आखिर कहां अटकी है भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्य प्रदेश भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि नए प्रदेश अध्यक्ष को जिम्मेदारी संभाले छह महीने से अधिक समय बीत चुका है। अगले महीने अप्रैल में प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक प्रस्तावित है।
लेकिन प्रदेश कार्यसमिति की अब तक घोषणा नहीं हो पाई है। पार्टी की परंपरा के अनुसार प्रदेश के हर जिले से करीब चार-पांच कार्यकर्ताओं को कार्यसमिति में स्थान दिया जाना है। इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं, सांसदों और विधायकों की नाराजगी से बचना भी प्रदेश नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
हर नेता अपने-अपने समर्थकों को प्रदेश कार्यसमिति में सदस्य और विशेष आमंत्रित सदस्य बनवाने की जुगत में लगा हुआ है। प्रदेश कार्यसमिति में किसे शामिल किया जाए और किसे छोड़ दिया जाए? प्रदेश नेतृत्व इसी राजनीतिक गणित को साधने-सुलझाने में उलझा हुआ है।
ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं-नेताओं की निगाहें अब इस बात पर टिकी हुई हैं कि अप्रैल में प्रस्तावित बैठक से पहले प्रदेश कार्यसमिति का ऐलान हो पाता है या नहीं? या फिर यह इंतजार और लंबा खिंचता है।
संभाग प्रभारी को क्षेत्रीय संगठन महामंत्री की सख्त नसीहत
मध्यप्रदेश भाजपा के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री ने हाल ही में प्रदेश पदाधिकारियों (संभाग प्रभारियों) की बैठक में एक संभाग प्रभारी को सख्त नसीहत दे डाली। क्षेत्रीय संगठन महामंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि संभाग प्रभारी अपने-अपने प्रभार वाले क्षेत्रों का लगातार दौरा करें, पार्टी के एजेंडे को जमीन पर उतारें और कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाएं, लेकिन संभाग मुख्यालयों को अपना स्थायी ठिकाना न बनाएं।
दरअसल, पार्टी तक यह शिकायत पहुंच थी कि एक संभाग प्रभारी ने अपने प्रभार वाले संभाग मुख्यालय में ही डेरा जमा लिया है। तथा ये संगठन के काम से ज्यादा स्थानीय पार्टी पदाधिकारियों से अलग-अलग तरह की ‘डिमांड’ कर रहे हैं। इस शिकायत के बाद संगठन ने मामले को गंभीरता से लिया।
बैठक में जब यह मुद्दा उठा तो क्षेत्रीय संगठन महामंत्री ने संबंधित संभाग प्रभारी को साफ शब्दों में समझा दिया कि संगठन में जिम्मेदारी सेवा और पार्टी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दी जाती है, न कि किसी मुख्यालय को निजी ठिकाना बनाने के लिए। नारदजी की मानें तो जिन संभाग प्रभारी को यह सख्त नसीहत दी गई, वे मालवा क्षेत्र के एक कद्दावर माननीय के बेहद करीबी एवं भाजपा से ‘मुक्त’ किए गये नामचीन भाईसाब के खास रिश्तेदार बताये जाते हैं।
‘टीम नवीन’ में जगह पाने पूर्व मंत्री की दिल्ली दौड़
मालवांचल के एक पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक इन दिनों खासे व्याकुल नजर आ रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में अपेक्षित पूछ-परख नहीं होने से वे अब अपनी राजनीतिक संभावनाओं की नई जमीन तलाश रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने दिल्ली परिक्रमा शुरू कर दी है। कभी किसी केंद्रीय मंत्री के दरबार में हाजिरी, तो कभी संगठन के बड़े पदाधिकारियों से मुलाकात, ‘माननीय’ हर दरवाजा खटखटा रहे हैं।
बताते हैं कि जल्द ही ‹टीम नवीन› का गठन होना है। ऐसे में मालवांचल के ये ‹माननीय› किसी भी सूरत में ‹टीम नवीन› का हिस्सा बनना चाहते हैं। चर्चा यह भी है कि अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए वे अपने स्वर्गीय पिता, जो प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, के भाजपा और प्रदेश की राजनीति में योगदान का हवाला भी दे रहे हैं।
देखना यह है कि ‹माननीय› की दिल्ली दौड़ रंग लाएगी, या फिर यूं ही बेकार चली जायेगी? लेकिन मालवांचल से लेकर दिल्ली तक, ‹माननीय› की इस राजनीतिक बेचैनी की खूब चर्चा है।
कांग्रेस में ही घिरे प्रदेश मुखिया ‘इंदौरी भिया’
मध्यप्रदेश में सरकार को घेरने के लिए जोरदार हुंकार भर रहे प्रदेश कांग्रेस के मुखिया ‘इंदौरी भिया’ इन दिनों अपनी ही पार्टी में घिरे नजर आ रहे हैं। प्रदेश प्रभारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ उनके अंतर्विरोध किसी से छिपे नहीं हैं। इसके अलावा पार्टी के चार-पांच जो बड़े नेता हैं, उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं।
दिलचस्प बात यह भी कि पार्टी के बाकी नेता- कार्यकर्ता मंचों और बैठकों में भले ही कांग्रेस और ‘इंदौरी भिया’ के जयकारे लगाते नजर आते हों, लेकिन अंदरखाने उनकी निष्ठाएं अब भी पुराने दिग्गज नेताओं के खेमों में बंटी हुई दिखाई देती हैं।
यही वजह है कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर एक तरह की खामोश खींचतान लगातार महसूस की जा रही है। नारदजी कहते हैं कि जब ‘इंदौरी भिया’ अपनी पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं का ही दिल नहीं जीत पा रहे हैं, तो फिर भाजपा से कैसे जीत पायेंगे?
‘सीईओ साहब’ को हर पंचायत से चाहिए ‘एक लाख’!
प्रदेश के एक आदिवासी जिले में सीईओ साहब की ‘अजब-गजब’ कार्यशैली खूब चर्चा बटोर रही है। सरकारी नियमों से अलग उन्होंने पंचायतों के लिए मानो अपना ही एक ‘सेवा नियम’ बना लिया है। चर्चा है कि यदि किसी पंचायत को विकास योजनाओं का लाभ चाहिए, तो उसे हर साल ‘एक लाख’ की व्यवस्था करनी होगी।
बताया जाता है कि ‘सीईओ साहब’ जब भी किसी पंचायत के निरीक्षण पर पहुंचते हैं, तो वहां से ‘एक लाख’ लेकर ही लौटते हैं। इसके बदले सरपंचों को जैसे मौन आश्वासन मिल जाता है कि पंचायत में चाहे कैसी भी गड़बड़ी क्यों न हो, उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं खड़ी की जाएगी।
नारदजी बताते हैं कि इस ‹सेवा नियम› से उन पंचायतों के सरपंच तो खुश हैं, जो विकास योजनाओं को कागजों में ही पूरा दिखाकर राशि हजम करने में माहिर हैं। लेकिन वे सरपंच परेशान हैं जो ईमानदारी से योजनाओं को जमीन पर उतारना चाहते हैं। नारदजी बता दें कि, यह आदिवासी जिला ‘कान्हा राष्ट्रीय उद्यान’ के लिए दुनिया भर में मशहूर है।
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