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मेहमान की रक्षा न कर पाने के बाद क्या भारत चेतेगा: आखिरकार हिंद महासागर आ पहुंची अमेरिकी दादागीरी

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संवाददाता

05 मार्च 2026, 4:00 pm
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मेहमान की रक्षा न कर पाने के बाद क्या भारत चेतेगा

आलोक बाजपेयी स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अमेरिका ने एकतरफा दादागीरी और उसकी वैश्विक पहुंच का प्रदर्शन करने के लिए 4 मार्च 2026 को हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी से डुबो दिया। यह हमला टॉरपीडो से हुआ और घटना का ऐतिहासिक महत्व सगर्व बताते हुए अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने पुष्टि की है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी दुश्मन देश के जहाज को टॉरपीडो से डुबोने की यह पहली घटना है।

यह हमला श्रीलंका के दक्षिणी तट- गाले से लगभग 40 समुद्री मील (75 किमी) दूर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुआ। यह क्षेत्र भारतीय समुद्री सीमा के निकट हिंद महासागर क्षेत्र का हिस्सा है। IRIS Dena एक ‘मौज-श्रेणी’ का गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट था।

भारत के लिए सबसे ज़्यादा चिंता, चेतावनी और शर्मिंदगी का विषय यह है कि यह जहाज हाल ही में विशाखापत्तनम में आयोजित भारत के MILAN 2026 नौसैनिक अभ्यास में भाग लेकर वापस लौट रहा था।

जहाज पर चालक दल के लगभग 180 सदस्य सवार थे। अब तक 32 घायल नाविकों को श्रीलंका की नौसेना द्वारा बचाया गया है और उन्हें गाले के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लगभग 140 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं और श्रीलंका की नौसेना तथा वायुसेना बचाव अभियान चला रही हैं।

इस घटना ने वैश्विक स्तर पर भारी तनाव पैदा कर दिया है और भारत के लिए यह सबसे बड़ी चिंता का विषय है। क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से देखें तो हिंद महासागर, जो अब तक व्यापार के लिए तुलनात्मक रूप से शांत था, अब एक ‹वॉर ज़ोन› की तरह देखा जा रहा है। भारत के इतने करीब ऐसी घटना होने से समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

ईरान ने इसे ‘कायराना हमला’ बताया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि वह जवाबी कार्रवाई के रूप में हॉर्मुज जलडमरू मध्य को बंद कर सकता है, जहां से दुनिया का एक बड़ा तेल व्यापार होता है। भारत के लिए यह स्थिति बहुत नाजुक है। एक तरफ अमेरिका के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ रणनीतिक रिश्ते (जैसे चाबहार पोर्ट)।

भारत ने शांति की अपील की है, क्योंकि तेल की कीमतों में उछाल और व्यापार मार्ग में रुकावट भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है। इस हमले की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने की आशंका भी है जिसका असर भारत के व्यापार और तेल की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है? भारत पर इसके प्रभाव कई स्तरों पर पड़ सकते हैं- रणनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक।

भारत के लिए गहन चिंता का विषय क्यों? IRIS Dena के डूबने की घटना भारतीय समुद्री सीमा के भीतर नहीं, बल्कि उसके निकट अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई है। इसका सटीक स्थानश्रीलंका के दक्षिणी शहर गाले के तट से लगभग 40 समुद्री मील (करीब 74-75 किमी) दूर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुआ।

यह स्थान भारत के सबसे दक्षिणी छोर (कन्याकुमारी) से लगभग 350 से 400 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की दिशा में है। यह भारत की मुख्य प्रादेशिक समुद्री सीमा तट से बाहर है। यह विशेष आर्थिक क्षेत्र (200 समुद्री मील) के भीतर नहीं है। लेकिन विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह भारत के ‘प्राथमिक समुद्री पिछवाड़े’ में एक बड़ा सैन्य हस्तक्षेप है।

भले ही यह घटना तकनीकी रूप से भारतीय सीमा में नहीं हुई, लेकिन यह भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह जहाज विशाखापत्तनम में भारत के MILAN 2026 अभ्यास से लौट रहा था। यह हमला उन प्रमुख व्यापारिक रास्तों के पास हुआ है जहाँ से भारत का अधिकांश तेल और मालवाहक जहाज गुजरते हैं।

इसे भारत के लिए बेइज्जती का मामला न भी मानें तो एक गंभीर रणनीतिक चिंता और कूटनीतिक चुनौती का विषय है। इस घटना ने भारत के लिए कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति जरूर उत्पन्न कर दी है।

भारत की प्रतिष्ठा कैसे आहत हुई ? भारत खुद को हिंद महासागर का Net Security Provider मानता है। नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर का अर्थ है, किसी क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली मुख्य शक्ति, जो अपनी और अपने पड़ोसी देशों की सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करती है। भू-राजनीति में यह भारत जैसे राष्ट्रों को संदर्भित करता है जो हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती, आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी ताकत (US) ने भारत के दरवाजे पर आकर एक युद्धपोत डुबो दिया, और भारत इसे रोक नहीं पाया। यह भारत की निगरानी और निरोधक क्षमता के लिए चिंता का विषय है। यह भारत के अतिथि पर हमला है, क्योंकि IRIS Dena भारत के निमंत्रण पर MILAN 2026 अभ्यास में आया था।

इसका उद्देश्य महासागरों के माध्यम से एकता था। किसी देश के मेहमान जहाज को उसके घर लौटते वक्त निशाना बनाना, भारत की मेज़बानी और क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। भले ही कहें कि इस हमले का लक्ष्य ईरान था, भारत नहीं, जैसा कि पेंटागन ने कहा है अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान की नौसेना को खत्म करना था।

यह हमला भारत के खिलाफ नहीं था, लेकिन यह भारत के रणनीतिक बैकयार्ड में हुआ, जो भारत की संप्रभुता का अपमान भले न हो, लेकिन उसकी समुद्री सुरक्षा के दावे को चुनौती देता है। यह सीधे-सीधे भारत की समुद्री डोमेन अवेयरनेस और निगरानी क्षमता पर प्रश्नचिह्न है।

दादागीरी दिखाने के लिए अमेरिका ने किया युद्ध का विस्तार: अब तक पश्चिम एशिया का संघर्ष भारत से दूर था, लेकिन इस हमले ने हिंद महासागर को भी एक युद्ध क्षेत्र बना दिया है। अमेरिका का संदेश स्पष्ट है। अमेरिका ने यह हमला करके दिखाया है कि जब बात उसके दुश्मन (ईरान) की हो, तो वह भारत जैसी मित्र शक्ति के क्षेत्रीय प्रभाव या कूटनीतिक संवेदनशीलता की परवाह नहीं करेगा।

भारत के लिए एक स्पष्ट चेतावनी का वेक-अप कॉल है। यह भारत को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हिंद महासागर में उसकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह सोचता था और अमेरिका अपने हितों के लिए भारतीय जलक्षेत्र के पास भी अस्थिरता पैदा करने से नहीं हिचकिचाएगा।

भारत की रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा पर प्रभाव: हिंद महासागर क्षेत्र पहले से ही अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का केंद्र है। यहाँ समुद्री संतुलन के लिए भारत पर अपनी नौसैनिक निगरानी और समुद्री डोमेन अवेयरनेस बढ़ाने का दबाव होगा। अंडमान-निकोबार कमांड और पश्चिमी नौसेना कमान की गतिविधियां तेज करनी पड़ सकती हैं।

भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चलता आया है। लेकिन अमेरिका ने कार्रवाई भारतीय सीमा के अत्यंत निकट की है, तो भारत के सामने दो विकल्प हैं- सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देना या चुप रहना- दोनों का अलग संदेश जाएगा। भारत को यह तय करना होगा कि अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई को मौन समर्थन देता है या तटस्थ रहता है।यह OpEd लिखे जाने तक भारत सरकार ने IRIS Dena के डूबने पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है जिसमें उसने सीधे-सीधे जांच, आरोप, या निंदा का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया हो।

हिंद महासागर: अगला भू-राजनीतिक ‘हॉट ज़ोन’? बीते दशक में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति और क्षेत्रीय गठबंधनों ने हिंद महासागर को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना दिया है। यदि अब यहाँ प्रत्यक्ष सैन्य टकराव होने लगें, तो यह क्षेत्र स्थायी अस्थिरता का शिकार हो सकता है। भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत जटिल है। भारत की अर्थव्यवस्था पहले ही वैश्विक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे में हिंद महासागर में सैन्य तनाव का विस्तार दीर्घकालिक आर्थिक अनिश्चितता पैदा कर सकता है।

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