श्रीराम मंदिर के मालिक कौन: 68 साल पुराने विवाद पर हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला; राजस्व विभाग संभालेगा प्रबंधन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर से जुड़े करीब 68 साल पुराने विवाद पर मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति विनय सराफ की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए अपील को आंशिक रूप से मंजूर किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर और उससे जुड़ी चल-अचल संपत्तियों के वास्तविक स्वामी स्वयं भगवान श्रीराम हैं।
फैसले में मंदिर का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रखने की बात कही गई है। वहीं, मंदिर में पुजारी की नियुक्ति का अधिकार औकाफ विभाग का माना गया है। अदालत ने रतनदास के मंदिर के पुजारी रहने के दावे को भी स्वीकार किया है।
1954 में शुरू हुआ विवाद, 1968 में हाईकोर्ट पहुंचा
मामले की शुरुआत वर्ष 1954 में हुई थी। रतनदास ने खाचरौद स्थित श्रीराम मंदिर के प्रबंधन और पूजा-अर्चना से जुड़े अधिकारों को लेकर सिविल वाद दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1968 में वाद खारिज कर दिया। इसके बाद 3 अक्टूबर 1968 को प्रथम अपील क्रमांक 59/1968 हाईकोर्ट में दाखिल की गई।
करीब छह दशक तक लंबित रहने के बाद इस मामले पर 25 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
1930 में औकाफ विभाग ने संभाला था मंदिर का प्रबंधन
रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद बढ़ने के बाद महंत मुरलीदास ने वर्ष 1930 में औकाफ विभाग से मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों को संरक्षण में लेने का अनुरोध किया था। इसके बाद 15 अक्टूबर 1930 को औकाफ विभाग ने मंदिर का प्रबंधन अपने अधीन ले लिया और मुरलीदास को पुजारी नियुक्त किया।
मुरलीदास की मृत्यु के बाद रतनदास ने स्वयं को उनका उत्तराधिकारी बताते हुए मंदिर के अधिकारों पर दावा किया। रिकॉर्ड में रामानंद संप्रदाय के साधुओं द्वारा भेख समारोह के माध्यम से रतनदास को महंत की गद्दी के लिए नामित किए जाने का उल्लेख भी सामने आया।
मंदिर और संपत्तियों के मालिक देवता
हाईकोर्ट ने मंदिर को प्राचीन धार्मिक स्थल माना है। मंदिर में श्रीराम, जानकीजी, लक्ष्मणजी, हनुमानजी, लक्ष्मीनारायणजी और गोपालजी की प्रतिमाएं विराजित हैं।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मंदिर के साथ उससे जुड़ी चल-अचल संपत्तियों का स्वामित्व किसी व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि मंदिर में विराजमान देवताओं का है। श्रीराम मंदिर, राममोहल्ला, खाचरौद का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रहेगा।
रतनदास को पुजारी के रूप में मान्यता
हाईकोर्ट ने रतनदास के उस दावे को स्वीकार किया कि वे मंदिर के पुजारी रहे हैं। अदालत ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर उनकी नियुक्ति तथा मंदिर का प्रभार सौंपे जाने की पुष्टि मानी।
ट्रायल कोर्ट ने रतनदास के पुजारी होने के दावे को पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं माना था, लेकिन हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को सही नहीं माना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रतनदास के पक्ष को स्वीकार किया।
हालांकि महेश्वरी समाज के सदस्यों को अदालत ने मंदिर का श्रद्धालु माना है, लेकिन उन्हें मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नए सिरे से हुई सुनवाई
इस विवाद में हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 10 जुलाई 1993 को रतनदास के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी 2020 को वर्ष 1993 के हाईकोर्ट फैसले को निरस्त करते हुए मामले को सभी मुद्दों पर नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया था।
इसके बाद हाईकोर्ट ने मंदिर की स्थापना, संपत्तियों के स्वामित्व, रतनदास की नियुक्ति, भेख समारोह, औकाफ विभाग की भूमिका और महेश्वरी समाज के अधिकारों समेत सभी प्रमुख बिंदुओं पर दोबारा सुनवाई की।
अब हाईकोर्ट के ताजा फैसले से छह दशक से अधिक समय से चले आ रहे इस विवाद में मंदिर के स्वामित्व और प्रबंधन को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो गई है।
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