200 का इंजेक्शन 1200 में: डॉक्टर की मां के केस ने खोली सिस्टम की पोल
KHULASA FIRST
संवाददाता

हॉस्पिटल या ‘लूट का अड्डा’…इलाज के नाम पर कमीशनखोरी के काले खेल का खुलासा
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
चिकित्सा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जब एक डॉक्टर की मां निजी अस्पताल में भर्ती हुईं, तब इलाज के दौरान जो खुलासा हुआ, उसने पूरे हेल्थ सिस्टम की साख पर दाग लगा दिया।
आरोप है कि मात्र 200 रुपये का इंजेक्शन 1200 रुपये में बेचा गया यानी मरीज की मजबूरी पर सीधा ‘मुनाफा मॉडल’ लागू।
इस मामले ने न सिर्फ अस्पताल प्रबंधन, बल्कि सीएमएचओ और ड्रग इंस्पेक्टर की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या स्वास्थ्य सेवाएं अब ‘सेवा’ नहीं बल्कि ‘सौदा’ बन चुकी हैं?
मेडिक्लेम की आड़ में ‘बिल बढ़ाओ खेल’!... परिजन का आरोप है कि: जेनेरिक (सस्ती) दवाओं से इलाज किया गया, लेकिन बिल एथिकल (महंगी ब्रांडेड) दवाओं का बनाया गया, पूरा खेल इंश्योरेंस कंपनियों से ज्यादा पैसा वसूलने का यानी मरीज को राहत नहीं, बल्कि ‘रेवेन्यू जनरेशन’ का साधन बना दिया गया।
‘दवाइयों का खेल’….मरीजों की जेब पर डाका... विशेषज्ञों के अनुसार जेनेरिक दवाएं 30 से 80 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। इनका प्रभाव और गुणवत्ता लगभग समान होती है।
मगर अस्पताल और मेडिकल स्टोर की मिलीभगत से महंगी दवाओं का बिल थमाया जाता है। यही अंतर ‘कमीशनखोरी’ का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
पंजीकृत फार्मासिस्ट गायब, अनट्रेंड स्टाफ चला रहा मेडिकल... यह मामला और गंभीर तब हो जाता है, जब मेडिकल स्टोर पर अधिकृत फार्मासिस्ट मौजूद ही नहीं मिला।
कर्मचारी खुलेआम बदतमीजी करते नजर आए। उन्होंने ‘जो करना है कर लो…’ जैसे जवाब दिए। यह स्थिति सीधे तौर पर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट का उल्लंघन दर्शाती है।
दस्तावेज और हकीकत में अंतर... खाद्य एवं औषधि प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार मोहम्मद अनस अंसारी (बी.फार्मा) को पंजीकृत फार्मासिस्ट बताया गया।
इनका लाइसेंस 2027 तक वैध, लेकिन मौके पर उनकी अनुपस्थिति गंभीर गड़बड़ी की ओर इशारा करती है।
महापौर परिवार से जुड़ा मामला….फिर भी कार्रवाई शून्य!... चौंकाने वाली बात यह है कि यह मामला महापौर पुष्यमित्र भार्गव के परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है।
इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी, यह सब मिलीभगत के शक को और गहरा करती है।
‘5 स्टार सुविधा’ के नाम पर लूट... आज कई निजी अस्पताल होटल जैसी सुविधाओं का दिखावा कर रहे हैं, लेकिन इलाज के नाम पर सिर्फ बिलिंग मशीन बन चुके हैं।
मरीज और उनके परिजन जहां राहत की उम्मीद लेकर आते हैं, वहीं उन्हें आर्थिक और मानसिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है।
कब खत्म होगा ‘मेडिकल माफिया’?... यह मामला सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में फैले उस ‘मॉडल’ का खुलासा करता है, जहां डॉक्टर, मेडिकल स्टोर और प्रबंधन के बीच कथित गठजोड़ है।
20 दिन तक भटकती रही मरीज… गलत इलाज, अधूरी जांच... 80 वर्षीय नंदकुंवर शर्मा को इलाज के लिए गुमास्ता नगर सेठी गेट के सामने प्रतिभा हॉस्पिटल एंड आईवीएफ सेंटर में भर्ती कराया गया।
यह थ्री डी लेप्रोस्कॉपी और मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल है, जिसके मालिक पति-पत्नी डॉ. भरत जैन और डॉ. मून जैन है। इन पर आरोप है कि भर्ती के दौरान लिया गया यूरिन सैंपल जांच के लिए लैब तक पहुंचा ही नहीं, बावजूद इसके यूटीआई (यूरिन इन्फेक्शन) का कोई उपचार नहीं दिया गया, केवल सोडियम का इलाज देकर दो दिन में छुट्टी कर दी गई।
चार दिन बाद हालत बिगड़ने पर दोबारा भर्ती कराया गया, तब जाकर संक्रमण की पुष्टि हुई, जबकि मरीज 20 दिनों से परेशान थीं।
मरीज की मजबूरी, मुनाफे का अवसर...
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन जागेगा या फिर मरीज यूं ही लुटते रहेंगे? पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए सीएमएचओ डा. माधव हसानी से अब तक क्या कार्रवाई की गईं कि जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया तो हाई कोर्ट मीटिंग में होना बताया गया।
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