गायन के क्षेत्र में संघर्ष और साहस का अद्भुत सफर: सुरों की ‘मलिका-ए-तरन्नुम’ आशा भोसले
KHULASA FIRST
संवाददाता

गायकी की खासियत
जयसिंह रघुवंशी स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट।
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में यदि कोई ऐसी आवाज थी, जो उम्र को मात देकर हमेशा जवां बनी रही तो वो थी आशा भोसले की आवाज। 8 सितंबर, 1933 को सांगली (महाराष्ट्र) में जन्मी आशा ताई ने अपनी जादुई आवाज से न केवल करोड़ों दिलों को जीता, बल्कि खुद को भारतीय पार्श्व गायन की बहुमुखी आवाज के रूप में स्थापित किया।
लता की छाया और संघर्ष की अग्नि... आशाजी के लिए संगीत की राह कभी फूलों की सेज नहीं थी। उनके सामने अपनी बड़ी बहन और ‘सुर साम्राज्ञी’ लता मंगेशकर की एक विराट छवि थी।
संगीत जगत में लताजी का इतना दबदबा था कि किसी भी नई गायिका के लिए जगह बनाना लगभग असंभव था। उस दौर में आशाजी को अक्सर वे गाने मिलते थे, जिन्हें लताजी या अन्य गायिकाएं ठुकरा देती थीं। जैसे कैबरे, चुलबुले या थोड़े ‘बोल्ड’ गाने।
निजी जीवन में भी उन्होंने काफी संघर्ष देखा... मात्र 16 साल की उम्र में अपने परिवार के खिलाफ जाकर गणपतराव भोसले से विवाह करना और फिर तीन बच्चों के साथ उस रिश्ते से बाहर निकलकर अकेले अपनी पहचान बनाना, उनके अदम्य साहस को दर्शाता है। यही संघर्ष उनकी गायकी में एक ‘धार’ बनकर उभरा।
चुनिंदा और कालजयी गीत
आशाजी के गीतों की सूची अंतहीन है, लेकिन कुछ गीत उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह परिभाषित करते हैं।
‘इन आंखों की मस्ती के...’ (उमराव जान) : उनकी गायकी की क्लासिकल गहराई।
‘दम मारो दम...’ (हरे रामा हरे कृष्णा) : आधुनिक और विद्रोही स्वर।
‘पिया तू अब तो आजा...’ (कारवां) : कैबरे और एनर्जी का चरम।
‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को...’ (यादों की बारात) : रूमानी एहसास।
‘मेरा कुछ सामान...’ (इजाजत) : कविता को सुरों में पिरोने का हुनर।
आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया कि यदि आपमें अपनी अलग पहचान बनाने की जिद हो, तो दुनिया की कोई भी छाया आपकी रोशनी को कम नहीं कर सकती।
विविधता का दूसरा नाम
आशा भोसले की सबसे बड़ी खूबी उनकी अनुकूलन क्षमता है। जहां लताजी की आवाज में एक दिव्य शुद्धता और ठहराव था, वहीं आशाजी की आवाज में एक ‘अदा’ और ‘खनक’ थी, जो सीधे सुनने वाले के दिल पर दस्तक देती थी।
उनके गायन की ये खासियतें थीं...
आवाज का लचीलापन : वे एक ही दिन में भजन और क्लब सांग शिद्दत से गा सकती थीं।
वेस्टर्न टच : ओपी नैयर और आरडी बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर उन्होंने भारतीय संगीत में जैज, पॉप और रॉक एंड रोल का तड़का लगाया।
सांसों पर नियंत्रण : उनकी आवाज में ‘लो-पिच’ (धीमी आवाज) और ‘ब्रीथी वोकल्स’ की जो जादूगरी थी, वह उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी गायिकाओं की कतार में खड़ा करती है।
इतनी प्रसिद्ध क्यों हुईं?
आशाजी की लोकप्रियता का राज उनका बदलाव को स्वीकार करना था। उन्होंने खुद को कभी एक सांचे में नहीं बांधा। जब उन्होंने गजलें गाईं (उमराव जान), तो सुनने वाले दंग रह गए कि ‘दम मारो दम’ गाने वाली आवाज इतनी नफासत कैसे ला सकती है।
उन्होंने रिकॉर्ड विभिन्न भाषाओं में हजारों गाने गाए हैं, जो उनके अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण का प्रमाण है।
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