कहां हैं धर्म-संस्कृति के झंडाबरदार: इंदौर में वार-त्योहार वर्दी के रहमोकरम पर; प्रदेश में ‘सनातनी राज' है या ‘तालिबानी शासन'
KHULASA FIRST
संवाददाता

जनता के वोटों से जीते नेता तो नेता, धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों ने भी क्यों धारण कर रखा मौन?
भगवा ब्रिगेड' को पर्व-परंपराओं को मनाने की नई अफसरी परिभाषा से धर्म पर संकट नजर नहीं आ रहा?
नेताओं के तो मौन के पीछे हैं अपने-अपने ‘रेले', हिंदू संगठनों की चुप्पी समझ से परे
गेर-फाग यात्रा के आयोजकों को नजर नहीं आ रहा रंगों का त्योहार साल-दर-साल बैरंग हो रहा?
भीड़ देख गद्गद् होने वाले आयोजक ध्यान रखें, अफसरों के तुगलकी फरमानों से उत्सव ही नहीं, गेर-फाग यात्रा भी होती जा रही नीरस
लाखों की ये भीड़ किसी खास संस्था, संगठन के लिए नहीं, परंपरा को कायम रखने के लिए जुटती है, मुगालते न पालें
मंगलवार को सरकार-संगठन शहर में था, इंदौरियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार का मुद्दा किसी नेता ने उठाया?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कहां हैं, धर्म-संस्कृति के झंडाबरदार? किधर दुबके हुए हैं सनातन धर्म के स्वयंभू ठेकेदार? कहां ‘दक्ष-आरम्म' कर रही है ‘भगवा वाहिनी'? ‘भगवा ब्रिगेड' की कदमताल शहर के किस हिस्से में हो रही है? यूं तो बात-बात में आपका ‘धर्म' खतरे में पड़ जाता है न? आए दिन आप लोगों को सनातन पर ‘संकट' नजर आता है।
आपकी ‘दिव्य दृष्टि' से धर्म-संस्कृति से रत्तीभर भूले छेड़छाड़ छुप नहीं पाती है, बच नहीं पाती है। फिर ये शहर में बरस-दर-बरस सरकारी फरमानों के कारण दांव पर लगते धर्म-संस्कृति से जुड़े वार-त्योहार आपको नजर नहीं आ रहे हैं? आप तो मन-जेहन के अंदर का भी भांप लेते हो कि ये फलां व्यक्ति-संगठन सनातन के खिलाफ हैं।
फिर आप सबको, आपके ही राज में त्योहार मनाते ‘सनातनियों' के साथ सरकारी दुर्व्यवहार दिखाई क्यों नही दे रहे हैं? पुरखों के समय से शहर में मन रहे पर्व-परंपराओं पर नए-नए सरकारी नियम-कायदों से आप अनभिज्ञ क्यों हैं? हिंदू धर्म से जुड़े त्योहारों पर अगर ये ही सब कायदे-कानून कांग्रेस के राज में लागू होते, तब भी आप आज जैसे ही मौन रहते? जानकर भी, जानबूझकर अनजान बने रहते?
ज नता द्वारा चुने गए शहर के नेताओं की ‘मूक-बधिरता' व ‘नाबीना' होना तो समझ में आता है। पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, ज्ञान-गणित व अपने-अपने निजी काले-पीले धंधों में लिप्त इस नेता बिरादरी की जनहित के मुद्दे पर चुप्पी तो समझ आती है।
सबके नीचे अपने-अपने ‘रेले' हैं। ऐसे में कौन अफसरों से लड़ेगा-भिड़ेगा? भले ही मुद्दा कितना भी जनहित का हो? आखिर सरकार व पार्टी का हित तो सर्वोपरि है न?
भले ही ये जनता ‘वोट-पर्व' पर इन जनप्रतिनिधियों के लिए ‘भगवततुल्य' होती है, लेकिन ‘धर्म-पर्व' पर जनता नहीं, पार्टी व सरकार ‘देवतुल्य' हो जाती है। इन सबका का ये दोगला आचरण तो समझ में आता है, लेकिन हिंदू संगठन होने के नाते आपका तो ‘निर्माण', ‘गठन' व ‘प्राकट्य' ही धर्म-संस्कृति-संस्कार व सनातन के मान-बिंदुओं के संरक्षण, संवर्धन व रक्षण के लिए हुआ है न? तो फिर आप क्यों चुप हैं? शहर की तासीर से जुड़े लोकपर्वों, तीज-त्योहारों के ‘सरकारीकरण' पर आपका ये मौन इंदौर के बाशिंदों को बेहद अखर रहा है।
क्या आप भी ‘सत्ता की निरंतरता' के कारण ‘सत्ता की नजदीकी' के नेताओं जैसे ही तो ‘शौक' नहीं पाल बैठे? क्योंकि इस शहर ने ऐसे ही पर्व-त्योहारों पर सरकारी दखलंदाजी के विरुद्ध सड़क पर सरकार व उसके कारिंदों से लड़ते-भिड़ते व विजेता बन उभरते देखा है। ‘जागो तो, एक बार जागो तो' के जोशीले गीतों के साथ थानों के सामने ही नहीं, राजवाड़ा चौक पर आंदोलनरत आपको अहिल्या नगरी ने देखा है।
फिर अपने ही राज में सनातनी पर्व-त्योहार, परंपराओं में बढ़ती सरकारी दखलंदाजी व सनातनियों की फजीहत से आप क्यों मुंह मोड़े हुए हैं? क्या ‘सरकार' के प्रति जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही आप पर भी लागू होने लगी है?
मुगालते में न रहें आयोजक, ये पर्व की सामूहिक भीड़ है, आपकी नहीं
सवाल उन आयोजकों से भी, जो रंगारंग गेर व फाग यात्रा के साथ रंगपंचमी पर बरसों से सड़क पर उतर रहे हैं। ऐसे आयोजक अगर साल-दर-साल बढ़ती भीड़ देख गद्गद् हो रहे हैं तो सावधान हो जाएं। ये मुगालता न पालें कि ये जनसैलाब आपके बैनर तले जुटा है। जुटता था कभी। अब नहीं।
अगर भरोसा न हो तो निष्पक्ष आकलन कर देखिए। आपके आयोजन में अब पहले जैसे लोग नहीं जुट रहे। न उस भाव से आपके बैनर तले आकर खड़े हो रहे, जिस निर्दोष भाव ने आपके ‘भाव' बढ़ा दिए और ‘भाव-भंगिमाएं' भी बदल दीं। सरकारी फरमानों में हां में हां मिलाने का नतीजा आपके चल समारोह में घटती भीड़ में साफ झलक रहा है।
अब सब हुरियारों का जोर राजवाड़ा पहुंचने का रहता है। यहीं के फोटो व रील देशभर में छाते हैं, मीडिया में जगह पाते हैं। लिहाजा राजवाड़े की सामूहिक भीड़ को अपनी भीड़ मानने का मुगालता पालना जितना जल्दी हो, बंद करना होगा। अन्यथा साल-दर-साल अब गेर व फाग यात्रा में जोश कम होता जा रहा है।
रस्म अदायगी व राजनीतिक नफा-नुकसान मुंह-दिखाई की रस्म अदायगी जरूर करवा रहा है, लेकिन इस सबमें वो जनता नहीं, जो कभी स्वस्फूर्त आपके आयोजन में खिंची चली आती थी। पुलिस-प्रशासन के साथ संयुक्त बैठक में आपको भी मुंह खोलना होगा। सरकारी नियम-कायदों पर हां में हां मिलाने व ‘मुंडी हिलाने' से काम नहीं बनने वाला।
ध्यान रखना ये बात। क्योंकि सरकारी दखलंदाजी से ही लड़-भिड़कर इंदौर की रंगपंचमी ने नई रंगत पाई थी। अब वो रंगत एक बार फिर सरकारी दखलंदाजी व तुगलकी फरमानों से दांव पर लग रही है।
इंदौर में वर्दी के रहमोकरम पर त्योहार, मुख्यमंत्री के सामने किसी नेता ने उठाया मुद्दा?
गेर, यानी रंग-पर्व की अलमस्ती का चरम। रंग, पानी, पिचकारी, गुलाल, गुब्बारे, कुर्राटे के संग हुरियारों के हुल्लास का शिखर बिंदु। फिर रंग अगले बरस तक के लिए विदा ले लेते हैं। लिहाजा जी-भरकर रंगपंचमी मनती है। उसी रंगपंचमी पर गुब्बारा फेंकने पर एक कोल्ड्रिंक वाले पर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज हो गया।
वह भी इंदौर में, जिस शहर की रंगपंचमी के कारण ही प्रदेश का नाम देश-विदेश में छाया हुआ है। उस मस्ती के पर्व पर गुब्बारा फेंकने पर पुलिसिया धाराओं में गिरफ्तारी..! है न हैरतभरा मामला। अब इंदौर में ये सवाल गूंज रहा है कि प्रदेश में ‘सनातनी राज' है या ‘तालिबानी शासन'..? ये प्रकरण मंगलवार को दर्ज हुआ।
जिस दिन पूरी ‘सरकार' व ‘संगठन' इंदौर में ही डेरा डाले हुए था। ‘सरकार' व ‘संगठन' के समक्ष इंदौर के जनप्रतिनिधियों ने ये मामला उठाया क्या- इंदौर में तीज-त्योहार वद के रहमोकरम पर आश्रित हो गए हैं?
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