भोजशाला किसकी: हिंदू, मुस्लिम या जैन समाज की; हाई कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हाई कोर्ट में बहुचर्चित भोजशाला प्रकरण की सुनवाई मंगलवार को पूरी हो गई। करीब दो घंटे से अधिक चली अंतिम सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम पक्षों के साथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने भी अपने तर्क रखे।
सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला रिजर्व फॉर ऑर्डर कर लिया। अब पूरे देश की नजर इस पर टिकी है अदालत भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर क्या निर्णय देती है।
मामला वर्ष 2022 में तब शुरू हुआ था, जब हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से रंजना अग्निहोत्री और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर बताते हुए हिंदू समाज को पूजा का पूर्ण अधिकार देने की मांग की थी।
इसके साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई। वर्ष 2024 में एएसआई ने भोजशाला परिसर का 98 दिन वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। इसी साल 23 जनवरी को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। 6 अप्रैल से हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 12 मई तक चली।
हिंदू पक्ष ने पेश किए मंदिर होने के सबूत
6 से 9 अप्रैल तक हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और विद्या केंद्र था।
हिंदू पक्ष ने एएसआई सर्वेक्षण, ऐतिहासिक दस्तावेज, प्राचीन शिलालेख, स्तंभ, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक और स्थापत्य अवशेष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि ब्रिटिश गजेटियर और इतिहासकारों के अभिलेखों में भी भोजशाला को सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है।
परिसर में संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मिले हैं तथा लंबे समय से वसंत पंचमी सहित कई अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना होती रही है। हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने स्थापत्य संबंधी तकनीकी तर्क रखते हुए परमार राजा भोज के ग्रंथ समरांगण सूत्रधार का उल्लेख किया।
कहा ग्रंथ में मंदिर निर्माण के लिए जो अनुपात बताए गए हैं, भोजशाला की संरचना उनसे मेल खाती है। ग्रंथ के अनुसार चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 4:6 होना चाहिए, जबकि एएसआई सर्वे रिपोर्ट में भोजशाला की चौड़ाई 38.41 मीटर और लंबाई 57.45 मीटर दर्ज है, जो लगभग उसी अनुपात में है।
परिसर में मिले हवन कुंड और सर्पबंदी शैली के अलंकरणों को भी परमारकालीन मंदिर स्थापत्य से जुड़ा बताया गया।
मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट और प्रक्रिया पर उठाए सवाल
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पक्ष रखा, जबकि अधिवक्ता तौसिफ वारसी अदालत में मौजूद रहे।
मुस्लिम पक्ष ने एएसआई सर्वे रिपोर्ट और सर्वे प्रक्रिया दोनों पर सवाल उठाए। सलमान खुर्शीद ने कहा सर्वे के दौरान उपलब्ध कराई गई वीडियोग्राफी और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं तथा रंगीन फोटो भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
अयोध्या मामले में रामलला विराजमान की मूर्ति मौजूद थी, जबकि भोजशाला में ऐसी कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। सर्वे की औपचारिक सूचना मुस्लिम पक्ष को नहीं दी गई और जानकारी सोशल मीडिया से मिली।
मुस्लिम पक्ष का कहना था परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और यह व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से बनी थी।
मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया किसी विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि वर्तमान मामला संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में दायर रिट याचिका के रूप में चल रहा है।
याचिकाकर्ताओं द्वारा जनहित याचिका में स्वयं को समाजसेवी बताना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। याचिकाकर्ताओं ने हिंदू समाज को नियमित पूजा-अर्चना का अधिकार देने, परिसर में नमाज पर रोक, भोजशाला प्रबंधन के लिए ट्रस्ट गठित करने तथा ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाकर भोजशाला में स्थापित करने की मांग की है।
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