190 पदोन्नत एसडीएम नहीं कर सकेंगे राजस्व के फैसले: भर्ती नियम 1961 के अनुसार दो साल परिवीक्षा अवधि व ट्रेनिंग अनिवार्य
KHULASA FIRST
संवाददाता

• मुख्यमंत्री के गृह जिले में मात्र दो एसडीएम पात्र
शरद गुप्ता 96177-77331 खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
सामान्य प्रशासन विभाग की उप सचिव (कार्मिक) अर्चना सोलंकी द्वारा 7 जुलाई को जारी आदेश क्रमांक 1/1/3/0015/2026-GAD-2-1 के परिपेक्ष्य में शासन ने भर्ती एवं सेवा नियम 1961 का हवाला देते हुए 190 तहसीलदार रैंक /प्रभारी डिप्टी कलेक्टर को डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदोन्नति का आदेश जारी किया है।
प्रदेश के भर्ती नियम 1961 में प्रावधान है तहसीलदार/ प्रभारी डिप्टी कलेक्टर से पदोन्नत होकर डिप्टी कलेक्टर बने अफसर राजस्व न्यायालय के रूप में स्वतंत्र आदेश पारित नहीं कर सकेंगे, पर राज्य लोकसेवा आयोग से सीधे चयनित डिप्टी कलेक्टर नियमानुसार ऐसे दायित्व निभाने के पात्र होंगे।
इस व्यवस्था ने प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। सवाल है एक ही पद पर कार्यरत दो अधिकारियों के अधिकार अलग-अलग क्यों ? हास्यापद है मुख्यमंत्री के गृह जिले के 6 अनुभाग में मात्र 2 ही एसडीएम खाचरौद की नेहा साहू और उज्जैन की बोयल पीएससी से चयनित हैं।
इन दोनों को छोड़कर अन्य चार पदोन्नत एसडीएम दो साल तक परिवीक्षा अवधि में रहेंगे, परीक्षा देंगे, पास हुए, तभी राजस्व मामलों से जुड़े प्रकरणों में आदेश जारी कर पाएंगे । अगर उन्होंने 7 जुलाई 2026 से पहले प्रभारी डिप्टी कलेक्टर के रूप में अथवा इसके बाद 2 साल की अवधि में कोई राजस्व संबंधी आदेश जारी किया तो ऐसे आदेश का वैधानिक अस्तित्व नहीं होगा।
गौरतलब है 55 जिलों में फिलहाल 428 अनुभाग हैं। इसमें से 190 में तहसीलदार रैंक/प्रभारी डिप्टी कलेक्टर पदस्थ हैं। राज्य सरकार ने 7 जुलाई को इन्हें डिप्टी कलेक्टर के पद पर प्रमोट किया । लेकिन फिलहाल दो साल तक ये महज रबर स्टाम्प है ।
नागदा पर ज्यादा ज्यादा असर: इसका सबसे ज्यादा असर नागदा पर पड़ेगा, जहां कार्यवाहक डिप्टी कलेक्टर के रूप में लगभग 2 साल से पदस्थ रंजना पाटीदार ने 7 जुलाई के बाद राजस्व से जुड़े कई प्रकरणों को सुना है।
मध्य प्रदेश भर्ती नियम 1961 के अनुसार 7 जुलाई 2026 के बाद रंजना पाटीदार सहित पदोन्नत 190 डिप्टी कलेक्टर को परिवीक्षा अवधि पूरी कर विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण करना होगी। प्रदेश के भर्ती एवं सेवा नियमों के तहत तहसीलदार से पदोन्नत डिप्टी कलेक्टरों को सीधे न्यायिक अधिकार नहीं दिए जाते।
जनता पर पड़ेगा असर: राजस्व न्यायालयों में लाखों प्रकरण लंबित हैं। ऐसे में नवपदोन्नत डिप्टी कलेक्टरों के न्यायिक अधिकार सीमित रहने से नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन और अपील जैसे मामलों के निस्तारण की गति प्रभावित हो सकती है।
दो साल का प्रशिक्षण, फिर विभागीय परीक्षा
जानकारी के अनुसार, तहसीलदार से पदोन्नत डिप्टी कलेक्टरों को पहले दो वर्ष का संस्थागत एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण पूरा करना होगा। इसके बाद शासन द्वारा निर्धारित विभागीय परीक्षा/राजस्व न्यायालय संबंधी दक्षता परीक्षा उत्तीर्ण करने पर ही उन्हें राजस्व न्यायालय के रूप में स्वतंत्र रूप से आदेश पारित करने का अधिकार मिलेगा।
जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक वे प्रशासनिक दायित्व निभाएंगे, लेकिन नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, राजस्व अपील और अन्य न्यायिक प्रकरणों में अंतिम आदेश जारी नहीं कर सकेंगे।
सीधी भर्ती वालों को अधिकार: दूसरी ओर सीधे चयनित डिप्टी कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर कैडर के अधिकारी होते हैं। नियमानुसार प्रशिक्षण एवं परिवीक्षा अवधि के दौरान भी सक्षम प्राधिकारी उन्हें राजस्व एवं कार्यपालिक दायित्व सौंप सकता है। यानी वे पद के अनुरूप न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्य कर सकते हैं।
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