वीडियो देखिये, 'सेटलमेंट' के बाद पांच नंबर में पानी आया या नहीं: कांग्रेस नेता ने साधा निशाना; सोशल मीडिया पर विधायक और महापौर दोनों घिरे
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
विधानसभा क्रमांक-5 में पानी की टंकियों को लेकर मंगलवार को जो राजनीतिक घमासान मचा और बुधवार को जिस तेजी से शांत हो गया उस पर अब सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। वायरल हो रही एक पोस्ट में सीधे सवाल उठाया गया है कि यह विवाद जनता की लड़ाई था या महज राजनीतिक सौदेबाजी?
"जो टंकियां आधी थीं, वो अचानक लबालब कैसे भर गईं?"
कांग्रेस नेता अमीनुल सूरी ने भी सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट में इस मुलाकात पर निशाना साधा है। पोस्ट में कटाक्ष किया गया है कि जिस क्षेत्र में महीनों से टंकियां आधी खाली रहती थीं, गरीब महिलाएं खाली मटकी लेकर दर-दर भटकती थीं और रोज पानी के लिए गुहार लगाई जाती थी वहां विधायक और महापौर के बीच "सुलह" होते ही अचानक पानी की सप्लाई सुचारु हो गई। पोस्ट में पूछा गया-"आखिर ऐसा कौन सा चमत्कार हो गया? क्यों बाबा को जनता की पीड़ा अचानक दिखाई देने लगी?"
"लड़ाई जनता की नहीं, अहंकार और वर्चस्व की थी"
पोस्ट में दो टूक कहा गया है कि यह संघर्ष कभी आम नागरिक के हित के लिए था ही नहीं। एक तरफ विधायक महेंद्र हार्डिया अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे, तो दूसरी तरफ महापौर पुष्यमित्र भार्गव और उनके प्रतिनिधि विधानसभा-5 को अपनी जागीर समझे बैठे थे। बीच में पिसती रही आम जनता प्यासी, परेशान और बेबस।
कड़वा सच: पानी आज भी नहीं मिला
पोस्ट का सबसे तीखा हिस्सा वह है जहां दावा किया गया है कि "सेटलमेंट" के बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदली। पांच नंबर की जनता आज भी टैंकरों के पीछे भाग रही है, गरीब परिवार बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। पोस्ट में सवाल दागा गया "अगर समाधान था तो हुआ क्यों नहीं? और अगर नहीं हुआ, तो यह सेटलमेंट किस बात का था?"
दोनों नेताओं को टैग कर मांगा जवाब
पोस्ट के अंत में विधायक हार्डिया और महापौर भार्गव दोनों को सीधे टैग करते हुए जवाब मांगा गया है। सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को व्यापक समर्थन मिल रहा है और लोग इसे शेयर करते हुए लिख रहे हैं कि "पानी की टंकियों से ज्यादा राजनीति के सौदे भरे गए।"
फिलहाल न विधायक हार्डिया की तरफ से और न ही महापौर कार्यालय की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है, लेकिन सवाल जो जनता पूछ रही है, वह बेहद सीधा है- राजनीतिक सुलह हो गई, पर नल में पानी कब आएगा?
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