आग उगलती गर्मी में जब कलेक्टर ने अफसरों से लगवाई दौड़
KHULASA FIRST
संवाददाता

जनता जागी तो जागा प्रशासन; नहर परियोजना की जानकारी बूंद-बूंद टपक गति से डॉ. राजोरा तक पहुंचने में आठ महीने लगे
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सोशल मीडिया से पता चला खरगोन जिले के सुदूर ग्रामीण जनजातीय और पिछड़े इलाके में आग उगलती गर्मी की भरी दोपहरी में कलेक्टर भव्या मित्तल दुर्गम रास्तों और गांव खेत खलिहान का पैदल भ्रमण कर रही हैं। कलेक्टर के पीछे-पीछे पसीने से नहा रहे अधिकारी दौड़ लगा रहे हैं। यह तस्वीर सरकारी तंत्र की सच्चाई का खुलासा करती है।
मामला बिजलवाड़ा नहर परियोजना भीकनगांव क्षेत्र का है जहां अरबों का ठेका लेने वाली कंपनी अधूरा काम छोड़कर भाग रही थी। ग्रामीणों ने एकजुट होकर छोटे से गांव में बड़ा आंदोलन खड़ा किया, इस कारण शासन-प्रशासन कुछ करने के लिए मजबूर हुए।
कलेक्टर ने कंपनी पर दबाव बनाया। ब्लैकलिस्ट करने की कठोर चेतावनी दी और मैदानी निरीक्षण शुरू किया, तब जाकर कंपनी ने बचे काम को शुरू करने का कमिटमेंट किया है।
कलेक्टर ने समय सीमा व चेतावनी के साथ दिए गए टारगेट के लिए मैदान पकड़ा। वैसे इस तरह से कामकाज करने की तासीर सामान्य तौर पर कलेक्टर स्तर के अधिकारियों की नहीं होती।
निष्ठुर सरकारी तंत्र की भ्रष्ट मशीनरी से सरकार की ही योजनाओं को लागू करवाना आसान नहीं है और बात जल संसाधन विभाग की हो तो फिर भगवान ही मलिक है। वैसे इस विभाग के असल मालिक अगले संभावित मुख्य सचिव डॉ. राजेश राजौरा हैं।
मुख्य सचिव के लिए लंबी प्रतीक्षा का समय समाप्ति की ओर बढ़ रहा है क्योंकि शिप्रा से नर्मदा तक काफी पानी बह चुका है। अति. मुख्य सचिव जल संसाधन विभाग डॉ. राजोरा के संज्ञान में भी एक रोकी गई नहर परियोजना की जानकारी बूंद-बूंद टपक गति से पहुंचने में आठ महीने लगे।
900 करोड़ का काम अधूरा छोड़ना चाहती थी कंपनी... कलेक्टर की जानकारी में शुरू से ही विषय था और वे इस मामले को हल्के फुल्के तरीके से डील कर रही थीं जैसा उन्हें संवेदनहीन अधीनस्थ अधिकारी बताते रहे जबकि 8 महीने पहले नहर को पूरा करने के लिए ग्रामीण और किसानों ने रैलियां निकालीं, भीकनगांव में चक्काजाम, धरने प्रदर्शन किए लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोई सरकारी मशीनरी नहीं जागी।
कलेक्टर को भी मामले की गंभीरता समझने में समय लग गया क्योंकि 900 करोड़ का ठेका पानी वाली कंपनी राजनीतिक और शासन-प्रशासन में गहरा दखल रखती है। सत्तापोषित ऐसी मगरमच्छ कंपनियां स्वाभाविक तौर से किसी की परवाह नहीं करतीं। पिछली सरकार रही हो या वर्तमान, नहर बनाने वाली इस कंपनी ने मनमानी कर काम अधूरा छोड़कर बोरिया बिस्तर बांधना शुरू कर दिया।
जल संसाधन विभाग एक तरह से सब कुछ समझते हुए भी नासमझ बना रहा। उधर, किसान भी कहां मानने वाले थे। आंदोलन जारी रहे। कलेक्टर के साथ एक के बाद बैठकों का सिलसिला चलता रहा लेकिन परिणाम नहीं आया। तब जाकर सरकार में हलचल हुई इसके लिए भी फिर महीनों लंबा धरना और चक्का जाम करना पड़ा।
इस पर कलेक्टर ने मामले को पूरी गंभीरता से लिया और भोपाल तक संदेश पहुंचाया। कई बार कलेक्टर समाधान की इच्छाशक्ति रखते भी हैं तो परिणाम नहीं मिलते। इसीलिए अपने दिए गए आदेश के परिपालन का मैदानी परीक्षण करने जब निमाड़ की आग उगलती गर्मी के बीच भरी दोपहर कलेक्टर निकलीं तो बाकी सब अधिकारियों को भी अपने एयर कंडीशनर चैंबर से निकलकर दौड़ लगाना पड़ी।
इन्हें उम्मीद नहीं थी एक महिला अधिकारी इस तरह लू और लपटभरी गर्मी में खेतों की राह पकड़ लेंगी। यह सब इसलिए हो पाया कि भारतीय किसान संगठन के कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लंबी लड़ाई लड़ी।
इस कारण खरगोन जिले की बिंजलवाड़ा परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है—लेकिन इस बार वजह किसानों की जागरूकता और प्रशासन की सक्रियता है। भारतीय किसान संघ के 10 दिन चले धरने ने वह असर दिखाया कि अब प्रशासन खुद मैदान में उतरकर काम की निगरानी कर रहा है।
धरने के बाद तय 20 दिन के ‘युद्ध स्तर’ के प्लान पर अमल सुनिश्चित करने के लिए कलेक्टर भव्या मित्तल ने अधिकारियों और कंपनी प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त निरीक्षण किया। उनके साथ एसडीएम लोकेश छपरे, एनवीडीए के ईई एमके सिंह, एसडीओ, जीवीपीआर कंपनी के पीएम-जीएम और भारतीय किसान संघ के पदाधिकारी श्याम सिंह पवार मौजूद रहे।
एकजुटता बनी बदलाव की वजह... इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है किसानों की संगठित आवाज ने प्रशासन को सक्रिय होने पर मजबूर किया। भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों श्यामसिंह पवार, गजानन बांके, कड़वा नांदिया, राधेश्याम पटेल, नीतेशसिंह मौर्य और धर्मेंद्र भटनिया ने लगातार दबाव बनाकर साबित किया कि जब जनता अपने हक के लिए जागरूक होती है, तो शासन-प्रशासन को भी जवाबदेह बनना पड़ता है।
डेडलाइन का दबाव और बढ़ती निगरानी... नहर का पूरा काम करने की तारीख 7 मई की तय समय-सीमा नजदीक है और यही वजह है प्रशासन रोज फील्ड में मॉनिटरिंग कर रहा है। कलेक्टर का खुद मौके पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि अब काम में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
बिंजलवाड़ा परियोजना का यह घटनाक्रम एक बड़ा संदेश देता है यह सिर्फ एक परियोजना की कहानी नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की ताकत और जवाबदेही की मिसाल बन रही है। जाहिर है प्रजा जागरूक है इसके बाद भी लंबा संघर्ष करना पड़ा ऐसे में पूरे प्रदेश में जल संसाधन विभाग की अन्य योजनाओं की किस तरह दुर्गति हो रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
महत्वपूर्ण स्थलों का दौरा
कलेक्टर ने टीम के साथ खर्वी स्थित पंप हाउस-4, सिराली में जारी निर्माण, और ग्राम नरगांव में एमएस पाइपलाइन कार्य का निरीक्षण किया। हर स्थान पर कलेक्टर ने कार्य की प्रगति को बारीकी से परखा और मौके पर ही निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान सबसे बड़ी खामी मशीनरी और पाइप की कमी के रूप में सामने आई। इस पर कलेक्टर भव्या मित्तल ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी ‘अगर 4 दिनों में 50 मशीनों और पाइप की कमी पूरी नहीं हुई, तो प्रशासन को सख्त निर्णय लेना पड़ेगा।` उनके इस कड़े रुख से साफ है कि अब लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाएगी।
गर्मी से बचने के उपाय नहीं किए
कलेक्टर के पास गर्मी से बचने के उपाय थे। चाहतीं तो एयर कंडीशंड गाड़ी से निरीक्षण कर सकती थी। अधिकारी भी यही चाहते थे मैडम जमीनी हकीकत न देख पाए। गाड़ी में छाता भी था लेकिन उसका उपयोग नहीं किया क्योंकि साथ में ग्रामीण किसान भी थे। उनके सामने गर्मी से छाते का उपयोग करती तो संदेश गलत जाता। सोशल मीडिया के इस जमाने में वैसे भी समझदार अधिकारियों को संभल कर ही चलना होता है।
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