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आसान नहीं खेती-किसानी की डगर: ब्रिक्स देशों का लोकलुभावन घोषणा-पत्र; अमल बेहद चुनौतीपूर्ण

KHULASA FIRST

संवाददाता

14 जून 2026, 1:00 pm
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आसान नहीं खेती-किसानी की डगर

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘ब्रिक्स घोषणा-पत्र इंदौर’ का वास्तविक महत्व इसमें है कि उसने पहली बार ब्रिक्स स्तर पर देसी बीज, प्राकृतिक खेती, छोटे किसानों, महिलाओं और कृषि-जलवायु लचीलेपन को एक साझा वैश्विक एजेंडे के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।

सफलता इस पर निर्भर करेगी कि घोषणा खेतों तक पहुंचती है या नहीं। यदि भारत सरकार गंभीर है, तो उसे सबसे पहले अपने देश में इस घोषणा-पत्र को मूर्त रूप में लाने की कसरत अविलंब शुरू करना चाहिए। ऐसा होता है, तो भारत का मॉडल अन्य सदस्य देशों के लिए अनुकरणीय हो सकता है

यह कागजों पर जितना आसान है वास्तव में उतना ही मुश्किल और चुनौतीपूर्ण इसका क्रियान्वयन है। इसके लिए सभी सदस्य देशों को मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा।

वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में यह घोषणा-पत्र बहुत ज्यादा मायने रखता है, बशर्तें प्रमुख सदस्य देश इसे गंभीरता से ले। इसमें किसानों को स्वावलंबी बनाने के लिए प्राकृतिक कृषि और इसका आधार देसी बीज बैंक को बढ़ावा देना है, जो बेहद बड़ी चुनौती है, क्योंकि दुनिया के ताकतवर देश अमेरिका और यूरोपीय संघ वैश्विक बीज़ और कृषि रसायनों के व्यापार में प्रभुत्व कायम कर चुके हैं, इसलिए बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग सबसे संवेदनशील विषय है।

देशी बीज संरक्षण की बात सीधे वैश्विक बीज उद्योग की व्यावसायिक संरचना को चुनौती देती है। कई बड़ी कंपनियां पेटेंट, हाईब्रिड बीज और बौद्धिक संपदा अधिकारों से बीज बाजार पर प्रभाव रखती हैं। यदि ब्रिक्स वास्तव में किसानों के बीज अधिकारों को मजबूत करता है तो यह वैश्विक बीज व्यापार की वर्तमान व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।

साझा कृषि अनुसंधान कोष... घोषणाओं से अधिक महत्वपूर्ण वित्त है। यदि सदस्य देश संयुक्त फंड बनाते हैं तो जलवायु अनुसंधान, बीज संरक्षण, एआई आधारित कृषि, प्राकृतिक खेती पर वास्तविक कार्य हो सकेगा।

किसानों के स्तर तक साझेदारी अभी अधिकांश ब्रिक्स सहयोग सरकारों के बीच में है अलग-अलग देश किस तरह से अपनी नीतियां सभी देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाएंगे, यह बड़ी चुनौती है।

क्रियान्वयन की प्रमुख चुनौती कृषि संरचनाओं में भारी असमानता...इंडिया, चाइना, ब्राजिल, रूस और साउथ अफ्रीका की कृषि परिस्थितियां एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं।

ब्राजील में विशाल एग्रीबिजनेस फार्म हैं। रूस और चीन की कृषि तकनीक तथा सरकारी निवेश का स्तर अलग है। अफ्रीकी देशों में बुनियादी कृषि अवसंरचना की कमी है। ऐसे में एक समान नीति बनाना आसान है, लेकिन उसका समान क्रियान्वयन कठिन होगा।

राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतरता... घोषणाएं अक्सर सरकारों के बदलने या प्राथमिकताएं बदलने पर कमजोर पड़ जाती हैं। नेटवर्क बनाना आसान है, संयुक्त रिसर्च शुरू करना कठिन। वर्षों तक वित्तपोषित रखना उससे भी कठिन है।

कृषि व्यापार में राष्ट्रीय हितों का टकराव सभी देश कृषि निर्यात बढ़ाना चाहते हैं। उदाहरण के लिए ब्राजील सोयाबीन और मांस निर्यात बढ़ाना चाहता है। भारत चावल, गेहूं और मसालों का बाजार चाहता है। रूस उर्वरक और अनाज निर्यातक है। चीन खाद्य आयातक होने के बावजूद अपने किसानों की सुरक्षा चाहता है इसलिए "साझा व्यापार नीति" बनाना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण रहेगा।

डिजिटल एग्रीकल्चर में डेटा संप्रभुता...आईआईटी दिल्ली के नेतृत्व वाले डिजिटल कृषि नेटवर्क में एक बड़ा प्रश्न डाटा स्वामित्व का होगा। किसका होगा? यह विवाद का विषय हो सकता है किसान डेटा का स्वामित्व बड़े सदस्य देश अपने पास रखना चाहेंगे ?

इसके साथ यह सवाल भी खड़ा होगा एआई मॉडल किस देश के नियंत्रण में होंगे? डेटा आज नया भू-राजनीतिक संसाधन बन चुका है। देशी बीज बनाम बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग बेहद संवेदनशील विषय है भारत इसका उदाहरण है।

इसी तरह पशुपालन के क्षेत्र में भी देसी नस्ल के पशुओं के समृद्ध जेनेटिक मैटेरियल पर ताकतवर देश अपना पेटेंट कर चुके हैं और इसका बड़ा व्यापार भारत में फैल चुका है देशी बीज संरक्षण की बात सीधे वैश्विक बीज उद्योग की व्यावसायिक संरचना को चुनौती देती है।

कई बड़ी कंपनियां पेटेंट, हाइब्रिड बीज और बौद्धिक संपदा अधिकारों से बीज बाजार पर प्रभाव रखती हैं। अकेले भारत के बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का लगभग 58% हिस्से पर प्रभुत्व है और आने वाले वर्षों में और ज्यादा होगा। भारतीय खेती में प्रयोग होने वाले पेस्टिसाइडिंग सेफ्टी साइड आदि जैसे रसायन ऑन का व्यापार भी अरबों का है इसे नियंत्रित करना आसान नहीं।

अमल के लिए करना होंगे नीतिगत बदलाव
घोषणा-पत्र क्रियान्वयन के लिए कई बड़े नीतिगत बदलाव करने होंगे इसके लिए किसान संगठनों का नेटवर्क, महिला किसान मंच, युवा कृषि उद्यमी मंच, सहकारी संस्थाओं का सहयोग लेना होगा।

सदस्य देशों के बीच जेनेटिक एक्सचेंज प्रोग्राम का प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो सदस्य देश खाद्यान्न भंडारण, आपातकालीन अनाज आपूर्ति, मूल्य स्थिरीकरण में सहयोग कर सकते हैं।

यह वैश्विक खाद्य संकट के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यद ब्रिक्स किसानों के बीज अधिकारों को मजबूत करता है तो यह वैश्विक बीज व्यापार की वर्तमान व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।

जहां तक खेती की तरफ युवाओं और महिलाओं को आकर्षित करने का विषय है भारत में यह बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुका है। किसान लगातार खेती से दूर हो रहे हैं। युवा भी विमुख हो रहे हैं। तथाकथित आधुनिक कृषि इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदार है।

इसके साथ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए कृषि भूमियों का अधिग्रहण और प्राकृतिक संसाधनों का और नियंत्रित दोहन जिस तरह से हो रहा है इस कारण खेती पर सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

भारत सदस्य देशों से अपेक्षा कर रहा है युवाओं को कृषि टेक्नोलॉजी की तरफ आकर्षित किया जाए। इसके परिणाम अनुकूल हो सकते हैं बशर्तें पूरी ताकत के साथ काम खड़ा किया जाए।

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