कौन बोले: 'गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाने से कोई कानून नहीं रोकता': इसे अपराध नहीं माना जा सकता
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि 'गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है। चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है और न ही इसे अपराध माना जा सकता है।'
जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित जस्टिस जीपी सिंह चौथे मेमोरियल लेक्चर के दौरान की।
'सिर्फ विरोध करने पर छात्रों को जेल भेजा जा रहा'
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल के समय में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां छात्रों और युवाओं को केवल विरोध प्रदर्शन करने या अपनी राय व्यक्त करने के कारण जेल भेज दिया गया।
उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना और अपनी बात रखना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, जिसे अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।
महीनों तक जेल में रखना गंभीर सवाल
गंगा नदी पर नाव में इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने के मामले का जिक्र करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसे मामले में लोगों की गिरफ्तारी और उन्हें महीनों तक जेल में रखना गंभीर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने कहा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता। अगर केवल इसी वजह से लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा, तो यह चिंताजनक है।'
जमानत की शर्तों पर भी उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई मामलों में अदालतें जमानत देते समय ऐसी शर्तें लगा रही हैं, जो व्यवहारिक रूप से व्यक्ति की असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं।
उन्होंने कहा कि किसी आरोपी को सार्वजनिक सभाओं में शामिल होने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से रोकने जैसी शर्तें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को कमजोर करती हैं।
'क्या ऐसे मामले में गिरफ्तारी उचित है?'
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई कार्य कानून के तहत अपराध ही नहीं है, तो क्या केवल उसके आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है और महीनों तक जमानत से वंचित रखा जा सकता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि इस तरह के मामलों पर न्याय व्यवस्था को संवैधानिक मूल्यों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अनुरूप गंभीरता से विचार करना चाहिए।
'बुलडोजर जस्टिस' पर भी रखी राय
अपने व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें बिना विधिक प्रक्रिया के दंडात्मक कार्रवाई के रूप में अपनाए जाने वाले 'बुलडोजर जस्टिस' को असंवैधानिक माना गया था।
उन्होंने कहा कि यह फैसला स्वागत योग्य था, लेकिन उनकी राय में यह निर्णय दो वर्ष पहले आ जाना चाहिए था, ताकि नागरिकों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित हो पाती।
संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर दिया जोर
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और व्यक्तिगत आजादी जैसे संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण बेहद आवश्यक है। उन्होंने न्यायपालिका और सभी संस्थाओं से इन अधिकारों की रक्षा के प्रति संवेदनशील रहने की अपील की।
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