गांवों से दिल्ली तक आंदोलनों की एक जैसी तस्वीर दिखी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सोमवार का दिन देश में लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक तस्वीर लेकर आया। मालवा-निमाड़ के गांवों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक दो अलग-अलग आंदोलनों में एक जैसी तस्वीर दिखाई दी।
पहले प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक रोका गया, फिर देर रात बातचीत और आश्वासन का दौर शुरू हुआ। दिल्ली में युवाओं, विद्यार्थियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने जंतर-मंतर से संसद तक शांतिपूर्ण मार्च निकाला।
प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि सरकार उनकी बात सुने और संवाद करे, लेकिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज व आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इसके बाद कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेते हुए मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
लगभग इसी समय इंदौर में भी ग्रेटर पश्चिम रिंग रोड परियोजना से प्रभावित 39 गांवों के किसान करणी सेना परिवार के नेतृत्व में भोपाल के लिए ट्रैक्टर रैली लेकर निकले।
पुलिस ने उन्हें शहर की सीमा पर ही रोक दिया। हालात तनावपूर्ण हो गए और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वाटर कैनन तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। कुछ किसानों को हिरासत में भी लिया।
इसके बाद किसान धरने पर बैठ गए। देर रात प्रशासन, पुलिस और किसान प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई। प्रशासन ने मुख्यमंत्री से चर्चा का हवाला देते हुए आश्वासन दिया कि आर्बिट्रेशन में मुआवजा राशि बढ़ाई जाएगी, जिससे किसानों को लगभग चार गुना तक मुआवजा मिल सकेगा।
अन्य मांगों पर भी सकारात्मक कार्रवाई का भरोसा दिया गया। इसके बाद करणी सेना के प्रमुख जीवन सिंह, ऋषिराज सिंह, किसान नेता अनिल व्यास तथा प्रशासनिक अधिकारियों के बीच लिखित सहमति की प्रक्रिया पूरी हुई और आंदोलन फिलहाल स्थगित कर दिया गया।
यह घटनाक्रम एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि किसानों की मांगों पर अंततः बातचीत और आश्वासन देना ही था, तो क्या यह संवाद पहले नहीं हो सकता था? क्या टकराव, आंसू गैस और बल प्रयोग के बाद ही बातचीत का रास्ता खुलेगा?
भूमि अधिग्रहण, किसानों के मुआवजे और युवाओं की मांगों जैसे मुद्दे केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के विषय हैं। सरकार और प्रशासन यदि समय रहते संवाद की पहल करें, तो कई टकराव टाले जा सकते हैं।
इंदौर का आंदोलन स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं
किसान नेताओं ने स्पष्ट किया है कि यदि तय समय में आश्वासनों पर अमल नहीं हुआ, तो आंदोलन फिर शुरू होगा। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि प्रशासन अपने वादों पर कितनी गंभीरता से अमल करता है और क्या भविष्य में संवाद टकराव से पहले शुरू होगा।
डीएम और एडीएम के बीच उलझती रही बातचीत
करणी सेना का आंदोलन रात तक चलता रहा। शाम को प्रशासन ने बातचीत की पहल शुरू की। पहले एडीएम रोशन राय को भेजा, लेकिन आंदोलनकारियों की मांग थी कि बात कलेक्टर से ही होगी, क्योंकि निर्णय उन्हें ही लेना है।
प्रशासन की ओर से बताया गया कि कलेक्टर बातचीत के लिए नहीं आ सकेंगे। इस पर आक्रोशित आंदोलनकारी धरने पर बैठे रहे। किसानों का कहना था कि सीधे मुख्यमंत्री से बातचीत करवाएं या विधायक से या फिर आईएएस अधिकारी से ही बातचीत करेंगे।
इस पर देर रात एडीएम आईएएस अधिकारी नवजीवन पवार को बातचीत करने के लिए भेजा गया। किसान भी पवार से बात करना चाहते थे, क्योंकि उनके अधिकार क्षेत्र में ही भूमि अधिग्रहण क्षेत्र की तहसील आती है। धरनास्थल से ही कलेक्टर शिवम वर्मा से बातचीत करवाई गई।
कलेक्टर का कहना था कि चार गुना मुआवजा सीधे तौर पर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि अवॉर्ड पहले हो चुका है, इसलिए आर्बिट्रेशन में मुआवजा राशि बढ़ाकर 4 गुना तक मुआवजा दिया जा सके ऐसे प्रयास किए जाएंगे।
इस आश्वासन पर आंदोलन स्थगित कर धरना समाप्त कर दिया गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि नवजीवन पवार अनुभवी अधिकारी हैं और वह किसानों की पीड़ा को बेहतर ढंग से समझते हैं।
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