जहां नदियों की धारा के साथ मिलता है सुरक्षा बलों का हौसला: दुमैल का बर्फीला संगम
KHULASA FIRST
संवाददाता

शून्य डिग्री तापमान, 24 घंटे की मुस्तैदी: बालटाल के दुर्गम मुहाने पर वर्दीधारियों की अनकही दास्तान
जहां मिलती हैं अमरनाथ और सिंध की धाराएं: दुमैल पॉइंट पर प्रकृति के पहरेदारों की परीक्षा
पहाड़ों का सन्नाटा और मुस्तैद कदम: अमरनाथ यात्रा के सबसे संवेदनशील बेस का मानवीय चेहरा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
अमरनाथ यात्रा के सबसे कठिन और रोमांचक रास्तों में शुमार बालटाल मार्ग पर जब श्रद्धालुओं का हुजूम आगे बढ़ता है, तो ‘दुमैल’ नामक स्थान पर आकर अचानक हवाओं का रुख और पानी की आवाज बदल जाती है।
समुद्र तल से लगभग 9,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित दुमैल वह ऐतिहासिक और भौगोलिक मिलन बिंदु (संगम पॉइंट) है, जहां पवित्र अमरनाथ गुफा की तरफ से आने वाली बर्फीली ‘अमरनाथ धारा’ (अमरावती नदी) का विलय कलकल बहती ‘सिंध नदी’ में होता है।
यह केवल दो जलधाराओं का मिलन नहीं है, बल्कि यह इस दुर्गम घाटी का वह संवेदनशील मुहाना है जहां प्रकृति की निष्ठुरता और इंसानी जज्बे की सबसे बड़ी परीक्षा हर दिन होती है।
...जहां पल-पल बदलता है मौसम
भौगोलिक दृष्टि से दुमैल का यह इलाका बेहद संकरा, पथरीला और खतरनाक माना जाता है। एक तरफ आसमान छूती नंगी और कच्ची पहाड़ियां हैं, जहां से कभी भी भूस्खलन (लैंडस्लाइड) का खतरा बना रहता है, तो दूसरी तरफ नीचे उफनती हुई नदियों का बर्फीला प्रवाह है।
यात्रा के दिनों में यहां का तापमान अचानक गिरकर शून्य के करीब पहुंच जाता है। दोपहर में तेज धूप के बाद शाम होते ही बर्फीली हवाएं पूरी घाटी को अपनी चपेट में ले लेती हैं। इस दुर्गम भूगोल के कारण यहां ऑक्सीजन का स्तर भी सामान्य से कम रहता है, जिससे यहां रहने और काम करने की चुनौती दोगुनी हो जाती है।
दुमैल के इस रणनीतिक और भौगोलिक संगम पॉइंट पर तैनात भारतीय सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, जम्मू-कश्मीर पुलिस और आईटीबीपी के जवानों का दैनिक जीवन किसी कठिन साधना से कम नहीं है। एक जवान के दिन की शुरुआत तड़के 3 बजे, हाड़ कंपाने वाली ठंड के बीच होती है। जब देश सो रहा होता है या श्रद्धालु अपनी नींद पूरी कर रहे होते हैं, तब ये जवान अपनी भारी-भरकम किट और हथियारों के साथ पोजिशन ले चुके होते हैं।
मानसिक मजबूती की परीक्षा
इस संगम पॉइंट पर नदी के तेज बहाव और संकरे रास्तों के कारण यात्रियों के फिसलने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। जवान न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था संभालते हैं, बल्कि नदी के किनारे अस्थायी पुलों और रास्तों की निगरानी भी करते हैं।
मानवीय चेहरा
यहां तैनात सुरक्षा बल केवल पहरेदार नहीं हैं। किसी बुजुर्ग यात्री की सांस फूलने पर उसे तुरंत अपनी पीठ पर उठाना, किसी का पैर फिसलने पर नदी के तेज बहाव से उसे खींच निकालना और आधी रात को भूखे यात्रियों के लिए गर्म चाय-पानी का इंतजाम करना इनके दैनिक जीवन का हिस्सा है।
पहाड़ों के सन्नाटे और नदियों के शोर के बीच तैनात इन जवानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानसिक अलगाव से लड़ना है। इस दुर्गम घाटी में मोबाइल नेटवर्क अक्सर दगा दे जाता है। कई-कई दिनों तक जवानों की अपने परिवार से बात नहीं हो पाती।
जब नदी के पानी की आवाज बहुत तेज होती है, तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह शोर एकाकीपन को और बढ़ा रहा है, लेकिन जब सुबह किसी 60 साल के बुजुर्ग या बच्चे के चेहरे पर जवानों को देखकर सुरक्षा का भाव आता है, तो वे सारी थकान और घर की याद भूल जाते हैं।
प्रकृति और कर्तव्य का संगम
दुमैल का यह पॉइंट वास्तव में प्रकृति की भव्यता और मानवीय कर्तव्य का जीवंत उदाहरण है। जहां अमरनाथ धारा और सिंध नदी मिलकर आगे कश्मीर की वादियों को सींचने निकलती हैं, वहीं देश के कोने-कोने से आए सुरक्षा बलों के जवान आपसी तालमेल से एकता की एक नई इबारत लिखते हैं।
अमरनाथ यात्रा की सफलता के पीछे गुफा की भव्यता जितनी सच है, उतना ही बड़ा सच दुमैल के इस बर्फीले संगम पर तैनात उन गुमनाम नायकों का पसीना और समर्पण भी है।
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