी (करीब 14 साल) डैम के गहरे पानी में डूबने लगे। पहले किशोर सुल्तान को सुरक्षित बाहर निकालने के बाद मैं दूसरे मो. ताहिर को बचाने के लिए उसकी ओर जाने लगा, तभी उसे बचाने रिश्तेदार मो. सलीम (करीब 44 वर्ष) कूद गया, जबकि उसे खुद तैरना नहीं आता था।
मैं तैरते हुए मो. सलीम के पास पहुंचा तो घबराहट में उसने मुझे ही जकड़ लिया। वह खुद को बचाने के लिए पानी के भीतर खींचने लगा। कुछ पल के लिए मेरी भी सांसें थमने लगीं। मौत सामने दिखाई देने लगी, लेकिन पूरी ताकत लगाकर खुद को उसकी पकड़ से छुड़ाया और उसे खींचकर किनारे तक पहुंचा दिया।
फिर भानजा भी कूद पड़ा मौत के पानी में
किनारे पर खड़े उपदेश सिंह के 19 वर्षीय भानजे नैतिक चौहान ने जब मामा को संघर्ष करते देखा तो भावनाओं में बहकर वह भी पानी में कूद गया, जबकि उसे तैरना तक नहीं आता था। अब हालात और भयावह हो चुके थे। एक साथ कई जिंदगियां खतरे में थीं। उपदेश सिंह ने अद्भुत साहस दिखाते हुए नैतिक को भी संभाला और धक्का देकर सुरक्षित किनारे तक पहुंचाया।
एक अधूरी लड़ाई का दर्द
इस पूरी जद्दोजहद के बीच दूसरा किशोर मो. ताहिर मंसूरी गहरे पानी में ओझल हो गया। सूचना पर बड़गोंदा पुलिस पहुंची और ग्रामीणों और तैराकों की मदद से डेढ़ घंटे बाद मो. ताहिर का शव ढूंढ निकाला।
उपदेश सिंह ने खुलासा फर्स्ट को बताया कि वे चाहते हुए भी मो. ताहिर को नहीं बचा सके। यही कसक आज भी उन्हें भीतर से बेचैन करती है। उनके लिए तीन जिंदगियां बचाने की खुशी से कहीं बड़ा दर्द उस एक किशोर को खो देने का है।
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