याचिका वापस लो: वरना जान से खत्म कर देंगे; आदिवासी याचिकाकर्ता पर जानलेवा हमला
KHULASA FIRST
संवाददाता

शराब माफिया का खूनी संदेश
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
धार–झाबुआ–आलीराजपुर मार्ग से गुजरात तक फैले अवैध शराब के नेटवर्क के खिलाफ आवाज उठाना आदिवासी युवक को भारी पड़ गया। जनहित याचिका दायर करने वाले मथिया भूरिया पर मंगलवार को झाबुआ में जानलेवा हमला कर दिया गया। हमलावरों ने साफ धमकी दी कि याचिका वापस नहीं ली तो मार देंगे। विरोध करने पर उसके सिर पर वार किया और दोनों हाथ तोड़ने की कोशिश की। गंभीर हालत में परिजन उपचार के लिए दाहोद ले गए।
मथिया भूरिया ने अधिवक्ता अनिल ओझा के माध्यम से इंदौर खंडपीठ में जनहित याचिका दायर कर रखी है। इसमें आरोप है कि धार, झाबुआ और आलीराजपुर रूट पर पकड़े जाने वाले शराब तस्करी के मामलों में केवल ड्राइवर, हेल्पर या क्लीनर पर कार्रवाई कीजाती है, जबकि सिंडिकेट संचालकों पर नहीं।
पिछली सुनवाई के बाद बढ़ीं धमकियां
मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि पिछली सुनवाई के बाद से ही याचिकाकर्ता को अलग-अलग माध्यमों से धमकियां मिल रही थीं। मंगलवार को कुछ बदमाशों ने उसे रास्ते में रोककर गालियां दीं और याचिका वापस लेने का दबाव बनाया। मना करने पर उसके सिर पर किसी हथियार से वार किया गया। हाथ-पैरों पर लाठी और हॉकी से प्रहार किए गए। मथिया के अचेत होने के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए।
सवालों के घेरे में तंत्र
घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। सवाल उठ रहे हैं कि अवैध शराब के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सुरक्षा क्यों नहीं मिल रही?, क्या तस्करी का जाल इतना मजबूत है कि न्यायालय में गुहार लगाने वाले को भी नहीं बख्शा जा रहा? याचिका में यह भी उल्लेख है कि इस रूट पर पकड़ी जाने वाली शराब की खेपों में बड़े नाम सामने नहीं आते। कार्रवाई निचले स्तर पर सिमट जाती है और कथित सरगना बच निकलते हैं। यही मुद्दा हाईकोर्ट में उठाया गया है।
जनता में आक्रोश, सख्त कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों में आक्रोश है। मांग की जा रही है कि हमलावरों को तत्काल गिरफ्तार कर सख्त धाराओं में कार्रवाई की जाए और याचिकाकर्ता को सुरक्षा दी जाए। अवैध शराब के खिलाफ लड़ाई अब सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि हिम्मत और सुरक्षा की भी बनती दिख रही है। 25 फरवरी की सुनवाई से पहले हुआ यह हमला कई बड़े सवाल खड़े कर गया है। क्या माफिया का खौफ न्याय की राह रोक पाएगा या अदालत की सख्ती से सिंडिकेट का चेहरा बेनकाब होगा?
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