सात समंदर पार ‘वसुधैव कुटुंबकम: संघ सुप्रीमो के लिए न्यूयॉर्क में अभूतपूर्व जिज्ञासा
KHULASA FIRST
संवाददाता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक भागवत का अमेरिका में जबरदस्त स्वागत
न्यूयॉर्क के मुस्लिम मेयर के विरोध के बावजूद अमेरिका में बजा आरएसएस का डंका, संघ मुखिया के समर्थन में मैदान में उतरी सैकड़ों संस्थाएं व अमेरिकी हस्तियां
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत का वैश्विक अनुराग ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत अगस्त के अंतिम सप्ताह में अमेरिका, कनाडा और यूके तीन देशों की यात्रा पर हैं। वे अमेरिका की धरती पर पहुंच भी चुके हैं। इस्कान मंदिर में आयोजित रक्षाबंधन कार्यक्रम में वे शामिल हुए और कलाई पर रक्षा सूत्र भी बंधवाया।
न्यूयॉर्क शहर के मुस्लिम मेयर के विरोध और भारत विरोधी अमेरिकी लॉबी के बावजूद आरएसएस सुप्रीमो को लेकर अमेरिका में जबरदस्त माहौल बना हुआ है। उन्हें सुनने के लिए अमेरिकी लालायित हैं। संघ सुप्रीमो की बेबाकी इन दिनों जगजाहिर भी है। वे हर उस मुद्दे पर खुलकर बोल रहे हैं, जिसके विषय में आमतौर पर अब तक के संघ प्रमुख किनारा कर लेते थे।
उनकी ताजा राय ‘जेन-जी’ आंदोलन को लेकर सामने आई, जिसने मोदी सरकार को भी असहज कर दिया था। नतीजतन सबकी जिज्ञासा इस बात पर है कि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के मुखिया अमेरिकी धरती से दुनिया को क्या संदेश देते हैं।
मुख्य कार्यक्रम आज 29 अगस्त को अमेरिका-न्यूयॉर्क के मशहूर मेडिसन स्क्वेयर गार्डन में हो रहा है। ये वही जगह है, जहां कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परस्पर गलबहियां की थीं।
आ रएसएस मुखिया के इस ऐतिहासिक दौरे को लेकर वैश्विक मीडिया और प्रवासी भारतीयों के बीच काफी चर्चा व बहस छिड़ गई है। यात्रा का मुख्य उद्देश्य आरएसएस शताब्दी वर्ष से जुड़ा है। संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और वर्तमान में यह अपना शताब्दी वर्ष, यानी 100 साल पूरे होने का उत्सव मना रहा है।
इस उपलक्ष्य में संघ ने एक ग्लोबल आउटरीच प्रोग्राम (वैश्विक संपर्क अभियान) शुरू किया है। इसका उद्देश्य वैश्विक हिंदू समुदाय से जुड़ाव है। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य विदेशों (विशेषकर अमेरिका) में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों और वैश्विक हिंदू डायस्पोरा से संपर्क साधना है।
दौरे के जरिये संघ, प्रवासी हिंदुओं के संस्कृति, संस्कार आदि विषयों पर विचार-विमर्श करेगा। संघ के अनुसार इस दौरे का उद्देश्य खुले संवाद की भावना को बढ़ावा देना, भारत की सांस्कृतिक परंपराओं को साझा करना और दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व एक परिवार है) का संदेश देना है। यात्रा के दौरान सरसंघचालक डॉ. भागवत अमेरिकी उद्योगपतियों, शिक्षाविदों और विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों से भी चर्चा करेंगे।
मुख्य कार्यक्रम न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक मेडिसन स्क्वेयर गार्डन में 29 अगस्त को होने वाला है। यह कार्यक्रम ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ के नाम से आयोजित किया गया है। यह कार्यक्रम ‘अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ नामक संस्था के बैनर तले आयोजित हो रहा है।
इस आयोजन को 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी और सांस्कृतिक संगठनों का समर्थन प्राप्त है। आयोजकों का दावा है कि यह एक अंतरधार्मिक सभा है, जिसमें विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है।
न्यूयॉर्क के मुस्लिम मेयर का संघ सुप्रीमो को लेकर विरोध हुआ बेअसर... भगवा परिवार के मुखिया की इस अमेरिकी यात्रा से ताजा विवाद और विरोध भी जुड़ गया है। मोहन भागवत के अमेरिका पहुंचते ही इस यात्रा को लेकर वहां काफी राजनीतिक और सामाजिक घमासान देखने को मिल रहा है। सबसे दिलचस्प विरोध भारतीय मूल के न्यूयॉर्क के मुस्लिम मेयर का है।
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान मम्दानी ने सार्वजनिक रूप से इस कार्यक्रम का विरोध करते हुए इसे एक ‘विभाजनकारी विचारधारा’ का आयोजन बताया है। हालांकि उन्होंने माना कि एक निजी कार्यक्रम होने के नाते शहर प्रशासन के पास इसे रद्द करने का कानूनी अधिकार नहीं है।
उधर, भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के आरोपों को पूरी तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित और विश्वसनीयतारहित बताकर खारिज कर दिया है। हालांकि इस सबके बावजूद ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ और ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ ने विरोध प्रदर्शन किया है।
आरएसएस के समर्थन में उतरी अनेक अमेरिकी हस्तियां...विवादों के बीच मोहन भागवत और इस कार्यक्रम के समर्थन में भी कई आवाजें उठी हैं। प्रसिद्ध अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने मेयर मम्दानी के विरोध की आलोचना की और कहा है कि यह विरोध केवल पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति राजनीतिक नफरत के कारण किया जा रहा है।
उन्होंने आयोजन के ‘वन-नेस’ (एकता) के विचार की सराहना की है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की यह अमेरिकी यात्रा पूरी तरह से संघ के 100 वर्ष पूरे होने के जश्न और वैश्विक संपर्क पर केंद्रित है। जहां एक तरफ संघ समर्थक इसे विश्व कल्याण और संवाद का जरिया मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के कुछ मानवाधिकार और राजनीतिक समूह इसे लेकर कड़ा विरोध दर्ज करा रहे हैं। न्यूयॉर्क के बाद संघ प्रमुख का कनाडा और यूके जाने का भी कार्यक्रम है।
नया नहीं है आरएसएस का विदेशों के साथ संपर्क-संवाद-समन्वय... संघ का विदेशों में संवाद नया नहीं है। भारतीयों के विदेश जाने के साथ ही सांस्कृतिक जुड़ाव की आवश्यकता भी पैदा हुई।
लिहाजा आरएसएस अपनी स्थापना के साथ ही इस मोर्चे पर सक्रिय हो गया था। 1946 में केन्या जा रहे एक जहाज पर शाखा लगने का उल्लेख संघ की प्रवासी-यात्रा के आरंभिक प्रतीक के रूप में किया जाता है।
1947 में नैरोबी में भारतीय स्वयंसेवक संघ की औपचारिक स्थापना हुई। बाद के दशकों में ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से यह कार्य विकसित हुआ।
इन संस्थाओं ने स्थानीय कानूनों और नागरिक संरचना के भीतर रहकर बच्चों के संस्कार-वर्ग, युवाओं के प्रशिक्षण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेवा-कार्यों और समुदाय-संपर्क की परंपरा विकसित की।
आज दुनिया के 80 से ज्यादा मुल्कों में आरएसएस, हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से स्थापित संगठन हो चला है। इंदौर में विश्व हिंदू सम्मेलन आयोजित कर आरएसएस ने अपनी सात समंदर पार की ताकत भी दिखाई थी।
विरोध करने वाले संगठनों का है सिमी से नाता... अमेरिका में मौजूद भारत विरोधी एक्टिविस्ट नेटवर्क भागवत के खिलाफ मुहिम चला रहा है। इस नेटवर्क को ‘इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ चला रही है, जिसे ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ का समर्थन हासिल है।
इसने पहले भी भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों, जातिगत भेदभाव और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों जैसे मुद्दों पर बार-बार कैंपेन चलाए हैं। इन दोनों संगठन की स्थापना 2002 में गुजरात दंगों के बाद हुई थी।
यह संगठन अमेरिका स्थित उन अन्य समूहों के साथ मिलकर काम करता है, जो भारत-विरोधी विचार रखते हैं। इसने सीएए व अनुच्छेद 370 को हटाने आदि के खिलाफ कैंपेन चलाया था।
यह भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया से जुड़े इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के साथ भी काम करता है।
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