झाड़ू की चमक में धुंधलाता सुशासन आज किस मोड़ पर खड़ा है इंदौर
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर अजब शहर है। यहां सुबह की पहली किरण के साथ सड़कों पर पानी छिड़क दिया जाता है, कचरा समय पर उठ जाता है, चौराहे चमकते हैं, और नागरिक गर्व से कहते हैं, हम देश का सबसे स्वच्छ शहर हैं। कहना भी चाहिए।
स्वच्छता कोई छोटी उपलब्धि नहीं, यह जागृत सभ्यता का प्रमाण है। लेकिन शहरों की आत्मा केवल झाड़ू से नहीं चमकती। वह न्याय, नियोजन, अनुशासन और जवाबदेही से दमकती है। और यहीं आकर इंदौर जैसे तेजस्वी नगर के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगती हैं।
यह वही शहर है जिसे कभी ‘मिनी बॉम्बे’ कहा गया। व्यापार की गति, स्वाद की संस्कृति, शिक्षा की ऊर्जा और सामाजिक जीवंतता, सब कुछ यहाँ धड़कता रहा। पर अब इस धड़कन में कहीं-कहीं अव्यवस्था की खांसी सुनाई देती है।
सड़कें जो शहर की धमनियाँ थीं, वे अतिक्रमण की चर्बी से जाम हो रही हैं। नक्शों में चौड़ी राहें हैं, जमीन पर सिकुड़ी गलियाँ। कागज़ पर विकास है, धरातल पर समझौता।
मास्टर प्लान किसी शहर का भविष्यवक्ता होता है। वह बताता है कि आने वाली पीढ़ियाँ कहां चलेंगी, कहां बसेंगी, कहां सांस लेंगी। यदि वही योजना फाइलों में कैद हो जाए, तो शहर धीरे-धीरे दुर्घटना में बदल जाता है।
इंदौर का संकट यही है, यहाँ नगर नियोजन अक्सर घोषणा बनकर रह जाता है, क्रियान्वयन नहीं। और विडंबना देखिए, वाहनों की भीड़ बढ़ती है, करों का बोझ बढ़ता है, लेकिन नागरिक सुविधा का विस्तार उसी अनुपात में नहीं बढ़ता।
शहर सड़कों पर दबाव झेलता है, राजस्व कहीं और निकल जाता है, और फिर नागरिक से कहा जाता है, धैर्य रखिए, संसाधन कम हैं। यह वैसा ही है जैसे कुएँ का पानी कोई और ले जाए और प्यासे से संयम मांगा जाए।
अतिक्रमण को हमने वर्षों तक छोटी बुराई मान लिया। दुकान थोड़ी बाहर, सीढ़ी थोड़ी आगे, शेड थोड़ा लंबा, घर का बगीचा थोड़ा सड़क तक, पार्किंग थोड़ी सड़क पर, यही ‘थोड़ा-थोड़ा’ मिलकर शहर का बहुत कुछ खा गया।
जब फुटपाथ गायब होता है तो पैदल आदमी अदृश्य हो जाता है। जब नालों पर निर्माण होता है तो बरसात बदला लेती है। जब पाइपलाइन पर कब्जा होता है तो बीमारी घरों में प्रवेश करती है।
अतिक्रमण केवल जमीन पर नहीं होता, यह कानून की गरिमा पर भी होता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि नागरिक अब समाधान के लिए प्रशासन से अधिक अदालत की ओर देखने लगे हैं।
जब जनता को हर छोटे-बड़े प्रश्न के लिए न्यायालय की चौखट पर जाना पड़े, तो यह केवल व्यवस्था की कमजोरी नहीं, भरोसे की क्षति भी है। इंदौर को अब एक नए अभियान की जरूरत है।
स्वच्छता के बाद दूसरा पर्व, सुशासन का। सड़कें केवल साफ नहीं, अतिक्रमण मुक्त भी हों। योजनाएं केवल छपें नहीं, लागू भी हों। अधिकारी केवल पद पर न हों, उत्तरदायी भी हों। रसूख कानून से बड़ा न हो।
यह शहर होलकरों की विरासत है, व्यापारियों की कर्मभूमि है, युवाओं की आकांक्षा है। इसे केवल सुंदर नहीं, सुव्यवस्थित भी होना चाहिए। वरना इतिहास लिखेगा, इंदौर ने कचरा तो हटा दिया, पर अव्यवस्था नहीं।
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