13 साल बाद पटवारी परीक्षा फर्जीवाड़ा केस में फैसला: सबूतों के अभाव में आरोपी बरी; 2012 में दर्ज हुई थी एफआईआर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश के इंदौर में 2008 की पटवारी चयन परीक्षा से जुड़े कथित फर्जीवाड़े के मामले में लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। करीब 13 साल तक चले इस प्रकरण में जिला न्यायालय ने आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट ने विजयनगर निवासी महेश मकवाना को धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में “संदेह का लाभ” देते हुए दोषमुक्त घोषित किया।
2008 में चयन, बाद में उठे दस्तावेजों पर सवाल
अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2008 में व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा आयोजित पटवारी चयन परीक्षा में महेश मकवाना का चयन हुआ था। चयन के बाद उन्हें प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। हालांकि बाद में जांच के दौरान उनके द्वारा प्रस्तुत उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय की बीसीए मार्कशीट को संदिग्ध और कथित रूप से फर्जी पाया गया, जिसके आधार पर कार्रवाई शुरू की गई।
2010 में शिकायत, 2012 में दर्ज हुई FIR
मामले की शुरुआत कलेक्टर कार्यालय की भू-अभिलेख शाखा से हुई, जहां से 1 दिसंबर 2010 को शिकायत भेजी गई। इसके बाद 1 फरवरी 2012 को रावजी बाजार थाना में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद जून 2013 में पुलिस ने चालान पेश कर मामला अदालत में भेज दिया।
कोर्ट में कमजोर पड़ा अभियोजन पक्ष
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी ने वास्तव में फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे या उनका उपयोग किया था। आरोपी की ओर से अधिवक्ता ललित काला ने पैरवी करते हुए तर्क दिया कि प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त और ठोस नहीं हैं। अदालत ने भी इस बात को माना कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
संदेह का लाभ देकर किया दोषमुक्त
लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके हैं। ऐसे में न्यायालय ने आरोपी को “संदेह का लाभ” देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आया निष्कर्ष
करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में फैसले ने यह स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में सजा के लिए ठोस और निर्विवाद साक्ष्य होना जरूरी है।
न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल और सबक
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि और जांच की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी बताता है कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना संभव नहीं है। इस फैसले के साथ ही 2008 से शुरू हुआ यह मामला आखिरकार अपने निष्कर्ष पर पहुंच गया।
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